कैसे बचेगी गंगा-जमुनी तहजीब

गंगा की निर्मलता तभी संभव है, जब गंगा को अविरल बहने दिया जाए. यह एक ऐसा तथ्य है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है, लेकिन गंगा की स़फाई के नाम पर पिछले 20 सालों में हज़ारों करोड़ रुपये बहा दिए गए और नतीजे के नाम पर कुछ नहीं मिला. एक ओर स़फाई के नाम पर पैसों की लूटखसोट चलती रही और दूसरी ओर गंगा पर बांध बना-बनाकर उसके प्रवाह को थामने की साजिश होती रही.

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लद्दाख का बदलता पर्यावरण

प्रदूषण वायु, जल और धरती की भौतिक, रासायनिक और जैविक विशेषताओं का एक ऐसा अवांछनीय परिवर्तन है, जो जीवन को हानि पहुंचा सकता है. दुनिया भर में हो रहे तथाकथित विकास की प्रक्रिया ने प्रकृति एवं पर्यावरण के सामंजस्य को झकझोर दिया है. इस असंतुलन के चलते लद्दा़ख जैसे सुंदर क्षेत्र भी प्रदूषण जैसी समस्या से प्रभावित हुए हैं.

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मैली हो गई पतित पावनी सरयू नदी

अयोध्या-खिफैज़ाबाद शहरों को अपने आंचल में समेट, युगों-युगों से लोगों को पुण्य अर्जन कराती सरयू नदी की कोख भी अब मैली हो चली है. सरयू का पवित्र जल तो दूषित हुआ ही, भूजल में भी हानिकारक रसायनों की मात्रा बढ़ती जा रही है. दोनों शहरों के क़रीब दो दर्जन इंडिया मार्का हैंडपंपों में नाइट्रेट, आयरन आदि तत्वों की अधिकता पाई गई है.

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मरती नदियां, उजड़ता बुंदेलखंड

चंबल, नर्मदा, यमुना और टोंस आदि नदियों की सीमाओं में बसने वाला क्षेत्र बुंदेलखंड तेज़ी से रेगिस्तान बनने की दिशा में अग्रसर है. केन और बेतवा को जोड़कर इस क्षेत्र में पानी लाने की योजना मुश्किलों में फंस गई है. जो चंदेलकालीन हज़ारों तालाब बुंदेलखंड के भूगर्भ जल स्रोतों को मज़बूती प्रदान करते थे, वे पिछले दो दशकों के दौरान भू-मा़फिया की भेंट चढ़ गए हैं.

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अब तो मां का दूध भी जहर हो गया है

देश की नदियों की हालत बेहद खराब है. इनमें गंगा, यमुना, दामोदर, सोन, कावेरी, नर्मदा एवं साही आदि शामिल हैं. गंगा जैसी पवित्र नदी भी प्रदूषण की शिकार होकर दुनिया की सर्वाधिक प्रदूषित नदियों में शामिल हो गई है. इसका 23 फीसदी जल प्रदूषित हो चुका है.

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छत्तीसगढ़ः हवाओं में प्रदूषण का ज़हर

छत्तीसगढ़ ने राज्य बनने के बाद पिछले दस सालों में खूब तरक्क़ी की है. आज छत्तीसगढ़ की कई योजनाएं राष्ट्रीय स्तर पर सराही जा रही हैं. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार के पीडीएस सिस्टम को सभी राज्यों में लागू करने की सलाह दी है, लेकिन दूसरी ओर प्रदूषण के मामले में भी छत्तीसगढ़ धीरे-धीरे अव्वल नंबर पर पहुंचता जा रहा है.

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भोजन में मीठा जहर

देश की एक बड़ी आबादी धीमा ज़हर खाने को मजबूर है, क्योंकि उसके पास इसके अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है. हम बात कर रहे हैं भोजन के साथ लिए जा रहे उस धीमे ज़हर की, जो सिंचाई जल और कीटनाशकों के ज़रिए अनाज, सब्ज़ियों और फलों में शामिल हो चुका है. देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों में आर्सेनिक सिंचाई जल के माध्यम से फसलों को ज़हरीला बना रहा है.

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रिहायशी इलाक़े में व्यवसायिक गतिविधियों से परेशान हैं?

यह समस्या लगभग हर छोटे-बड़े शहर की है. आवासीय-रिहायशी इलाक़ों में लालची और स्वार्थी किस्म के लोग ऐसे-ऐसे व्यवसाय शुरू कर देते हैं, जिनकी वजह से उस इलाक़े में रहने वाले लोगों के लिए कई सारी समस्याएं खड़ी हो जाती है.

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अब सरयू नदी भी खतरे में

नदियों में लगातार ब़ढते प्रदूषण के कारण आज तमाम नदियों का अस्तित्व खतरे में है. गंगा यमुना जैसी बड़ी नदियों के साथ ही छोटी नदियों की हालत तो और भी खराब है. इन छोटी नदियों की सा़फ स़फाई की तऱफ तो किसी का ध्यान भी नहीं है.

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पारीछा थर्मल पावर प्रोजेक्‍ट राख ने नर्क बना दी जिंदगी

बुंदेलखंड के वाशिंदों को विकास के नाम पर विनाश के भंवर जाल में उलझाने का खेल खेला जा रहा है. झांसी मुख्यालय से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पारीछा थर्मल पावर स्टेशन की गगनचुंबी चिमनियों से निकलने वाली राख ने आसपास के गांवों में रहने वाले हज़ारों लोगों की ज़िंदगी नर्क कर दी है.

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भूमिहीनों का होगा बीमा

श्रम संसाधन मंत्री जनार्दन सिंह सिग्रीवाल के प्रयास से राज्य के ग्रामीण भूमिहीनों का बीमा मुफ्त में किया जाएगा, जिसका प्रीमियम 2 सौ रुपया सालाना सरकार भरेगी. वैसे उन ग्रामीण भूमिहीनों का बीमा होगा, जिनकी ज़मीन 50 डेसिमिल से कम होगी और जिनकी उम्र 18 से 59 वर्ष के बीच होगी.

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नसों में घुल रहा है आर्सेनिक का जहर

आर्सेनिक के विष से अकेले उत्तर प्रदेश की जनता ही जानलेवा बीमारियों का शिकार नहीं रही है बल्कि बिहार और पश्चिम बंगाल में इसका कहर और अधिक है. चिकित्सकों की मानें तो आर्सेनिक युक्त पानी लंबे समय तक पीने से कई भयंकर बीमारियां शरीर को दबोच लेती हैं. त्वचा का कैंसर हो सकता है.

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पुस्‍तक अंशः मुन्‍नी मोबाइल- 49

आनंद भारती नील को सुन रहे थे. उनके सामने दिल्ली की जमुना का चेहरा उभर आया. करोड़ों रुपये का प्रोजेक्ट बनने के बाद भी जमुना ज़हर की नदी बनी हुई है. नेता और नौकरशाह पैसा डकार चुके हैं.

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शहर इंसानों के लायक नहीं रहे

दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेल होने हैं. दिल्ली को विश्वस्तरीय शहर के रूप में तैयार किया जा रहा था. बारिश ने सरकार और योजना बनाने वाले उच्च अधिकारियों की पोल खोल दी. देश की राजधानी में बारिश के पानी की निकासी का इंतज़ाम नहीं है. रिहायशी इलाक़ों से लेकर सड़कों तक पानी भर गया. ट्रैफिक जाम के चलते लोग घंटों रास्ते में फंसे रहे.

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कराहती नदियां

कभी जीवनदायिनी रहीं हमारी पवित्र नदियां आज कूड़ा घर बन जाने से कराह रही हैं, दम तोड़ रही हैं. गंगा, यमुना, घाघरा, बेतवा, सरयू, गोमती, काली, आमी, राप्ती, केन एवं मंदाकिनी आदि नदियों के सामने ख़ुद का अस्तित्व बरकरार रखने की चिंता उत्पन्न हो गई है.

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बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दानवी चरित्र

यूनियन कार्बाइड कारखाने से हुई दुर्घटना और उसके बाद इस बहुराष्ट्रीय कंपनी की अमानवीय करतूतों पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है. एक रात में 15 हज़ार से ज़्यादा मासूम नागरिकों को मौत की नींद सुलाने वाली इस कंपनी को हमारी प्रशासनिक-न्यायिक व्यवस्था ने आसानी से कैसे छोड़ दिया?

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औद्योगिक विनाश की कगार पर कोरबा

लगातार गिरता भूजल स्तर, लाखों टन राख से दबी हुई धरती और दर्जन भर चिमनियों से आसमान में उड़ती धुएं की राख धरती के बंजर होते खेत-खलियान, नदियों और वातावरण में एक जहर लगातार घोलते जा रहे हैं. प्रदूषण स्तर की भयावह स्थिति से लगातार प्रभावित है कोरबा जिला…….

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पर्यावरण का रखवाला जय श्रीराम

बख्तियारपुर (पटना) निवासी आरक्षी जितेंद्र शर्मा उ़र्फ जय श्रीराम उन चंद पुलिसकर्मियों में शामिल हैं, जिनके कार्य से प्रभावित हुए बिना कोई नहीं रह सकता. पटना के यातायात थाने में तैनात बिहार पुलिस का यह जवान एक अलग कार्य संस्कृति और जीवनशैली के लिए मशहूर हो रहा है.

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सार–संक्षेप: सैकड़ों गांवों में नाइट्राइट का क़हर

सतना ज़िले के 1700 गांव में से 200 गांवों में भूजल में नाइट्राइट के मिलने की पुष्टि हुई है. इस खबर के बाद स्थानीय ग्रामीणों के चहरे पर खुशी के भाव मिल रहे हैं, तो दूसरी ओर प्रदूषण विभाग के लिए यह विषय चिंता का कारण बना हुआ है. नाइट्राइट एक प्रकार का सूचक होता है जो यह बताता है कि धरती के सैकड़ों फिट नीचे भूजल तक ऊपर का प्रदूषण पहूंच चुका है.

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प्रदूषण के कारण गिद्ध प्रजाति खतरे में

गिद्ध भले ही डरावने और बदसूरत दिखाई देते हों, लेकिन ये जीव प्रकृति के सबसे बड़े स़फाई कर्मचारी हैं, जो धरती पर पड़े लावारिश पशु-पक्षियों के शवों को खाकर अपना पेट भरते हैं. इतना ही नहीं, ये गिद्ध शाकाहारी भोजन का कचरा भी मज़े से खा लेते हैं. लेकिन अब गिद्ध प्रजाति संकट में हैं. शहरों में तथा बड़ी आबादी वाले गांव में तो गिद्ध के दर्शन भी दुर्लभ हो चुके हैं.

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बांग्‍लादेश ग्‍लोबल वार्मिंग से निबटने की तैयारी

बांग्लादेशी समाज का तक़रीबन हर तबका सरकारी तंत्र, नागरिक संस्थाएं और देश के प्रमुख विश्वविद्यालय, पर्यावरण पर मची हलचल को लेकर कौतूहल में हैं. सबकी निगाहें इसी पर टिकी हैं कि अब आगे क्या होने वाला है. इस साल की शुरुआत से ही देश भर में इस विषय पर सभा-सेमिनारों की संख्या लगातार ब़ढ रही है.

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पर्यावरण सुरक्षा और भारत

क्योटो प्रोटोकॉल के प्रति भारत का दृष्टिकोण

भारत ने अगस्त, 2002 में क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए और उसका अनुमोदन किया. इस प्रोटोकॉल की कई शर्तों से भारत को छूट हासिल है और तकनीकी हस्तांतरण एवं विदेशी निवेश के क्षेत्र में फायदा हो सकता है.

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ग्‍लोबल वार्मिंग बनाम मानवाधिकार

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए उठाए गए क़दमों की सुस्त चाल से, इससे प्रभावित हो रहे समुदायों में स्वाभाविक रूप से निराशा बढ़ी. परंपरागत राजनैतिक-वैज्ञानिक पद्धतियों पर आधारित उक्त उपाय ज़्यादा प्रभावी साबित नहीं हो रहे थे, पीड़ित लोगों की समस्याओं की अनदेखी हो रही थी और सबसे बड़ी बात यह थी कि मानवीय गतिविधियों के चलते वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि के लिए ज़िम्मेदारी तय करने की कोई व्यवस्था न होने से प्रभावित समुदायों को लगातार मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था.

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सार–संक्षेप : मछलियों की पचास प्रजातियां विलुप्त

मध्य प्रदेश की जीवनरेखा कही जाने वाली पवित्र नदी नर्मदा में प्रदूषण का स्तर घातक स्थिति में पहुंच चुका है. पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि नर्मदा नदी में बढ़ते प्रदूषण और छोटे-बड़े बांधों से पानी में ठहराव के कारण कई स्थानों पर मछलियों के जीवन पर संकट मंडरा रहा है. यह जानकारी नर्मदा समग्र बांद्राभान (होशंगाबाद) में आयोजित अंतरराष्ट्रीय नदी महोत्सव में आए विशेषज्ञों ने दी.

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जोहानेसबर्ग पृथ्‍वी सम्‍मेलन था दीर्घकालिक विकास के लिए

दक्षिण अफ्रीका के जोहानेसबर्ग में जो वैश्विक सम्मेलन (डब्ल्यूएसएसडी), 2002 में हुआ था, वह मूल रूप से दीर्घकालिक विकास पर केंद्रित था, हालांकि तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने उसका बहिष्कार किया था. इसीलिए उसके एजेंडे में ग्लोबल वार्मिंग का मुद्‌दा उतना अहम नहीं था.

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चंपारण देगा ग्‍लोबल वार्मिंग का समाधान

ग्‍लोबल वार्मिंग के मुद्दे पर रियो डी जेनेरियो से ले कर कोपेनहेगन तक की बैठक में राष्ट्र प्रमुख अपनी-अपनी चिंता ज़ाहिर कर चुके हैं, लेकिन दुख की बात यह है कि उनकी यह चिंता अब तक किसी ठोस समाधान के रूप में नहीं बदल सकी है. इस विश्व-व्यापी समस्या का एक शुरुआती लेकिन ठोस समाधान निकाला है बिहार के पूर्वी चंपारण ज़िले के विरेंद्र कुमार सिन्हा ने.

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ग्‍लोबल वॉर्मिंग कानूनी पहलू और अंतरराष्‍ट्रीय समुदाय

पिछले कुछ वर्षों में पर्यावरण में जो बदलाव आ रहे हैं, उनके कारण देश भर में इस विषय पर गंभीर बहस चलने लगी है. इन बदलावों को नियमित करने वाले क़ानून पर्यावरण से जुड़े विस्तृत न्याय व्यवस्था का एक हिस्सा हैं. इस संदर्भ में आम राय यह है कि प्रदूषण एक ऐसी समस्या है जो राष्ट्रीय सीमाओं से परे है और जिसको नियंत्रित करने की दिशा में हर राष्ट्र को पहल करनी चाहिए.

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कचरे के चलते रोजी-रोटी का संकट

नई परियोजनाओं पर आठ महीने के लिए रोक लगना धनबाद में गर्त में जाते उद्योग जगत के लिए एक और चुनौती है. खासकर रोजगार के दृष्टिकोण से यह निर्णय विकट स्थिति पैदा करने के लिए का़फी है. धनबाद ज़िला प्रशासन, कोल कंपनियों के प्रबंधन और राज्य सरकार की अदूरदर्शी सोच के कारण यह विकट स्थिति उत्पन्न हुई है. अगर तीनों में से किसी ने भी सकारात्मक भूमिका निभाई होती तो आज इस स्थिति का सामना न करना पड़ता. इतना ही नहीं, अगर अगले आठ महीनों में भी कोई परिवर्तन न हुआ तो निश्चित रूप से लोगों के सामने और भी विकट स्थिति उत्पन्न हो जाएगी.

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