रंगराजन समिति की सिफारिश किसान विरोधी

पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में गन्ना उत्पादक किसानों ने संसद का घेराव किया. आंदोलनकारी किसानों के समर्थन में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुल्तान अहमद भी खुलकर सामने आए. देश के अलग-अलग राज्यों से आए किसान जब संसद के बाहर आंदोलन कर रहे थे, उसी दिन संसद के भीतर माननीय सदस्य एफडीआई के मुद्दे पर बहस कर रहे थे.

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शेखावटी- जैविक खेती : …और कारवां बनता जा रहा है

पंजाब में नहरों का जाल है. गुजरात और महाराष्ट्र विकसित राज्य की श्रेणी में हैं. बावजूद इसके यहां के किसानों को आत्महत्या करनी प़डती है. इसके मुक़ाबले राजस्थान का शेखावाटी एक कम विकसित क्षेत्र है. पानी की कमी और रेतीली ज़मीन होने के बाद भी यहां के किसानों को देखकर एक आम आदमी के मन में भी खेती का पेशा अपनाने की इच्छा जागृत होती है, तो इसके पीछे ज़रूर कोई न कोई ठोस वजह होगी. आखिर क्या है वह वजह, जानिए इस रिपोर्ट में:

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जनता को चिढ़ाइए मत, जनता से डरिए

शायद सरकारें कभी नहीं समझेंगी कि उनके अनसुनेपन का या उनकी असंवेदनशीलता का लोगों पर क्या असर पड़ता है. फिर चाहे वह सरकार दिल्ली की हो या चाहे वह सरकार मध्य प्रदेश की हो या फिर वह सरकार तमिलनाडु की हो. कश्मीर में हम कश्मीर की राज्य सरकार की बात इसलिए नहीं कर सकते, क्योंकि कश्मीर की राज्य सरकार का कहना है कि वह जो कहती है केंद्र सरकार के कहने पर कहती है, और जो करती है वह केंद्र सरकार के करने पर करती है.

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भारतीय बीज जीन बैंक पर खतरा : निजी कृषि कंपनियों के हाथों बेचने की साजिश

यूनेस्को ने भारत के कई स्थानों की जैव विविधता को विश्व के लिए महत्वपूर्ण कृषि विरासत एवं खाद्य सुरक्षा के लिए उपयोगी मानते हुए उन्हें संरक्षित करने की बात कही है. 12वीं शताब्दी में ही रूस के प्रसिद्ध वनस्पति विज्ञानी निकोलाई वाविलो ने भारत को कई फसलों का उत्पत्ति केंद्र (ओरिजिन ऑफ क्रोप) बताया था. फिर भी जैव विविधताओं से भरे इस देश में जब एक किसान को विदेशी कंपनियों से बीज खरीदने पड़ें तो इसे क्या कहेंगे?

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मक्का उत्पादकों का दर्द : अनाज की क़ीमत किसान तय करें

जनकवि नागार्जुन ने अकाल के बाद शीर्षक से यह कविता उस दौर में लिखी थी, जब देश में न तो हरित क्रांति आई थी और न आधुनिक तरीक़े से खेती होती थी. उस समय किसान अपनी खेती पूरी तरह परंपरागत ढंग से करते थे.

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मुद्रास्फीति और बैंकिंग

स्टेट बैंक से किसी भी शहर या क़स्बे में आर्थिक सहायता प्राप्त हो सकती है. हालांकि अभी तक स्टेट बैंक का संचालन पूर्ण रूप से राष्ट्रीयकरण की पद्धति पर हुआ नहीं है. अब भी सब ओहदेदार ऑफिसर वर्ग या कर्मचारीगण उसी पुराने साम्राज्य के प्यादे ही हैं, जो पूंजीपतियों के अधीन था. अतएव वर्षों से चली आ रही अपनी आदतों को वे सहसा छोड़ नहीं सकते.

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जनता के धैर्य की परीक्षा मत लीजिए

सरकार ने एक झटके में पेट्रोल के दाम बढ़ा दिए. डीजल और रसोई गैस के दाम वैसे ही ज़्यादा हैं, लेकिन अभी और बढ़ सकते हैं. सरकार को मालूम था कि देश में इसका विरोध होगा, गुस्सा पैदा होगा, कुछ विपक्षी पार्टियां लकीर पीटने के लिए आंदोलन की घोषणा करेंगी और सिंबोलिक आंदोलन भी होंगे, इसके बावजूद उसने पेट्रोल के दाम 12 प्रतिशत से ज़्यादा बढ़ा दिए.

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फसल बीमा योजना किसानों के साथ छलावा है

हमारे मुल्क में किसानों की हालत सुधारने या उन्हें राहत देने के मक़सद से सरकारी स्तर पर कई पहल हुई हैं. एक दशक पहले शुरू हुई राष्ट्रीय फसल बीमा योजना ऐसी ही एक पहल है. इस योजना का सीधा-सीधा मक़सद फसल नष्ट होने की स्थिति में क्षतिपूर्ति करना और किसान को मदद पहुंचाना है. अपने घोषित मक़सद की वजह से ज़ाहिर है कि यह योजना काफी लोकलुभावनी दिखाई देती है, लेकिन हक़ीक़त इसके उलट है.

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जैविक खेती समय की जरूरत

राजस्थान के शेखावाटी इलाक़े के किसान कुछ साल पहले पानी की समस्या से परेशान थे. खेती में ख़र्च इतना ज़्यादा बढ़ गया था कि फसल उपजाने में उनकी हालत दिन-प्रतिदिन खराब होती चली गई, लेकिन कृषि के क्षेत्र में यहां एक ऐसी क्रांति आई, जिससे यह इलाक़ा आज भारत के दूसरे इलाक़ों से कहीं पीछे नहीं है. शेखावाटी में आए इस बदलाव के पीछे मोरारका फाउंडेशन की वर्षों की मेहनत है.

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बिहारः क़िस्मत के मारे क़िसान

राज्य सरकार के कृषि विभाग के अधिकारियों ने आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र से बड़ी-बड़ी कंपनियों के मूंग के बीज मंगवा कर किसानों के बीच उनका मुफ्त वितरण कराया. साथ ही खाद, कीटनाशक एवं खरपतवार नाशक भी वितरित किए गए. पौधे ख़ूब लहलहाए, उन्हें देखकर किसान हर्षित थे, लेकिन उन पौधों में दाने नहीं आए.

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भोजन में मीठा जहर

देश की एक बड़ी आबादी धीमा ज़हर खाने को मजबूर है, क्योंकि उसके पास इसके अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है. हम बात कर रहे हैं भोजन के साथ लिए जा रहे उस धीमे ज़हर की, जो सिंचाई जल और कीटनाशकों के ज़रिए अनाज, सब्ज़ियों और फलों में शामिल हो चुका है. देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों में आर्सेनिक सिंचाई जल के माध्यम से फसलों को ज़हरीला बना रहा है.

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शाहाबादः कहीं बंजर न हो जाए जमीन

सन 1857 की क्रांति के दौरान जब शाहाबाद की धरती ने आग उगलना शुरू किया तब यहां के लोगों को सिंचाई के संसाधन देकर कृषि कार्य कीतरफ मोड़ने के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने एक बड़ी परियोजना की शुरूआत की थी. डेहरी के ऐनकार्ट में सोन नदी पर एक बांध बना और पूरे शाहाबाद में नहरों का जाल बिछाने की कवायद तेज़ हुई.

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अब खुशी के आंसू लाएगा प्‍याज

भले ही प्याज आपको रूलाता हो, लेकिन सेहत के नज़रिए से यह का़फी फायदेमंद है. वैज्ञानिकों का तो दावा है कि प्याज खाने से दिल संबंधी रोगों का खतरा बहुत कम हो जाता है. यही नहीं प्याज खराब कोलेस्ट्रॉल को भी शरीर से बाहर निकालने में मदद करता है.

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केले की खेती ने किया मालामाल

गत वर्ष दो एकड़ में केले की खेती की थी, इस बार तीन एकड़ में. बैंक से रिटायर्ड होने के बाद पूरी तरह से खेती की तऱफ ध्यान लगाया. पहले गन्ना की खेती करता था, जिसमें एक मुश्त रक़म मिल जाती थी. लेकिन रिटायर्ड होने के बाद बढ़ती महंगाई ने खर्च बढ़ा दिया.

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पूर्वी चंपारणः फसल पर नील गायों का कहर

प्रतिवर्ष बाढ़ और सुखाड़ जैसी आपदा से लहूलुहान किसान वन विभाग की लापरवाही की वजह से भी परेशानियों का सामना कर रहे हैं. नीलगायों की बढ़ती संख्या से फसलों की बर्बादी इस कदर बढ़ गई है कि किसानों के चेहरे मायूस हो गए हैं.

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नकली बीज की मार से बेहाल किसानः पसीने की जगह माथे से रिसने लगा खून

अच्छी पैदावार के लिए खेतों में पसीना बहाने वाले किसानों के माथे से इस बार पसीने की शक्ल में खून बह रहा है. दरअसल नकली बीजों का काला कारोबार करने वालों ने किसानों को असली बीज के पैकेट में मक्के के नकली बीज बेच दिए, जिसके कारण पैदावार सही नहीं हुई.

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एक बार फिर जी एम खाद्य पदार्थ लाने की तैयारी

खाद्य सुरक्षा के नाम पर एक बार फिर हमारे मुल्क में जीएम फसलों और खाद्य पदार्थों के प्रवेश की तैयारियां हैं. जीएम फूड के ख़िला़फ उठी तमाम आवाज़ों और पर्यावरण एवं जैव तकनीक मंत्रालय के मतभेदों को दरकिनार कर यूपीए सरकार संसद के मानसून सत्र में भारतीय जैव नियामक प्राधिकरण विधेयक 2009 लाने का मन बना रही है.

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सूख रहा धान का कटोरा

एक कहावत है, उचित समय और मौसम देखकर बंजर भूमि भी सोना उगलने लगती है. इसके विपरीत सदियों से सोना उगलने वाली शाहाबाद की धरती इस बार नाकाम साबित हो रही है. इंद्रदेव के कोप से यहां की भूमि बंजर होने के क़रीब है.

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किसान पुत्र का राज और किसान आंदोलन

मध्य प्रदेश सरकार की कृषि और किसान हितैषी नीतियों की पोल राज्य में हर साल होने वाले किसान आंदोलनों से खुल जाती है. राज्य सरकार ने किसान आंदोलनों का लाठी-गोली से दमन तो किया, लेकिन किसानों की समस्याओं को सुलझाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.

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बीटी बैगन पर रोक के वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक पहलू

बीटी बैगन के इस्तेमाल पर पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने फिलहाल रोक की घोषणा की तो मीडिया में उसके ख़िला़फ आलोचनाओं का अंबार लग गया. कई लोगों ने तर्क दिए कि ऐसे फैसले वैज्ञानिकों के लिए छोड़ दिए जाने चाहिए. लेकिन यह मामला विज्ञान और विज्ञान विरोध का नहीं है.

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टाल में दाल पर आफत

देश भर में दाल की आसमान छूती क़ीमतों ने हर तबके को परेशानी में डाल रखा है. एक तो महंगाई की मार, ऊपर से दलहन के उत्पादन में कमी ने लोगों को परेशान कर दिया है. वे अगले साल की फसल के लिए अभी से चिंतित हैं.

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पान किसानों पर मौसम की मार

लबों की शान बने बुंदेली पान की खेती उत्तर प्रदेश के ललितपुर, झांसी एवं महोबा और मध्य प्रदेश के सागर, छतरपुर एवं टीकमगढ़ आदि जनपदों में होती है. उत्पादन नगरी पाली ललितपुर में पान की खेती करने वाले किसान आज सरकारी उदासीनता और मौसम की बेरुख़ी के कारण उजाड़ ज़िंदगी जीने को अभिशप्त हैं.

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जैविक खेती देश भर में फैलता आंदोलन

कुछ व़क्त पहले तक हम भारतीयों में से ज़्यादातर ऑर्गेनिक फूड की ख़ूबियों से वाक़ि़फ तक नहीं थे. यह विदेशियों की ज़्यादा पसंद हुआ करता था, पर अब हालात बदल चुके हैं. अब भारतीय बाज़ार न स़िर्फ ऑर्गेनिक उत्पादों से अटे पड़े हैं, बल्कि बहुतायत में ऑर्गेनिक उत्पादों की खेती भी की जा रही है.

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चटकलिया मज़दूरों पर लटका जूट का फंदा

कोलकाता के पास टीटागढ़ के जूट मिल मज़दूर शाम को चौपाल में जब लोक गायिका प्रतिभा सिंह का यह गीत गाते हैं तो माहौल गमगीन हो जाता है. ढोलक की थाप और झाल की झनकार में सिसकते आंसुओं की आवाज़ भले ही दब जाती हो, पर जैसे-जैसे समय बीत रहा है, वैसे-वैसे जूट मज़दूरों की बस्तियों में दरिद्रता का अंधेरा गहराता जा रहा है. सूदखोरों की चांदी है.

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