इंडियन एक्‍सप्रेस की पत्रकारिता- 2

अगर कोई अ़खबार या संपादक किसी के ड्राइंगरूम में ताकने-झांकने लग जाए और गलत एवं काल्पनिक कहानियां प्रकाशित करना शुरू कर दे तो ऐसी पत्रकारिता को कायरतापूर्ण पत्रकारिता ही कहेंगे. हाल में इंडियन एक्सप्रेस ने एक स्टोरी प्रकाशित की थी, जिसका शीर्षक था, सीक्रेट लोकेशन. यह इस अ़खबार में प्रकाशित होने वाले नियमित कॉलम डेल्ही कॉन्फिडेंशियल का एक हिस्सा थी.

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तसलीमा सुर्खियों में रहना चाहती हैं

बांग्लादेश की विवादास्पद और निर्वासन का दंश झेल रही लेखिका तसलीमा नसरीन ने एक बार फिर से नए विवाद को जन्म दे दे दिया है. तसलीमा ने बंग्ला के मूर्धन्य लेखक और साहित्य अकादमी के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय पर यौन शोषण का बेहद संगीन इल्ज़ाम जड़ा है. तसलीमा ने सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर लिखा- सुनील गंगोपाध्याय किताबों पर पाबंदी के पक्षधर रहे हैं.

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ज़िंदादिली की मिसाल स्टी़फन हॉकिंग

इंसान चाहे तो क्या नहीं कर सकता. अपनी हिम्मत और लगन के बूते वह नामुमकिन को भी मुमकिन बना सकता है. इसकी एक बेहतरीन मिसाल है स्टी़फन हॉकिंग, जिन्होंने असाध्य बीमारी के बावजूद कामयाबी के आसमान को छुआ. तक़रीबन 22 साल की उम्र में उन्हें एमियो ट्रोफिक लेटरल स्केलरोसिस नामक बीमारी हो गई थी. यह ऐसी बीमारी है, जो कभी ठीक नहीं होती. इसकी वजह से व्यक्ति का पूरा जिस्म अपंग हो जाता है, स़िर्फ दिमाग़ ही काम करने योग्य रहता है. स्टी़फन ने एक बार कहा था कि मैं भाग्यशाली हूं कि मेरा केवल शरीर बीमार हुआ है. मेरे मन और दिमाग़ तक रोग पहुंच नहीं पाया.

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पूरे चांद की रात…

भारतीय साहित्य के प्रमुख स्तंभ यानी उर्दू के मशहूर अ़फसानानिग़ार कृष्ण चंदर का जन्म 23 नवंबर, 1914 को पाकिस्तान के गुजरांवाला ज़िले के वज़ीराबाद में हुआ. उनका बचपन जम्मू कश्मीर के पुंछ इलाक़े में बीता. उन्होंने तक़रीबन 20 उपन्यास लिखे और उनकी कहानियों के 30 संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. उनके प्रमुख उपन्यासों में एक गधे की आत्मकथा, एक वायलिन समुंदर के किनारे, एक गधा नेफ़ा में, तूफ़ान की कलियां, कॉर्निवाल, एक गधे की वापसी, ग़द्दार, सपनों का क़ैदी, स़फेद फूल, प्यास, यादों के चिनार, मिट्टी के सनम, रेत का महल, काग़ज़ की नाव, चांदी का घाव दिल, दौलत और दुनिया, प्यासी धरती प्यासे लोग, पराजय, जामुन का पेड़ और कहानियों में पूरे चांद की रात और पेशावर एक्सप्रेस शामिल है. 1932 में उनकी पहली उर्दू कहानी साधु प्रकाशित हुई. इसके बाद उन्होंने पीछे म़ुडकर नहीं देखा.

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प्रकृति से जु़डी है हमारी संस्कृति

इंसान ही नहीं दुनिया की कोई भी नस्ल जल, जंगल और ज़मीन के बिना ज़िंदा नहीं रह सकती. ये तीनों हमारे जीवन का आधार हैं. यह भारतीय संस्कृति की विशेषता है कि उसने प्रकृति को विशेष महत्व दिया है. पहले जंगल पूज्य थे, श्रद्धेय थे. इसलिए उनकी पवित्रता को बनाए रखने के लिए मंत्रों का सहारा लिया गया. मगर गुज़रते व़क्त के साथ जंगल से जु़डी भावनाएं और संवेदनाएं भी बदल गई हैं.

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मन को छूते मेरे गीत

गीत मन के भावों की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति हैं. साहित्य ज्योतिपर्व प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक मेरे गीत में सतीश सक्सेना ने भी अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरोकर गीतों की रचना की है. वह कहते हैं कि वास्तव में मेरे गीत मेरे हृदय के उद्‌गार हैं. इनमें मेरी मां है, मेरी बहन है, मेरी पत्नी है, मेरे बच्चे हैं. मैं उन्हें जो देना चाहता हूं, उनसे जो पानी चाहता, वही सब इनमें है.

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अ़खबारों से ग़ायब होता साहित्य

साहित्य समाज का आईना होता है. जिस समाज में जो घटता है, वही उस समाज के साहित्य में दिखलाई देता है. साहित्य के ज़रिये ही लोगों को समाज की उस सच्चाई का पता चलता है, जिसका अनुभव उसे खुद नहीं हुआ है. साथ ही उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का भी पता चलता है. जिस समाज का साहित्य जितना ज़्यादा उत्कृष्ट होगा, वह समाज उतना ही ज़्यादा सुसंस्कृत और समृद्ध होगा.

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समकालीन गीतिकाव्य पर बेहतरीन शोध ग्रंथ

अनंग प्रकाशन द्वारा प्रकाशित समकालीन गीतिकाव्य : संवेदना और शिल्प में लेखक डॉ. रामस्नेही लाल शर्मा यायावर ने हिंदी काव्य में 70 के दशक के बाद हुए संवेदनात्मक और शैल्पिक परिवर्तनों की आहट को पहचानने की कोशिश की है. नवगीतकारों को हमेशा यह शिकायत रही है कि उन्हें उतने समर्थ आलोचक नहीं मिले, जितने कविता को मिले हैं. दरअसल, समकालीन आद्यावधि गीत पर काम करने का खतरा तो बहुत कम लोग उठाना चाहते हैं.

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पीत पत्रकारिता : लोकायुक्त प्रारूप पर फ़र्ज़ी ख़बर छापी

बिहार में पत्रकारिता का स्तर कितना गिर रहा है, इसकी एक ताज़ा मिसाल है पटना से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान में टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल के नाम से प्रकाशित समाचार, जिसका शीर्षक है- लोकायुक्त का यह प्रारूप रोल मॉडल है.

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बड़े आयोजनों का बड़ा फ़र्क़

फॉर्मूला वन रेस के आयोजन से कुछ ही दिनों पहले चौथी दुनिया ने इस आयोजन में आने वाली अड़चनों पर चर्चा की थी. इस रेस में कहीं ब्रेकर तो नहीं शीर्षक से प्रकाशित उस ख़बर में कई बिंदुओं पर आशंका जताई गई थी

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निज भाषा पर अभिमान करो

हिंदी में प्रकाशित किसी भी कृति-उपन्यास या कहानी संग्रह या फिर कविता संग्रह को लेकर हिंदी जगत में उस तरह का उत्साह नहीं बन पाता है, जिस तरह अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में बनता है. क्या हम हिंदी वाले अपने लेखकों को या फिर उनकी कृतियों को लेकर उत्साहित नहीं हो पाते हैं. हिंदी में प्रकाशक पाठकों की कमी का रोना रोते हैं, जबकि पाठकों की शिकायत किताबों की उपलब्धता को लेकर रहती है.

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दिल्ली का बाबुः बाबुओं के बाबु

पिछले दिनों एक पुराने मित्र के पी सिंह का दिल्ली में देहांत हो गया, जिससे बहुत से वरिष्ठ बाबुओं को आघात पहुंचा. वैसे तो के पी से पहले उनके बहुत से मित्रों का देहावसान हो चुका है, लेकिन उनकी याद में आयोजित कार्यक्रम में शीर्षस्थ बाबू बड़ी संख्या में मौजूद थे.

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किताब से धुलेगा कलंक!

कांग्रेस ने दिल्ली के बुराड़ी में अपना दो दिवसीय 83वां अधिवेशन आयोजित किया. पार्टी के तमाम दिग्गज वहां जुटे और कांग्रेस ने महाअधिवेशन के दौरान ही अपने 125 साल पूरे होने के सालाना जलसे का समापन भी किया. इस मौक़े पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी ने दो खंडों में प्रकाशित किताब-कांग्रेस एंड द मेकिंग ऑफ द इंडियन नेशन का विमोचन किया.

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कौन कहता है हिंदी में पाठक नहीं है!

हिंदी में कुछ लोग लगातार पाठकों की कमी का रोना रोते रहे हैं, लेकिन हक़ीक़त इससे अलग है. हिंदी में प्रकाशकों की संख्या के साथ-साथ हर साल प्रकाशित होने वाली किताबों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है. हिंदी में भी कई लेखक ऐसे हैं, जिनकी किताबें अब भी बेहिसाब पढ़ी जा रही हैं और लगातार उनके संस्करण प्रकाशित हो रहे हैं.

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अनुवाद से जगती उम्मीदें

हिंदी में अनुवाद की हालत बेहद ख़राब है. जो अनुवाद हो भी रहे हैं, वे बहुधा स्तरीय नहीं होते हैं. अनुवाद इस तरह से किए जाते हैं कि मूल लेखन की आत्मा कराह उठती है. हिंदी के लेखकों में अनुवाद को लेकर बहुत उत्साह भी नहीं है. अमूनन अनुवाद में लेखक तभी जुटते हैं, जब उनके पास या तो काम कम होता है या नहीं होता है.

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