बाज़ारवादी पत्रकारिता के निशाने पर वैदिक

पत्रकारिता के बारे में आम तौर पर धारणा है कि पत्रकार निष्पक्ष तो होता ही है, क्योंकि उसे जज या

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साहित्य पत्रिकाओं की सार्थकता

यदा-कदा साहित्यिक आयोजनों और विचार गोष्ठियों में जाने-बोलने का अवसर मिलता है. ज्यादातर गोष्ठियों में वामपंथी विचारधारा के अनुयायी या

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हिंदी पत्रकारिता के शलाका पुरुष : पंडित कमलापति त्रिपाठी

जाने माने मूर्धन्य पत्रकार और राजनेता पंडित कमलापति त्रिपाठी ने हिंदी को ब़ढावा दिया था, कैसे? जानने के लिए प़िढए. 

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दिल्ली का बाबू

समान्यतः सैन्य अधिकारी अपने फौजी करियर से संबंधित यादों को बहुत ज़्यादा समय तक संजोकर नहीं रख पाते हैं. इसलिए कुछ सैन्य अधिकारी अपनी यादों को संजोये रखने के लिए अपनी जीवनी लिखते हैं. इसी तरह की एक जीवनी पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल जेजे सिंह ने लिखी है,

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इंडियन एक्‍सप्रेस की पत्रकारिता- 2

अगर कोई अ़खबार या संपादक किसी के ड्राइंगरूम में ताकने-झांकने लग जाए और गलत एवं काल्पनिक कहानियां प्रकाशित करना शुरू कर दे तो ऐसी पत्रकारिता को कायरतापूर्ण पत्रकारिता ही कहेंगे. हाल में इंडियन एक्सप्रेस ने एक स्टोरी प्रकाशित की थी, जिसका शीर्षक था, सीक्रेट लोकेशन. यह इस अ़खबार में प्रकाशित होने वाले नियमित कॉलम डेल्ही कॉन्फिडेंशियल का एक हिस्सा थी.

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हम तो ख़ुद अपने हाथों बेइज़्ज़त हो गए

जी न्यूज़ नेटवर्क के दो संपादक पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए. इस गिरफ्तारी को लेकर ज़ी न्यूज़ ने एक प्रेस कांफ्रेंस की. अगर वे प्रेस कांफ्रेंस न करते तो शायद ज़्यादा अच्छा रहता. इस प्रेस कांफ्रेंस के दो मुख्य बिंदु रहे. पहला यह कि जब अदालत में केस चल रहा है तो संपादकों को क्यों गिरफ्तार किया गया और दूसरा यह कि पुलिस ने धारा 385 क्यों लगाई, उसे 384 लगानी चाहिए थी. नवीन जिंदल देश के उन 500 लोगों में आते हैं, जिनके लिए सरकार, विपक्षी दल और पूरी संसद काम कर रही है.

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यह पत्रकारिता का अपमान है

मीडिया को उन तर्कों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, जिन तर्कों का इस्तेमाल अपराधी करते हैं. अगर तुमने बुरा किया तो मैं भी बुरा करूंगा. मैंने बुरा इसलिए किया, क्योंकि मैं इसकी तह में जाना चाहता था. यह पत्रकारिता नहीं है और अफसोस की बात यह है कि जितना ओछापन भारत की राजनीति में आ गया है, उतना ही ओछापन पत्रकारिता में आ गया है, लेकिन कुछ पेशे ऐसे हैं, जिनका ओछापन पूरे समाज को भुगतना पड़ता है. अगर न्यायाधीश ओछापन करें तो उससे देश की बुनियाद हिलती है.

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पत्रकार जिन्होंने लोकतंत्र की हत्या की

पत्रकारिता की संवैधानिक मान्यता नहीं है, लेकिन हमारे देश के लोग पत्रकारिता से जुड़े लोगों पर संसद, नौकरशाही और न्यायपालिका से जुड़े लोगों से ज़्यादा भरोसा करते हैं. हमारे देश के लोग आज भी अ़खबारों और टेलीविजन की खबरों पर धार्मिक ग्रंथों के शब्दों की तरह विश्वास करते हैं.

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भारतीय मीडिया संकट के दौर से गुज़र रहा है

दुनिया के अन्य देशों की तरह भारत में भी पत्रकारिता साल दर साल परिवर्तित हुई है. अगर हम 1947 में देश को मिली आज़ादी के बाद पिछले 65 सालों की बात करें तो पत्रकारिता के क्षेत्र में बड़े परिवर्तन हुए हैं. 1995 के मध्य में सेटेलाइट टीवी हमारे देश में आया. उसके बाद से 24 घंटे चलाए जाने वाले समाचार चैनलों ने अपना एक ब्रांड बनाया है, जिसमें एक ही समाचार बार-बार दिखाया जाता है.

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पटना में राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन : मीडिया की भूमिका पर नज़र

आज राष्ट्रीय या फिर प्रादेशिक स्तर पर उत्पन्न परिस्थिति में मीडिया की भूमिका का़फी महत्वपूर्ण हो गई है. यही वजह है कि सबकी निगाह मीडिया पर लगी हुई है. ऐसे में मीडिया अपनी भूमिका को किस रूप में तथा किस हद तक निभा पा रहा है, इस पर चर्चा के लिए पटना में दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया गया.

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हिंदी पत्रकारिता अपनी जिम्मेदारी समझे

यह महीना हलचल का महीना रहा है. मुझसे बहुत सारे लोगों ने सवाल पूछे, बहुत सारे लोगों ने जानकारियां लीं. लेकिन जिस जानकारी भरे सवाल ने मुझे थो़डा परेशान किया, वह सवाल पत्रकारिता के एक विद्यार्थी ने किया. उसने मुझसे पूछा कि क्या अंग्रेजी और हिंदी पत्रकारिता अलग-अलग हैं. मैंने पहले उससे प्रश्न किया कि आप यह सवाल क्यों पूछ रहे हैं.

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हमें अपने देश का भरोसा बरक़रार रखना है

पिछले हफ्ते मैंने चौथी दुनिया की रिपोर्ट में इंडियन एक्सप्रेस और शेखर गुप्ता की पत्रकारिता पर कई सवाल उठाए. उन सवालों को उठाते हुए मुझे हमेशा याद रहा कि पिछले कुछ सालों में इंडियन एक्सप्रेस ने कैसी पत्रकारिता की और शेखर गुप्ता ने अपना आज का मुक़ाम कितनी मेहनत से बनाया है, लेकिन सवाल तो सवाल हैं और कभी ये सवाल इतने बड़े आकार में हमारे सामने आकर खड़े हो जाते हैं कि हमें न चाहते हुए भी वह लिखना पड़ता है, जो नहीं लिखना चाहिए.

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हम अपनी बात पर क़ायम हैं

कोयले की कहानी कोयले की तरह और काली होती जा रही है. जब चौथी दुनिया ने 25 अप्रैल-1 मई 2011 के अंक में 26 लाख करोड़ का महाघोटाला शीर्षक से कहानी छापी तो हमें लगा कि हमने एक कर्तव्य पूरा किया, क्योंकि जनता के प्रतिनिधियों, सरकार बनाने वाले प्रतिनिधियों ने हिंदुस्तान के लोगों की गाढ़ी कमाई का पैसा कुछ लोगों की जेब में डाल दिया और उसमें से कुछ पैसा उनकी जेब में भी गया.

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प्रधानमंत्री जी, चुप रहने का व़क्त नहीं है

सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत हुए जस्टिस काटजू को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया का अध्यक्ष नियुक्त किया गया. पहले से ही यह शिकायत थी कि प्रेस काउंसिल एकदम कमज़ोर संस्था है और इसके पास अधिकार इतने कम हैं कि इसका प्रेस पर कोई नियंत्रण नहीं है.

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पीत पत्रकारिता : लोकायुक्त प्रारूप पर फ़र्ज़ी ख़बर छापी

बिहार में पत्रकारिता का स्तर कितना गिर रहा है, इसकी एक ताज़ा मिसाल है पटना से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान में टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल के नाम से प्रकाशित समाचार, जिसका शीर्षक है- लोकायुक्त का यह प्रारूप रोल मॉडल है.

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समाचारपत्रों की विकृति

आज के युग में स्कूलों के सिवाय मानव मस्तिष्क पर सबसे ज़्यादा असर पड़ता है समाचारपत्रों का. आपने ग़ौर किया होगा कि भारत में जितने भी समाचारपत्र पढ़े जाते हैं, शहरों में, देहातों में या गांवों में, उनमें से 80-90 फीसदी वे समाचारपत्र हैं, जिनके मालिक करोड़पति हैं

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…किसी से हो नहीं सकता

हर साल 31 जुलाई हिंदी साहित्य के लिए एक बेहद ख़ास दिन होता है. इस दिन हिंदी के महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद का जन्मदिन होता है, लेकिन हिंदी पट्टी में अपने इस गौरव को लेकर कोई उत्साह देखने को मिलता हो, यह ज्ञात नहीं है. प्रेमचंद के गांव लमही में कुछ सरकारी किस्म के कार्यक्रम हो जाते हैं, जिनमें मंत्री वग़ैरह भाषण देकर रस्म अदायगी कर लेते हैं.

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संभालिए, अभी कुछ बिगडा़ नहीं है

बहुत सारी चीजें अमेरिका में बनती हैं, अमेरिका में खुलती हैं, तब हमें पता चलता है कि हम किस तरह के जाल में कभी फंस चुके थे, इन दिनों फंस रहे हैं या आगे फंसने वाले हैं. हमारे देश की धुरंधर हस्तियां, जो लोगों की राय बनाती हैं, जिनमें जस्टिस राजेंद्र सच्चर, दिलीप पडगांवकर, उम्र के आखिरी पड़ाव पर खड़े प्रसिद्ध संपादक, लेखक एवं सोशल एक्टिविस्ट कुलदीप नैय्यर साहब और गौतम नवलखा शामिल हैं, जिन्होंने रूरल जर्नलिज्म और वैचारिक पत्रकारिता में नाम कमाया तथा इनके साथ बहुत सारे लोग एक साजिश में फंसे नजर आ रहे हैं, जिसका खुलासा अमेरिका में हुआ.

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आज उदयन होते तो क्या करते

नई पीढ़ी के पत्रकारों और पाठकों के लिए उदयन शर्मा को जानना ज़रूरी है, क्योंकि ये दोनों वर्ग आज पत्रकारिता के उस स्वरूप से रूबरू हो रहे हैं, जहां स्थापित मूल्यों में क्षरण देखने को मिल रहा है. उद्देश्य में भटकाव और विचलन की स्थिति है. युवा वर्ग के साथ ही वह पीढ़ी भी, जिसने कभी रविवार और उदयन शर्मा के धारदार लेखन को पढ़ा, देखा या उसके बारे में जाना है, पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति से संतुष्ट नज़र नहीं आ रही है.

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आपका और आपकी मुस्कराहट का शुक्रिया

अपने साथियों पर लिखना या टिप्पणी करना बहुत दु:खदायी होता है, क्योंकि हम इससे एक ऐसी परंपरा को जन्म देते हैं कि लोग आपके ऊपर भी लिखें. आप उन्हें आमंत्रित करते हैं. मैं यही करने जा रहा हूं. मैं अपने साथियों को आमंत्रित करने जा रहा हूं कि हमारे ऊपर जहां उन्हें कुछ ग़लत दिखाई दे, वे लिखें.

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किताबों में बनता इतिहास

प्रभाष जोशी हमारे समय के बड़े पत्रकार थे. उनके सामाजिक सरोकार भी उतने ही बड़े थे. समाज और पत्रकारिता को लेकर उनकी चिंता का दायरा भी बेहद विस्तृत था. हिंदी पट्टी और हिंदी समाज में प्रभाष जी की का़फी इज़्ज़त भी थी. उनके निधन के बाद हिंदी पत्रकारिता में एक खालीपन आ गया है.

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उर्दू पत्रकारिता की दिशा और दशा

पत्रकारिता को अंग्रेज़ी में जर्नलिज़्म कहते हैं. इसकी व्यापक परिभाषा देना बहुत कठिन है. कई लोगों ने इसे अपने तौर पर समझाने की कोशिश की है. अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध साहित्यकार मैथू आर्नल्ड ने पत्रकारिता को जल्दबाज़ी में लिखा गया साहित्य कहा है, जो इस पेशे का निरादर है और मौजूदा दौर का कोई भी पत्रकार इस परिभाषा से संतुष्ट नहीं होगा.

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