संविधान में राजनीतिक दल का जिक्र नहीं है : बंधुत्व एकता की सीढ़ी है

पिछले अंक में आपने 26 जनवरी, 1950 को भारत के प्रजातांत्रिक देश बन जाने के बारे में पढ़ा. इस समापन

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सीएजी के प्रति कांग्रेस का रवैया यह प्रजातंत्र पर हमला है

सीएजी (कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल) यानी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट आई तो राजनीतिक हलक़ों में हंगामा मच गया. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 2006-2009 के बीच कोयले के आवंटन में देश को 1.86 लाख करोड़ का घाटा हुआ. जैसे ही यह रिपोर्ट संसद में पेश की गई, कांग्रेस के मंत्री और नेता सीएजी के खिला़फ जहर उगलने लगे. पहली प्रतिक्रिया यह थी कि सीएजी ने अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा का उल्लंघन किया.

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राइट टू रिकॉल और राइट टू रिजेक्‍ट के बिना यह प्रजातंत्र अधुरा है

अन्ना हजारे मूल बातें कहते हैं, इसलिए बड़े-बड़े विद्वान उनसे बहस नहीं कर सकते. सांसद सेवक हैं और देश की जनता मालिक है. अगर सेवक मालिक की बात न माने तो मालिक को यह हक़ है कि वह उसे बाहर कर दे. यही दलील अन्ना हजारे की है. देश को भ्रष्ट सांसदों से छुटकारा दिलाने के लिए राइट टू रिकॉल और राइट टू रिजेक्ट की मांग लेकर अन्ना हजारे और उनकी टीम आंदोलन करने वाली है.

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ऐसे खत्म हुआ अन्ना का अनशन

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने एक मंत्रिमंडलीय साथी से कहा कि अन्ना बदमाश हैं और उनके साथी बदमाशी कर रहे हैं. आम तौर पर मनमोहन सिंह इस भाषा के लिए जाने नहीं जाते, लेकिन शायद देश में चल रहे अन्ना हजारे के आंदोलन का दबाव इतना था कि वह भाषा की शालीनता भूल गए. उसी तरह, जैसे मनीष तिवारी उम्र और राजनैतिक शिष्टाचार के सामान्य नियम भूलकर अन्ना हजारे को तुम और भ्रष्टाचार में लिप्त बता बैठे.

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भाजपा में बहुत दम है…

भारतीय जनता पार्टी अब पार्टी विथ डिफरेंस के बजाय पार्टी इन डिलेमा बन गई है. दूसरे दलों से अलग होने का दंभ भरने वाली पार्टी अब असमंजस और विरोधाभास से ग्रसित हो चुकी है. वह भीषण गुटबाज़ी की चपेट में है, जिसकी वजह से पार्टी कार्यकर्ता आम जनता से दूर होते जा रहे हैं और पार्टी के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं में दूरियां बढ़ गई हैं. पार्टी के अंतर्द्वंद्व का हाल यह है कि नेता प्रतिपक्ष का कोई बयान आता है तो पार्टी के दूसरे नेता नाराज़ हो जाते हैं.

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प्रजातंत्र की लडा़ई में विदेशी ताकतें

लीबिया के हालात अभी भी गंभीर बने हुए हैं. न तो देश की जनता का विश्वास खो देने वाले मुअम्मर ग़द्दा़फी पीछे हटने को तैयार हैं और न जनता की तऱफ से सत्ता परिवर्तन के लिए लड़ रहे लड़ाके. इस बीच संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव से लैस नाटो की सेनाएं भी लड़ाकों के साथ मिलकर गद्दा़फी की सत्ता पलटने में जुट गई हैं. यह परिस्थिति अपने आप में विस्मयकारी है.

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भ्रष्टाचार के खिला़फ जनता को आगे आना होगा

हिंदुस्तान सबसे बड़ा प्रजातंत्र होने के बावजूद दुनिया का 72 वां सबसे भ्रष्ट देश है. दुनिया में 86 ऐसे देश हैं, जहां भारत से कम भ्रष्टाचार है. आज़ादी के बाद से ही हम भ्रष्टाचार के साथ जूझ रहे हैं. भ्रष्टाचार के खिला़फ कारगर क़ानून बनाने की योजना इंदिरा गांधी के समय से चल रही है. 42 साल गुज़र गए, फिर भी हमारी संसद लोकपाल क़ानून बना नहीं सकी.

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काले धन पर टिका भारतीय प्रजातंत्र

मैंने दो पत्रकारों को बात करते सुना था. एक ने दूसरे से कहा कि उसने शेयर बाज़ार घोटाले के एक आरोपी को प्रधानमंत्री के पास चार करोड़ रुपये ले जाते देखा था. दूसरे ने तपाक से कहा कि उसे विश्वास नहीं होता, क्योंकि प्रधानमंत्री इतनी छोटी रकम पर तो छींक भी नहीं मारेंगे.

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काले धन पर टिका भारतीय प्रजातंत्र

पीवी नरसिम्हाराव के समय की एक बात मुझे हमेशा याद आती है. मैंने दो पत्रकारों को बात करते सुना था. एक ने दूसरे से कहा कि उसने शेयर बाज़ार घोटाले के एक आरोपी को प्रधानमंत्री के पास चार करोड़ रुपये ले जाते देखा था. दूसरे ने तपाक से कहा कि उसे विश्वास नहीं होता, क्योंकि प्रधानमंत्री इतनी छोटी रकम पर तो छींक भी नहीं मारेंगे.

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नैतिक, रचनात्मक और राजनीतिक ज़िम्मेदारी

प्रजातंत्र में कोई भी सरकार तब तक प्रजातांत्रिक नहीं मानी जा सकती, जब तक वह अपने देश के नागरिकों के प्रति उत्तरदायी न हो, क्योंकि वह उन्हीं के लिए और उन्हीं के नाम पर राज्य करती है. एक संसदीय व्यवस्था में वह संसद के प्रति उत्तरदायी होती है. चलिए, बात शुरू से करते हैं.

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प्रजातंत्र के नाम पर चीरहरण

भारत ने पिछले दो दशकों में जिस ऊर्जा के साथ विकास किया है, सराहनीय है. लेकिन इस विकास का एक काला पक्ष भी है, जिसे न तो मीडिया देखना चाहता है और न ही देश का मध्यम वर्ग. इस विकास यात्रा के दौरान ग़रीबों की संख्या बढ़ती चली गई. भारत में विश्व के 25 फीसदी ग़रीब लोग थे और आज यह प्रतिशत 39 हो गया है.

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पश्चिम एशिया में क्रांतिः लोकतंत्र के लिए मुसलमान

जब भी किसी देश में लोग सड़कों पर बेरोज़गारी, महंगाई, ग़रीबी या किसी अन्य मांग को लेकर सरकार के खिला़फ लामबंद होते हैं तो उसे आंदोलन कहा जाता है. लेकिन जब कोई आंदोलन विद्रोह का रूप ले लेता है, जब किसी आंदोलन का मक़सद सत्ता परिवर्तन होता है तो उसे क्रांति कहते हैं.

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मुसलमान ही नहीं, प्रजातंत्र भी खतरे में है

भारत के मुसलमान देश के सबसे पीड़ित और शोषित वर्गों का हिस्सा बन चुके हैं. राजनीति में मुसलमान हाशिए पर हैं. प्रशासन, सेना और पुलिस में मुसलमानों की संख्या शर्मनाक रूप से कम है, न्यायालयों में मुसलमानों की उपस्थिति बहुत कम है और बाकी कसर उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की आर्थिक नीति ने पूरी कर दी है, जिसकी मार मुसलमानों पर सबसे ज़्यादा पड़ रही है.

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प्रजातंत्र जीतेगा या कमलनाथ

उत्तर भारत को दक्षिण भारत से जोड़ने वाले उत्तर-दक्षिण गलियारे का भविष्य केंद्रीय मंत्री कमलनाथ की जिद के कारण खतरे में पड़ता दिखाई दे रहा है. व्यक्तिगत लाभ के लिए व्यास नदी की धारा को मोड़ने वाले कमलनाथ अब विशेषज्ञों द्वारा स्वीकृत उत्तर-दक्षिण गलियारे को अपने संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा की ओर मोड़ना चाहते हैं.

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प्रजातंत्र, तानाशाही और अन्न स्वराज

बीटी-बैगन के मुद्दे पर भारत में छिड़ी बहस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि देश का कृषक और उपभोक्ता वर्ग जीएम फूड्‌स के पक्ष में नहीं है. सेंटर फॉर एंवायरमेंट एजूकेशन, जिसने पर्यावरण मंत्रालय की ओर से इस बहस का आयोजन किया, के अतुल पांड्या ने इससे संबंधित रिपोर्ट पेश की. बहस में देश भर के किसानों ने भाग लिया और अपने अनुभव बांटे.

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कुएं और खाई के बीच फंसी पाकिस्‍तान सरकार

भारतीय मीडिया में (23 फरवरी) को ऐसी ख़बरें आईं हैं कि पाकिस्तान में पेशावर के नज़दीक खैबर और ओराकज़ी इलाक़े में तालिबानी अतिवादियों ने दो सिखों की हत्या कर दी है. कत्ल किए गए लोग, सिखों के एक जत्थे का हिस्सा थे. इन सभी का लगभग एक माह पहले, तालिबानियों ने अपहरण कर लिया था. इन्हें छोड़ने के लिए तीन करोड़ रुपये की फिरौती की मांग की गई थी और फिरौती चुकाने की अंतिम तारीख़ निकल जाने के बाद इनमें से दो की हत्या कर दी गई.

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जरदारी के पास ज्‍यादा विकल्‍प नहीं

खबरों पर भरोसा करें तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसु़फ रजा गिलानी ने अपने विश्वस्त सहयोगियों को बता दिया है कि वह अब फिर कभी राष्ट्रपति आस़िफ अली जरदारी के बचाव में मैदान में नहीं उतरेंगे. हालांकि इस ख़बर में कितनी सच्चाई है, यह पता करना ख़ासा मुश्किल है, लेकिन इसके बाद के हालात पर ग़ौर करें तो इस पर संदेह की कोई गुंजाइश भी नहीं दिखती.

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शशि थरूर की सराहना होनी चाहिए

पुराने दौर में बादशाह के फरमान को खुदा का फैसला माना जाता था. शासन के फैसले स़िर्फ एक शख्स के हाथ में होते थे. वही राज्य का पहला और आ़खिरी न्यायाधीश होता था. समय के साथ-साथ शासन चलाने का तरीक़ा बदला. फैसला कौन करे, इस निर्णय प्रक्रिया में लोग जुड़ने लगे. दुनिया के कई देशों में फैसले का अधिकार अब आम जनता के हाथों में आ गया है, जिसे हम प्रजातंत्र कहते हैं.

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भाजपा का सबसे ज़्यादा नुक़सान संघ ने किया

बचपन में हमने एक कहानी पढ़ी थी कि कबूतर के अंडों को यूं ही पड़े देखकर कुछ बच्चों को लगा कि इन्हें एक घोसले में रखा जाए, ताकि अंडे खराब होने से बच जाएं. फिर बच्चों ने बड़े अरमान से एक घोसला बनाया. उसके बाद अंडों को उठाकर उस घोसले में रख दिया. जब कबूतर वापस लौटा तो उसने अंडों को ज़मीन पर फेंक दिया, जिससे सारे अंडे टूट गए. बच्चे इस बात से अनजान थे कि छूने मात्र से ही वे अंडे खराब हो जाएंगे. इस समय भाजपा की हालत अंडेकी तरह है और संघ बच्चों की तरह उससे खेल रहा है. नतीजा क्या निकलने वाला है, यह भी तय है.

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हाफिज सईद और पाकिस्तान की मजबूरी

क्या भारत की सरकार हा़फिज़ सईद के लिए अपने पड़ोसी से हमेशा के लिए बातचीत बंद कर देगी या फिर भारत का यह रुख़ स़िर्फ महाराष्ट्र और हरियाणा में होने वाले चुनाव तक के लिए सीमित है? मुंबई के आंतकियों के मामले में क्या दोनों देशों की सरकारें अपनी-अपनी जनता को गुमराह कर रही हैं?

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