किसानों की मूल समस्याओं की उपेक्षा

पिछले दिनों वर्ष 2013-14 का बजट वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने पेश किया. मीडिया से लेकर अर्थशास्त्रियों की पैनी नज़र

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एक अफसर का खुलासाः ऐसे लूटा जाता है जनता का पैसा

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एवं शरद पवार के भतीजे अजीत पवार ने अपने पद से इस्ती़फा दे दिया है. हालांकि उनके इस्ती़फे के बाद राज्य में सियासी भूचाल पैदा हो गया है. अजीत पवार पर आरोप है कि जल संसाधन मंत्री के रूप में उन्होंने लगभग 38 सिंचाई परियोजनाओं को अवैध तरीक़े से म़ंजूरी दी और उसके बजट को मनमाने ढंग से बढ़ाया. इस बीच सीएजी ने महाराष्ट्र में सिंचाई घोटाले की जांच शुरू कर दी है.

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सच का सिपाही मारा गया

सच जीतता ज़रूर है, लेकिन कई बार इसकी क़ीमत जान देकर चुकानी पड़ती है. सत्येंद्र दुबे, मंजूनाथ, यशवंत सोणावने एवं नरेंद्र सिंह जैसे सरकारी अधिकारियों की हत्याएं उदाहरण भर हैं. इस फेहरिस्त में एक और नाम जुड़ गया है इंजीनियर संदीप सिंह का. संदीप एचसीसी (हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी) में हो रहे घोटाले को उजागर करना चाहते थे.

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उत्तर प्रदेश : अखिलेश का चुनावी बजट

मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव ने बतौर वित्त मंत्री बीते एक जून को वित्तीय वर्ष 2012-13 के लिए दो लाख करोड़ रुपये का बजट पेश किया. आज तक किसी अन्य सरकार ने इतना बड़ा बजट पेश नहीं किया था.

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भारतीय समाज को बेहतर बनाने के लिए आईओएस का 25 वर्षों का प्रयास

भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक बिरादरी का दर्जा रखता है. देश के संविधान ने दूसरे वर्गों के साथ-साथ इस देश के मुसलमानों को भी बराबर के अधिकार दिए हैं, लेकिन आज़ादी के 60 साल से भी ज़्यादा का वक़्त गुज़र जाने के बाद भी, आज मुसलमानों को अपना हक़ मांगना पड़ रहा है.

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बजट किसके लिए है

ऐसा कहा जाता है कि प्रसिद्ध अभिनेत्री सराह बेमहर्ड जब डिक्शनरी भी पढ़ती थीं तो लोगों की आंखों में आंसू ला देती थीं. प्रणव मुखर्जी भी इसके का़फी क़रीब नज़र आए, जब उन्होंने सर्विस टैक्स के लिए नकारात्मक सूची वाले क्षेत्रों को पढ़ना शुरू किया. वित्त मंत्री को यह नकारात्मक सूची क्यों पढ़नी चाहिए, यह एक रहस्य है.

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यह बजट खतरनाक है

16 मार्च को प्रणब मुखर्जी लोकसभा में भाषण दे रहे थे. यह आम भाषण नहीं था, बल्कि 2012-13 का बजट भाषण था. सारा देश इस भाषण को ध्यान से सुन रहा था. हम भी इस भाषण को सुन रहे थे. इस भाषण को जब हमने सुनना शुरू किया तो हमें बहुत आशा थी कि प्रणब मुखर्जी इस देश के सामने आने वाली तकलीफ़ों को ध्यान में रखकर अपना बजट भाषण रखेंगे.

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बजट- 2012 देश पर गंभीर आर्थिक संकट

सोलह मार्च को वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी बजट पेश करेंगे. पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के बाद पेश किए जा रहे इस बजट की रूपरेखा पर हाल में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के घर पर एक मीटिंग हुई. दो घंटे के बाद मीडिया को स़िर्फ इतना बताया गया कि जनता के हितों को ध्यान में रखकर बजट तैयार किया जाएगा, लेकिन इस मीटिंग के बाद जितने भी नेता मुखर्जी के घर से बाहर निकल रहे थे, उनके चेहरे से पता चल रहा था कि आगे क्या होने वाला है.

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वालीवुड की ट्रेड सेटिंग फिल्में

हिंदी फिल्मों में ढेर सारी चीजें बदल कर भी नहीं बदलतीं. भले ही नई तकनीक, नई लोकेशंस और बढ़े हुए बजट से सिनेमा के प्रदर्शन में भारी बदलाव आया हो. लेकिन कुछ चीजें एक ट्रेंड की तरह तबसे चली आ रही हैं, जबसे इनका प्रयोग हुआ है और ये बार-बार पर्दे पर आकर नई फिल्मों के ज़रिए अपने प्रयोग की याद दिलाती है

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वास्तविक बदलाव की ज़रूरत

आख़िरकार बजट पेश हो गया और बजट भाषण भी बिना किसी परेशानी के पूरा हो गया. जेपीसी की मांग मान ली गई और पीएसी भी अपनी तऱफ से जांच करेगी. अंतत: सीवीसी को भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बेआबरू होकर अपने कूचे से निकलना पड़ा.

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बजट 2011 इसमें गरीबों के लिए कुछ भी नहीं है

प्रणब मुखर्जी के बजट में दबे-कुचलों, ग़रीबों, अल्पसंख्यकों, मज़दूरों, महिलाओं, बच्चों और किसानों के लिए धेले भर की जगह नहीं दिखाई पड़ती. बहुत पहले ही देश में बजट का स्वरूप बदल गया था. आज स्थिति यह है कि बजट सरकार की आमदनी और खर्च का ब्योरा नहीं, बल्कि जनता को आंकड़ों में उलझा कर बेवक़ूफ़ बनाने की एक सोची समझी साज़िश बनकर रह गया है.

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विधायकों की बल्‍ले-बल्‍ले

फंड खत्म करने को लेकर विधायकों के दिलों में जो मलाल था, वह अब बहुत जल्द दूर होने वाला है. नए साल के तोह़फे के तौर पर सरकार विधायकों के वेतन को लगभग दोगुना करने पर गंभीरता से विचार कर रही है. इसके साथ ही विधायकों को मिलने वाले रेल कूपन एवं हवाई यात्रा के लिए मिलने वाली राशि में भी इज़ा़फा किया जा रहा है.

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लोकतंत्र के खलनायक बनने से बचिए

आज आपकी ओर से पूरी राजनैतिक व्यवस्था से बात करेंगे. इसमें सभी राजनैतिक दल, क्या सरकार और क्या विपक्ष, ऐसा हो गया है कि शर्म से कह सकते हैं कि हमाम में सब नंगे हैं. सरकार को एक पैराग्राफ पढ़ने के लिए लिख देते हैं.

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संसदीय सत्रों का भी ऑडिट हो

आज भारत में ऐसा एक भी संस्थान नहीं है, जिसके कार्यकलापों का एक निश्चित अवधि में अंकेक्षण (ऑडिट) न किया जाता हो. अंकेक्षण समय की मांग और ज़रूरत दोनों है. यह वह हथियार है, जिसके माध्यम से हम किसी भी संस्थान की ख़ामियों का पता लगा सकते हैं और उनका निराकरण कर सकते हैं.

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महंगाई केवल राजनीतिक मुद्दा है

महंगाई का शोर केवल एक राजनैतिक मुद्दा है. महंगाई को लेकर न तो राजनीतिक दल गंभीर हैं और न ही जनता में कोई खास गुस्सा या बेचैनी है. मंहगाई के मुद्दे को लेकर 27 अप्रैल को वामपंथी दलों और कुछ अन्य दलों ने राष्ट्रव्यापी बंद का आयोजन किया था. भोपाल में भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, समाजवादी पार्टी, जनता दल एस का कुछ हिस्सों में असर है,

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मुख्‍यमंत्री की कुर्सी अभी दूर है

रेलवे परियोजनाओं के उद्घाटन की हड़बड़ी के कारण एक रोचक वाकया हो गया. 20 मार्च को महाराजा एक्सप्रेस के उद्घाटन समारोह के लिए अख़बारों को जो विज्ञापन जारी किया गया, उसके ऩक्शे में दिल्ली को पाकिस्तान और कोलकाता को बंगाल की खाड़ी में दिखाया गया.

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सरकारी भ्रष्टजनों का खाता उजागर

भ्रष्टाचार के लिए बदनाम मध्य प्रदेश के शासन-प्रशासन में अब तक भ्रष्ट तत्वों के सम्मान की रक्षा के लिए उनके नाम उजागर नहीं किए जाते थे. यहां तक कि मुख्यमंत्री भी विधानसभा में प्रश्नकाल के दौरान अक्सर जानकारी एकत्र की जा रही है जैसी टालू सूचना देकर भ्रष्ट तत्वों के चेहरे बेनक़ाब नहीं होने देते थे.

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सरकार फिर जनता के खिला़फ

बजट सत्र के पूर्वार्ध में लोकसभा में परमाणु दायित्व विधेयक (न्यूक्लियर लाइबिलिटी बिल) आना था, लेकिन विरोधी दल के सदस्यों के दबाव की वजह से यह संभव नहीं हो पाया. अ़खबारों में यह खबर पहले छप गई, जिसकी वजह से संसद सदस्यों को लगा कि उन्हें इसका विरोध करना चाहिए.

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पुलिस विभाग को कुत्‍तों के लिए पैसे नहीं

मध्य प्रदेश पुलिस का बजट विगत एक दशक में 813 करोड़ रूपए से बढ़कर लगभग 2000 करोड़ रूपए का हो गया है, लेकिन फिर भी यहां पैसे की तंगी बनी ही रहती है. हालत इतनी दयनीय है कि सुरक्षा और निगरानी के लिए उत्तम नस्ल के कुत्तों के लिए भी पुलिस विभाग के पास पैसा नहीं है और सरकार भी इसके लिए अतिरिक्त धन आवंटन के लिए राजी नहीं है.

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आम आदमी पर दादा का डंडा

हालांकि बजट के बारे में जब आप पढ़ रहे होंगे, तब तक दादा के डंडे से आम आदमी की कमर पर अनेक वार हो चुके होंगे और दादा विपक्ष द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब भी दे चुके होंगे. लेकिन, तब तक यह बात सा़फ हो जाएगी कि दादा के जिस बजट से पूरा देश बहुत उम्मीद लगाए बैठा था, उसने कुल मिलाकर आम आदमी को एक बार फिर निराश कर दिया.

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सांप्रदायिक हिंसा विधेयक रोग से बदतर इसका इलाज है

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सरकार को संसद के बजट सत्र में सांप्रदायिक हिंसा विधेयक प्रस्तुत करने की मंज़ूरी दे दी है. इस विधेयक का मूल प्रारूप सन्‌ 2005 में तैयार हुआ था. सन्‌ 2002 के गुजरात क़त्लेआम में भाजपा सरकार व नरेंद्र मोदी की भूमिका से नाराज़ मुसलमानों ने 2004 के आम चुनाव में कांग्रेस को बड़े पैमाने पर अपना समर्थन दिया, जिसके कारण एन.डी.ए गठबंधन को धूल चाटनी पड़ी.

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