स्वर्णिम मध्य प्रदेश की पोल खोल

शिशु मृत्यु दर के मामले में मध्यप्रदेश लगातार एक दशक से अधिक समय से पूरे देश में पहले स्थान पर

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सरकार काम से ज्यादा प्रचार पर खर्च कर रही है

भारत सरकार एक निश्चित तरीके से काम कर रही है. उसका मानना है कि उसका ये तरीका ही सही है,

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उत्तर प्रदेश : नवरत्‍नों के सहारे कांग्रेस

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का कोई भी प्रयोग स़फल नहीं हो पा रहा है. सभी प्रयोग उसके लिए उलटे पड़ रहे हैं. दो दशक से अधिक का समय हो चुका है, लेकिन कांग्रेस एक बार डूबी तो फिर आज तक उबर नहीं पाई है. इस दौरान सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका वाड्रा सभी ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया. प्रदेश की कुर्सी पर कई अध्यक्ष बैठे. सबने बड़े-बड़े दावे किए, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कोई नहीं बदल पाया.

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पुस्तक मेले लेखकों का प्रचार मंच बन चुके हैं

विश्व में पुस्तक मेलों का एक लंबा इतिहास रहा है. पुस्तक मेलों का पाठकों की रुचि बढ़ाने से लेकर समाज में पुस्तक संस्कृति को बनाने और उसको विकसित करने में एक अहम योगदान रहा है. भारत में बड़े स्तर पर पुस्तक मेले सत्तर के दशक में लगने शुरू हुए. दिल्ली और कलकत्ता पुस्तक मेला शुरू हुआ. 1972 में भारत में पहले विश्व पुस्तक मेले का दिल्ली में आयोजन हुआ.

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माननीय बोले तो माफ, आमजन बोलें तो बदजुबान

उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार के दौरान जिन माननीयों की ज़ुबान से असंसदीय भाषा निकली, उनमें मायावती, बेनी प्रसाद वर्मा, नितिन गडकरी एवं सलमान खुर्शीद प्रमुख हैं. इन लोगों ने चुनाव प्रचार के दौरान मतदाताओं की तालियां बटोरने के लिए जोश में असंसदीय भाषा से गुरेज़ नहीं किया.

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असमः कांग्रेस और भाजपा ने पूरी ताकत झोंकी

असम में जहां कांग्रेस सत्ता बरक़रार रखने के लिए चुनाव मुहिम में पूरी ताक़त झोंक देना चाहती है, वहीं भारतीय जनता पार्टी किसी भी सूरत में कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने की रणनीति बनाने में जुटी है. यहां मुख्यमंत्री तरुण गोगोई की अगुवाई वाला कांग्रेस-बोडो पीपुल्स फ्रंट गठबंधन, भारतीय जनता पार्टी-असम गण परिषद का अनौपचारिक गठबंधन और बदरुद्दीन अजमल के नेतृत्व वाला ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट आदि चुनाव मैदान में हैं.

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दिल आया ब्रांड पर

अभिनेता और अभिनेत्रियां एक तरह से ट्रेंड सेटर का काम करते हैं. फिल्मों के ज़रिए जो भी नयापन उनके कपड़ों, बालों और अन्य चीजों में दिखाई पड़ता है यंग जनरेशन भी उसी की शौक़ीन हो जाती है. अभिनेत्रियों के कपड़ों के अलावा महंगी एसेसरीज जैसे बैग्स, जूते और घड़ियां भी युवाओं को ख़ूब लुभाते हैं और वह वैसी चीज पाने के लिए ख़ूब पैसा ख़र्च करते हैं.

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रोजी-रोटी के मुद्दे बेकार उड़नखटोले की महिमा अपरंपार

इस बार का बिहार विधानसभा चुनाव कई मायनों में याद किया जाएगा. आर्थिक व शैक्षणिक रूप से देश के सबसे पिछड़े हुए इस राज्य में अबतक हुए पांच चरणों के चुनाव में कई ऐसे आयाम नज़र आए, जिससे लोकतंत्र शर्मसार होता दिखा.

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चुनावी तड़काः जाना था जापान पहुंच गए…

जाना था जापान पहुंच गए चीन समझ गए ना… यह गीत अक्सर किसी न किसी हस्ती पर लागू होता रहता है. हाल में यह दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पर लागू हुआ. दरअसल हुआ यह कि शीला मोहिउद्दीन नगर विधानसभा क्षेत्र में कांगे्रस प्रत्याशी की सभा में प्रचार के लिए जा रही थीं, लेकिन रास्ते में उनका हेलीकॉप्टर भटक गया.

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चुनावी तड़काः मधेपुरा का असली नेता कौन?

बात फैली कि नीतीश कुमार इस बार मधेपुरा में कैंप करके चुनाव प्रचार करेंगे. इसके बाद तो तराज़ू पर एक तऱफ नीतीश और एक तऱफ शरद यादव को तौलने का सिलसिला शुरू हो गया. टिकट बंटवारे से पहले से ही आहत शरद यादव के समर्थकों का कहना था कि अब एक मधेपुरा ही तो बचा था शरद जी के लिए, वहां भी अगर माननीय कैंप करेंगे तो क्या मैसेज जाएगा.

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अन्‍नपूर्णा योजना का सचः काम कम, प्रचार ज्‍यादा

मध्य प्रदेश में ग़रीब वोट बैंक को अपने हक़ में हड़पने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने तरह-तरह के लुभावने राहतकारी और खैरात बांटने वाले कार्यक्रम शुरू किए हैं, लेकिन इन कार्यक्रमों का प्रचार ज़्यादा होता हैं, काम कम होता है.

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मेरे खिलाफ लिखना मना है

सरकार की योजनाओं और कामों को प्रचारित करने के लिए जनसंपर्क विभाग होता है. हर सरकार यही चाहती है कि उसके अच्छे कामों का प्रचार हो और सरकार की कमज़ोरियां बाहर न आएं. सरकार की विफलताओं और कमज़ोरियों को जनता के सामने लाना मीडिया का काम है. लेकिन बिहार में स्थिति अलग है.

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