व्यक्तित्व विकास की पहली पाठशाला

पुस्तक लिखना महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि महत्वपूर्ण है कि लेखक ने अपनी पुस्तक के जरिये पाठकों को, समाज को आख़िर

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तसलीमा सुर्खियों में रहना चाहती हैं

बांग्लादेश की विवादास्पद और निर्वासन का दंश झेल रही लेखिका तसलीमा नसरीन ने एक बार फिर से नए विवाद को जन्म दे दे दिया है. तसलीमा ने बंग्ला के मूर्धन्य लेखक और साहित्य अकादमी के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय पर यौन शोषण का बेहद संगीन इल्ज़ाम जड़ा है. तसलीमा ने सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर लिखा- सुनील गंगोपाध्याय किताबों पर पाबंदी के पक्षधर रहे हैं.

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पुस्तक मेले लेखकों का प्रचार मंच बन चुके हैं

विश्व में पुस्तक मेलों का एक लंबा इतिहास रहा है. पुस्तक मेलों का पाठकों की रुचि बढ़ाने से लेकर समाज में पुस्तक संस्कृति को बनाने और उसको विकसित करने में एक अहम योगदान रहा है. भारत में बड़े स्तर पर पुस्तक मेले सत्तर के दशक में लगने शुरू हुए. दिल्ली और कलकत्ता पुस्तक मेला शुरू हुआ. 1972 में भारत में पहले विश्व पुस्तक मेले का दिल्ली में आयोजन हुआ.

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प्रकृति से जु़डी है हमारी संस्कृति

इंसान ही नहीं दुनिया की कोई भी नस्ल जल, जंगल और ज़मीन के बिना ज़िंदा नहीं रह सकती. ये तीनों हमारे जीवन का आधार हैं. यह भारतीय संस्कृति की विशेषता है कि उसने प्रकृति को विशेष महत्व दिया है. पहले जंगल पूज्य थे, श्रद्धेय थे. इसलिए उनकी पवित्रता को बनाए रखने के लिए मंत्रों का सहारा लिया गया. मगर गुज़रते व़क्त के साथ जंगल से जु़डी भावनाएं और संवेदनाएं भी बदल गई हैं.

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मन को छूते मेरे गीत

गीत मन के भावों की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति हैं. साहित्य ज्योतिपर्व प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक मेरे गीत में सतीश सक्सेना ने भी अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरोकर गीतों की रचना की है. वह कहते हैं कि वास्तव में मेरे गीत मेरे हृदय के उद्‌गार हैं. इनमें मेरी मां है, मेरी बहन है, मेरी पत्नी है, मेरे बच्चे हैं. मैं उन्हें जो देना चाहता हूं, उनसे जो पानी चाहता, वही सब इनमें है.

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विश्व पुस्तक मेले में किताबों की बहार

पुस्तक प्रेमी विश्व पुस्तक मेले का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं. दिल्ली के प्रगति मैदान में बीती 25 फरवरी से 4 मार्च तक चले विश्व पुस्तक मेले का इस बार भी देश भर से आए पुस्तक प्रेमियों ने जमकर लुत्फ उठाया. किसी स्टॉल पर किताबों का लोकार्पण हो रहा था तो किसी स्टॉल पर लोग अपने प्रिय लेखक से गुफ्तगू कर रहे थे.

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सर्वश्रेष्ठ पत्र लेखकों का सम्मान

चौथी दुनिया उर्दू में प्रकाशित होने वाले पत्रों में से हर सप्ताह एक सर्वश्रेष्ठ पत्र को पुरस्कृत किया जाता है. पुरस्कार के रूप में उक्त पत्र के लेखक को क़ौमी काउंसिल बराए फ़रोग उर्दू द्वारा एक हज़ार रुपये की पुस्तकें प्रदान की जाती हैं.

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समीक्षा पर घमासान

साहित्य और विवादों का चोली दामन का साथ रहा है. जब से साहित्यिक लेखन की शुरुआत हुई है, तभी से विषयों को लेकर मतांतर भी हैं. उसी मतांतर की परिणति विवादों में होती है. कुछ विवाद घोर साहित्यिक होते हैं

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दिल्ली पुस्तक मेला : पाठकों के जोश से बाज़ार को उम्मीद

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने कहा था, मैं नरक में भी पुस्तकों का स्वागत करूंगा, क्योंकि ये जहां रहती हैं, वह जगह अपने आप स्वर्ग हो जाती है. इंडिया ट्रेड प्रमोशन ऑर्गनाइजेशन एवं द फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स के संयुक्त तत्वावधान में प्रगति मैदान में बीते 27 अगस्त से 04 सितंबर तक चले 17वें दिल्ली पुस्तक मेले में आए असंख्य लोगों ने कमोबेश यही संदेश दिया कि पुस्तकें आज भी मनुष्य की सच्ची मित्र हैं.

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निम्नवर्गीय जीवन संग्राम की कहानियां

मेरे मौला कथाकार डॉ. लालजी प्रसाद सिंह का 20वां कहानी संग्रह है. वैसे वह अब तक हिंदी की विभिन्न विधाओं में 35 किताबें लिख चुके हैं. इस पुस्तक में मेरे मौला, मौत का गीत, मर्सी किलिंग, जगिया और भूचाल आदि पांच कहानियां हैं.

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आतंक के आका कि जीवनी

पाकिस्तान के मिलिट्री शहर एबटाबाद में जब बीते दो मई को दुनिया के सबसे दुर्दांत और खूंखार आतंकवादी को अमेरिकी नेवी सील्स ने मार गिराया तो पूरे विश्व के लोगों में मौत के इस सौदागर ओसामा बिन लादेन के बारे में जानने की जिज्ञासा बेतरह बढ़ गई. अमेरिकी कार्रवाई के बाद जिस तरह से एबटाबाद स्थित ओसामा के ठिकाने से उसके और उसकी पत्नियों, बच्चों, परिवार और उसके रहन-सहन के तौर तरीक़ों के बारे में खबरें निकल कर आ रही थीं, उसने ओसामा और उसकी निजी ज़िंदगी में लोगों की रुचि और बढ़ा दी.ं

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दिलचस्प अनुभवों की शाम

बात अस्सी के दशक के अंत और नब्बे के दशक के शुरुआती वर्षों की है. पुस्तकों को पढ़ते हुए बहुधा मन में विचार आता था कि उस पर कुछ लिखूं, लेकिन संकोचवश कुछ लिख नहीं पाता था. ज़्यादा पता भी नहीं था कि क्या और कैसे लिखूं और कहां भेजूं. मैं अपने इस स्तंभ में पहले भी चर्चा कर चुका हूं कि किताबों को पढ़ने के बाद चाचा भारत भारद्वाज को लंबे-लंबे पत्र लिखा करता था.

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किताबों में बनता इतिहास

प्रभाष जोशी हमारे समय के बड़े पत्रकार थे. उनके सामाजिक सरोकार भी उतने ही बड़े थे. समाज और पत्रकारिता को लेकर उनकी चिंता का दायरा भी बेहद विस्तृत था. हिंदी पट्टी और हिंदी समाज में प्रभाष जी की का़फी इज़्ज़त भी थी. उनके निधन के बाद हिंदी पत्रकारिता में एक खालीपन आ गया है.

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कौन कहता है हिंदी में पाठक नहीं है!

हिंदी में कुछ लोग लगातार पाठकों की कमी का रोना रोते रहे हैं, लेकिन हक़ीक़त इससे अलग है. हिंदी में प्रकाशकों की संख्या के साथ-साथ हर साल प्रकाशित होने वाली किताबों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है. हिंदी में भी कई लेखक ऐसे हैं, जिनकी किताबें अब भी बेहिसाब पढ़ी जा रही हैं और लगातार उनके संस्करण प्रकाशित हो रहे हैं.

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पुस्‍तक अंशः मुन्‍नी मोबाइल- 19

नन्हीं सूफी रोज़-रोज़ की तकरार को अपनी आंख से गुज़रते देखती. आनंद का तेज़ गुस्सा देख वह सहमी सी रहती. एक बार कुछ ऐसी ख़ास घटना हो गई, जिससे दरार और बढ़ गई और शिवानी ने अपना सामान बांध मायके जाने का निश्चय कर लिया. आनंद भारती ने कभी किसी को मनाना सीखा ही नहीं था.

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पुस्‍तक अंशः मुन्‍नी मोबाइल- 18

अब यह बात दीगर है कि जमुनापार के दिल्ली में रहने वाले लोग यहां आशियाना बना चुके हैं. फ्लैटों की क़ीमत करोड़ों में है यहां. आज यह सबसे तेज़ी से विकसित होता इलाक़ा है दिल्ली का. दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे जमुनापार के सांसद हैं, इसलिए विकास की रफ़्तार काफी है.

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पुस्‍तक अंशः मुन्‍नी मोबाइल – 16

नाव परिणामों से सब स्तब्ध थे. बुद्धिजीवी और धर्म निरपेक्ष ताक़तें सकते में थीं. वे मतदाताओं का मूड भांप नहीं पाए. सांप्रदायिक ताक़तों को हराने की उनकी सारी अवधारणाएं हवाई साबित हुईं. उनकी मान्यता थी कि गांधी का गुजरात धर्म के आधार पर नहीं बंटेगा, पर ऐसा हुआ.

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दलित चिंतन को मिटाने की मुहिम

मध्यकाल के रचनाकारों में कबीर का अध्ययन और मूल्यांकन सबसे जटिल और चुनौती भरा रहा है. साहित्य के इतिहासकारों और आलोचकों के अलावा दूसरे विषयों के विद्वानों ने भी कबीर के अध्ययन में रुचि ली है. कबीर का एक विमर्श लोक में भी बराबर चलता रहा है. वहां भी लंबी परंपरा है.

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पुस्‍तक अंश : मुन्‍नी मोबाइल – 15

मोदी को अक्षरधाम के रूप में एक और मुद्दा मिल गया था. मोदी आग उगलते घूम रहे थे. उनकी आग को अक्षरधाम पर आतंकी हमले ने और धधका दिया. हमले के बाद मोदी ने गुजरात की अस्मिता के सवाल को और ज़ोर से उठाया. पाकिस्तान को धमकी दी. मियां मुशर्रफ को ललकारा.

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