रंगराजन समिति की सिफारिश किसान विरोधी

पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में गन्ना उत्पादक किसानों ने संसद का घेराव किया. आंदोलनकारी किसानों के समर्थन में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुल्तान अहमद भी खुलकर सामने आए. देश के अलग-अलग राज्यों से आए किसान जब संसद के बाहर आंदोलन कर रहे थे, उसी दिन संसद के भीतर माननीय सदस्य एफडीआई के मुद्दे पर बहस कर रहे थे.

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हम तो ख़ुद अपने हाथों बेइज़्ज़त हो गए

जी न्यूज़ नेटवर्क के दो संपादक पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए. इस गिरफ्तारी को लेकर ज़ी न्यूज़ ने एक प्रेस कांफ्रेंस की. अगर वे प्रेस कांफ्रेंस न करते तो शायद ज़्यादा अच्छा रहता. इस प्रेस कांफ्रेंस के दो मुख्य बिंदु रहे. पहला यह कि जब अदालत में केस चल रहा है तो संपादकों को क्यों गिरफ्तार किया गया और दूसरा यह कि पुलिस ने धारा 385 क्यों लगाई, उसे 384 लगानी चाहिए थी. नवीन जिंदल देश के उन 500 लोगों में आते हैं, जिनके लिए सरकार, विपक्षी दल और पूरी संसद काम कर रही है.

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किसानों पर गोलियां चलाने से हल नहीं निकलेगा

भारत भी अजीब देश है. यहां कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें फायदा पहुंचाने के लिए सरकार सारे दरवाज़े खोल देती है. कुछ लोग ऐसे हैं, जिन्हें लाभ पहुंचाने के लिए नियम-क़ानून भी बदल दिए जाते हैं. कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनके हितों की रक्षा सरकारी तंत्र स्वयं ही कर देता है, मतलब यह कि किसी को कानोंकान खबर तक नहीं होती और उन्हें बिना शोर-शराबे के फायदा पहुंचा दिया जाता है.

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सरकार जवाब दे यह देश किसका है

हाल में देश में हुए बदलावों ने एक आधारभूत सवाल पूछने के लिए मजबूर कर दिया है. सवाल है कि आखिर यह देश किसका है? सरकार द्वारा देश के लिए बनाई गई आर्थिक नीतियां और राजनीतिक वातावरण समाज के किस वर्ग के लोगों के फायदे के लिए होनी चाहिए? लाजिमी जवाब होगा कि सरकार को हर वर्ग का ख्याल रखना चाहिए. आज भी देश के साठ प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं. मुख्य रूप से सरकारी और निजी क्षेत्र में काम कर रहा संगठित मज़दूर वर्ग भी महत्वपूर्ण है.

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लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ मत कीजिए

सरकार का संकट उसकी अपनी कार्यप्रणाली का नतीजा है. सरकार काम कर रही है, लेकिन पार्टी काम नहीं कर रही है और हक़ीक़त यह है कि कांग्रेस पार्टी की कोई सोच भी नहीं है, वह सरकार का एजेंडा मानने के लिए मजबूर है. सरकार को लगता है कि उसे वे सारे काम अब आनन-फानन में कर लेने चाहिए, जिनका वायदा वह अमेरिकन फाइनेंसियल इंस्टीट्यूशंस या अमेरिकी नीति निर्धारकों से कर चुकी है.

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इतिहास कभी मा़फ नहीं करता

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पंद्रह अगस्त को लाल क़िले से देश को संबोधित किया. संबोधन से पहले लोग आशा कर रहे थे कि वह उन सारे सवालों का जवाब देंगे, जो देश के सामने हैं या जिन्हें उनके सामने उठाया जा रहा है. विरोधी दल तो कोई सवाल उठा नहीं रहे हैं, सवाल स़िर्फ अन्ना हजारे और बाबा रामदेव उठा रहे हैं. उन सवालों को जनता का समर्थन भी हासिल है, जिनका जवाब प्रधानमंत्री को लाल क़िले से देना चाहिए था.

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बदलाव का आनंद

विश्नाथन आनंद का मानना है कि भारत में खेल के प्रति लोगों की आम धारणा में बदलाव आया है और इसका फायदा उठाना होगा. इंडियन ग्रां प्री की सफलता पर ज़ोर देते हुए आनंद ने कहा कि मुझे महसूस हो रहा है कि पिछले कुछ समय में खेलों के प्रति भारतीयों के रवैये में बदलाव आया है.

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