निर्भया गैंगरेप: आज दोषियों को लेकर अपना फैसला सुनाएगा SC

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार शुक्रवार को दिल्ली में 2012 हुए निर्भया गैंगरेप मामले में फैसला सुनाने जा रहा

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टॉयलेट नहीं बनवाया तो नहीं कर पाएंगे निकाह

नई दिल्ली, (विनीत सिंह) : जमीयत-उलामा-ए-हिंद के सेक्रेटरी जनरल मौलाना महमूद मदनी ने कहा है कि जिस घर में टॉयलेट

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सेवानिवृत्‍त लेफ्टिनेंट कमांडर बेनीवाल : नियमों के जाल में उलझी पेंशन

तमाम सर्वे बताते हैं कि आज के युवा सेना में नौकरी करने की बजाय अन्य कोई पेशा अपनाना चाहते हैं. ऐसा नहीं है कि सेना की नौकरी के आकर्षण में कोई कमी आई हो या फिर वहां मिलने वाली सुविधाओं में कोई कटौती की गई हो, बावजूद इसके विभिन्न वजहों से सेना में नए अधिकारियों की कमी दिख रही है. उन्हीं वजहों में से एक है पेंशन का मामला. सेना में पेंशन विसंगतियों को लेकर संभवत: पहली बार कोई रिटायर्ड नौसेना अधिकारी सार्वजनिक रूप से सामने आया है. आखिर क्या है पूरी कहानी, पढ़िए चौथी दुनिया की इस एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में….

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फर्रुख़ाबाद को बदनाम मत कीजिए

मैं अभी तक पसोपेश में था कि सलमान खुर्शीद के खिला़फ कुछ लिखना चाहिए या नहीं. मेरे लिखे को सलमान खुर्शीद या सलमान खुर्शीद की जहनियत वाले कुछ और लोग उसके सही अर्थ में शायद नहीं लें. इसलिए भी लिखने से मैं बचता था कि मेरा और सलमान खुर्शीद का एक अजीब रिश्ता है. फर्रुख़ाबाद में हम दोनों पहली बार लोकसभा के चुनाव में आमने-सामने थे और चुनाव में सलमान खुर्शीद की हार और मेरी जीत हुई थी.

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बड़ी कठिन है न्‍याय की डगर

सब मानते हैं कि देर से मिला इंसा़फ भी नाइंसा़फी के बराबर होता है. इसके बावजूद हमारे देश में म़ुकदमे कई पीढि़यों तक चलते हैं. हालत यह है कि लोग अपने दादा और परदादा के म़ुकदमे अब तक झेल रहे हैं. इंसान खत्म हो जाता है, लेकिन म़ुकदमा बरक़रार रहता है. इसकी वजह से बेगुनाह लोग अपनी ज़िंदगी जेल की सला़खों के पीछे गुज़ार देते हैं. कई बार पूरी ज़िंदगी क़ैद में बिताने या मौत के बाद फैसला आता है कि वह व्यक्ति बेक़सूर है.

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इतिहास कभी मा़फ नहीं करता

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पंद्रह अगस्त को लाल क़िले से देश को संबोधित किया. संबोधन से पहले लोग आशा कर रहे थे कि वह उन सारे सवालों का जवाब देंगे, जो देश के सामने हैं या जिन्हें उनके सामने उठाया जा रहा है. विरोधी दल तो कोई सवाल उठा नहीं रहे हैं, सवाल स़िर्फ अन्ना हजारे और बाबा रामदेव उठा रहे हैं. उन सवालों को जनता का समर्थन भी हासिल है, जिनका जवाब प्रधानमंत्री को लाल क़िले से देना चाहिए था.

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विद्वान प्रधानमंत्री विफल प्रधानमंत्री

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ईमानदार हैं, सौम्य हैं, सभ्य हैं, मृदुभाषी एवं अल्पभाषी हैं, विद्वान हैं. उनके व्यक्तित्व की जितनी भी बड़ाई की जाए, कम है, लेकिन क्या उनकी ये विशेषताएं किसी प्रधानमंत्री के लिए पर्याप्त हैं? अगर पर्याप्त भी हैं तो उनकी ये विशेषताएं सरकार की कार्यशैली में दिखाई देनी चाहिए. अ़फसोस इस बात का है कि मनमोहन सिंह के उक्त गुण सरकार के कामकाज में दिखाई नहीं देते.

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असफल वित्त मंत्री सक्रिय राष्‍ट्रपति

वर्ष 2008 में ग्लोबल इकोनॉमी स्लो डाउन (वैश्विक मंदी) आया. उस समय वित्त मंत्री पी चिदंबरम थे. हिंदुस्तान में सेंसेक्स टूट गया था, लेकिन आम भावना यह थी कि इस मंदी का हिंदुस्तान में कोई असर नहीं होने वाला है. उन दिनों टाटा वग़ैरह का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा था और एक धारणा यह बनी कि भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व की अर्थव्यवस्था की ज़रूरत नहीं है.

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फैसले न लेने की कीमत

मनमोहन सिंह की बुनियादी समस्या यह है कि वह खुद फैसले नहीं लेना चाहते, लेकिन प्रधानमंत्री हैं तो फैसले तो लेने ही थे. जब उनके पास फाइलें जाने लगीं तो उन्होंने सोचा कि वह क्यों फैसले लें, इसलिए उन्होंने मंत्रियों का समूह बनाना शुरू किया, जिसे जीओएम (मंत्री समूह) कहा गया. सरकार ने जितने जीओएम बनाए, उनमें दो तिहाई से ज़्यादा के अध्यक्ष उन्होंने प्रणब मुखर्जी को बनाया.

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बिगड़े रिश्‍ते, बिगड़ी अर्थव्‍यवस्‍था

अब प्रणब मुखर्जी के दूसरे मंत्रियों और प्रधानमंत्री से रिश्ते की बात करें. वित्त मंत्री माना जाता है कि आम तौर पर कैबिनेट में दूसरे नंबर की पोजीशन रखता है. वित्त मंत्रालय इन दिनों मुख्य मंत्रालय (की मिनिस्ट्री) हो गया है, क्योंकि हर पहलू का महत्वपूर्ण पहलू वित्त होता है, इसलिए बिना वित्त के क्लीयरेंस के कोई भी फैसला हो ही नहीं सकता.

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हमें किस हवा के साथ बहना चाहिए?

दुनिया में बहुत सारे देश हैं, जिनमें सरकार, पुलिस, सेना और अदालत एक तरह से सोचते हैं, एक तरह से फैसला लेते हैं और मिलजुल कर देश की संपदा और जनता पर राज करते हैं, लेकिन बहुत सारे देश ऐसे हैं, जहां एक-दूसरे के फैसलों के ऊपर गुण-दोष के आधार पर यह तय होता है कि एक पक्ष दूसरे का साथ दे या न दे.

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सेना, साज़िश और सियासत

पिछले तीन सालों में कांग्रेस के नेतृत्व में चल रही सरकार में घट रही घटनाएं और उसके दूरगामी परिणामों से देश की अवाम चिंतित ही नहीं, बेहद परेशान भी है. पिछले दिनों जिस तरह से देश में सैन्य बग़ावत की खबरों की अटकलें लगीं, वे आज़ाद भारत के इतिहास में एक अनहोनी की तरह है.

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निराशा पैदा करने वाला फैसला

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सभी सम्मान करेंगे. आखिर यह भारत के सुप्रीम कोर्ट का फैसला है, लेकिन इस फैसले से उन लोगों को निराशा हुई, जो ईमानदारी में यक़ीन रखते हैं. देश का सुप्रीम कोर्ट यह कहता है कि हमें ईमानदारी और इंटीग्रिटी से कोई मतलब नहीं है तो फिर सवाल खड़ा होता है कि क्या देश ईमानदारी छोड़ दे, क्या इस देश में उन्हीं लोगों की सुनी जाएगी, जो भ्रष्ट या बेईमान हैं?

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तेलंगाना को राज्य का दर्जा मिले

आंध्र प्रदेश के अहम हिस्से तेलंगाना को अलग राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर पिछले चार दशकों से आंदोलन चल रहा है, लेकिन अभी तक सरकार किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई है. इस मुद्दे पर जहां केंद्र की यूपीए सरकार पर तेलंगाना इलाक़े के अपने नेताओं का दबाव है, वहीं अन्य सियासी दलों के नेता भी सरकार पर जल्द फैसला लेकर आंदोलन खत्म करने के लिए दबाव बना रहे हैं.

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इलाहाबाद हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का फैसला किसानों के हौसले बुलंद

सार्वजनिक विकास के नाम पर किसानों की ज़मीन हथियाने के सरकारी मंसूबों पर पानी फिरता नज़र आ रहा है. इलाहबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से ग्रेटर नोएडा के किसानों की ज़मीन के बारे में जो फैसले आए हैं, वे इंसाफ़ के इतिहास में मील का पत्थर साबित होने की ताक़त रखते हैं.

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अदालत, अधिग्रहण और आम आदमी : सुप्रिम कोर्ट का यह फैसला ऐतिहासिक है

जमीन वह संपत्ति है, जो एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को बस हस्तांतरित करती है यानी कोई इसका मालिक नहीं होता. हां, केयर टेकर कह सकते हैं. ज़मीन और किसान के बीच कुछ ऐसा ही संबंध था. लेकिन 90 के दशक की शुरुआत में उदारीकरण और निजीकरण की आंधी आने के साथ ही ज़मीन और किसान के इस सनातन संबंध को कमज़ोर बनाने का प्रयास किया जाने लगा, जो सरकार, ब्यूरोक्रेसी और उद्योगपतियों की साठगांठ का नतीजा था.

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लाइन में खडा़ किया गोली मारी और लाशें बहा दीं

अगर न्याय में देरी का मतलब न्याय से वंचित होना है तो यह कह सकते हैं कि मेरठ के मुसलमानों के साथ अन्याय हुआ है. मई 1987 में हुआ मेरठ का दंगा पच्चीसवें साल में आ चुका है. इस दंगे की सबसे दर्दनाक दास्तां मलियाना गांव और हाशिमपुरा में लिखी गई. खाकी वर्दी वालों का जुर्म हिटलर की नाजी आर्मी की याद दिलाता है.

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पश्चिम बंगालः अब तो फैसले की घडी़ है

विधानसभा चुनाव अब आख़िर मुक़ाम पर हैं. फैसले की घड़ी क़रीब है. दो-तीन सालों के रुझानों और उम्मीद के आधार पर हम एक निष्कर्ष तक पहुंचते रहे हैं, पर मामला स़िर्फ 5-7 प्रतिशत वोटों के इधर-उधर होने का है. राष्ट्रीय और प्रांतीय नेताओं द्वारा धुआंधार प्रचार जारी है.

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गोधरा फ़ैसला: छलनी से ज्यादा छेद

बीती 22 फ़रवरी को सत्र न्यायालय ने गोधरा रेल आगज़नी मामले में अपना फैसला सुनाया. अदालत ने गुजरात सरकार के इस आरोप को सही ठहराया कि स्थानीय मुसलमानों ने साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में आग लगाने का षड्‌यंत्र रचा था. जिन 94 आरोपियों पर मुक़दमा चल रहा था, उनमें से 63 को बरी कर दिया गया और 31 को साज़िश के तहत कारसेवकों को ज़िंदा जलाने का दोषी ठहराया गया

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अब भारत में तालिबानी फरमान

ऐसा लगता है कि आजकल इस्लाम को बदनाम करने का ठेका स़िर्फ मुसलमानों ने ले रखा है. न स़िर्फ दुनिया के तमाम देशों, बल्कि भारत से भी अक्सर ऐसे समाचार मिलते रहते हैं, जिनसे इस्लाम बदनाम होता है और मुसलमानों का सिर नीचा होता है.

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माया कैसे तोड़ेंगी इतने मंदिर-मस्जिद!

अयोध्या मसले पर हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने फैसले के क्रियान्वयन की ज़िम्मेदारी केंद्र के माथे मढ़ दी. साथ ही धमकी दी कि अगर प्रदेश में क़ानून व्यवस्था बिगड़ती है तो केंद्र ज़िम्मेदार होगा. मायावती ने यह बात अयोध्या के संदर्भ में तो कह दी थी, लेकिन क्या वह सार्वजनिक स्थलों पर बने 45 हज़ार से अधिक अवैध धार्मिक स्थलों के मामले में भी ऐसा कह सकेंगी?

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सच्चा धर्म वही, जो आगे बढ़ाए

अयोध्या पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद कई लोग इस सवाल पर बोल रहे हैं. न केवल बोल रहे हैं, बल्कि राजनीति को नए सिरे से मोड़ने की कोशिश भी कर रहे हैं. लेकिन देश की जनता, जिसमें मुसलमान भी शामिल हैं और हिंदू भी, इस सवाल से बहुत परेशान नहीं हैं.

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अयोध्या निर्णय: गुनाह करो, ईनाम पाओ

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने अयोध्या मामले में 30 सितंबर 2010 को फैसला सुनाया. आशंकाओं के विपरीत उस दिन और उसके बाद देश में कहीं हिंसा नहीं हुई. इसका श्रेय आमजनों की परिपक्व सोच को जाता है. जहां तक इस निर्णय का सवाल है, यह तीनों पक्षकारों यानी रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा एवं सुन्नी व़क्फ बोर्ड के बीच संतुलन क़ायम करने की कवायद के अलावा कुछ नहीं है.

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राम जन्‍मभूमि-बाबरी मस्जिद प्रकरण

अयोध्या मामले पर फैसला आ चुका है. चारों तऱफ सराहना हो रही है कि बहुत अच्छा फैसला है. किसी को निराश नहीं किया. सबसे बड़ी बात यह कि जो शांति व्यवस्था भंग होने का ख़तरा था, वैसी कोई अप्रिय घटना नहीं घटी. शांति व्यवस्था बनी रही. लोगों ने बड़ी संजीदगी से फैसले को सुना और मामले की नज़ाकत को समझते हुए ज़िम्मेदारी का परिचय दिया. सभी मान रहे हैं कि फैसला आस्था के आधार पर हुआ.

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दिल्‍ली का बाबूः सरकारी फैसलों पर बाजार का असर

केंद्र सरकार के कामकाज पर नजर रखने वालों की बातों का भरोसा करें तो कुछ खास मंत्रालयों के नौकरशाहों एवं शेयर बाजार के बीच एक नया और रोचक रिश्ता बनता दिख रहा है. बाजार से जुड़े मंत्रालयों में पदस्थ नौकरशाह शेयर बाजार की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए बिजनेस न्यूज चैनलों पर नजर गड़ाए रहते हैं.

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