आध्यात्मिक एकता से भारत लोकतंत्र का अग्रणी देश बन सकता है

एक सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र बनाने का काम हम भगवान या अपने देवताओं की ओर देखे बिना, इस ज़मीन और यहां के

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पढ़िए, शनिदेव के प्रभाव से बचने के उपाय और उनसे जुड़ी कुछ अहम बातें

नई दिल्ली, (राज लक्ष्मी मल्ल) : हिन्दुओं की मान्यता हैं कि सप्ताह का हर एक दिन अगल-अगल देवताओं का विशेष

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अंतर्द्वंद्व की सहज अभिव्यक्ति

कोमलता की पहली अनुगूंज किसी ने सुनी थी जो निरंतर अमरबेल की तरह फैलती रही. समाज, व्यवस्था, संस्कृति, परंपरा, स्नेह,

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नाम बदलने की परंपरा

कई लोगों को अपने घर वालों द्वारा रखा हुआ नाम पसंद नहीं आता और वे अपना नाम बदल लेते हैं, लेकिन शंघाई में तो कुछ और ही होता है. यहां मरने के बाद नाम बदल दिए जाते हैं. अगर जीवित हैं तो वान और अगर मर चुके हैं तो नाम के बाद लियु जोड़े जाने की यह परंपरा किसी को भी हैरान कर सकती है.

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सहकारी अर्थव्यवस्था की प्राचीन परंपरा

एक और आवाज़ आजकल जोरों से उठाई जा रही है, वह है सहकारिता आंदोलन की. सहकारिता आंदोलन देश के लिए, राष्ट्र के हर व्यक्ति के लिए उपादेय है, बशर्ते कि इस पद्धति का ईमानदारी से अनुसरण किया जाए.

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कुंभ दूर है, साधुओं का दंभ उभरने लगा है

अधिकारियों और ठेकेदारों के चंगुल से महाकुंभ बच भी जाए, पर साधु-संतों के दंभ से वह बच नहीं पाता है! यही अब तक होता आया है और यही अब 2010 के हरिद्वार महाकुंभ में हो रहा है! इतिहास साक्षी है कि कुंभ जैसे महापर्व सामाजिक सौहार्द के ऐसे बड़े अवसर होते हैं, जबकि बारह बरस में एक बार एक स्थान पर एकत्र होकर योगी एवं भोगी सामाजिक चिंतन और भविष्य के लिए नई राहों का अन्वेषण करते हैं. साधु-संन्यासियों को समाज के चिंतक और मनीषी वर्ग में गिना जाता है. अपने लिए भगवद् उपासना व समाज के लिए कल्याण-चिंतन ही इस चतुर्थाश्रम का दायित्व और ध्येय रहा है, लेकिन यह औदात्यपूर्ण परंपरा है, जो अब कालांतर में रूढ़ियों तक सीमित होकर रह गई है.

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