सप्ताह भर की खबरों के पीछे की खबर

बनारस वैसा ही है जैसा था हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपना जन्मदिन अपने लोकसभा क्षेत्र बनारस में मनाया. रिटर्न

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अब गया में उतरेंगे जम्बो जेट, कार्गो प्लेन और एयर बस

दरभंगा और पूर्णिया में नए हवाई अड्‌डे बनाने से सम्बन्धित मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हालिया बयान के बाद हवाई यात्रा

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उत्तर प्रदेश में मदरसों पर मठाधीशों की मनमानी, लूट रहे सरकारी धन और ज़कात

उत्तर प्रदेश के ज्यादातर मदरसों की हालत बेहद खराब है. वे आज भी घिसे-पिटे तौर-तरीकों और बाबा आदम के जमाने

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प्रधानमंत्री जी, सांसदों की इस खामोशी को समझिए

संसद का मानूसन सत्र कई जानकारियां दे गया. सत्तारूढ़ दल यानी भारतीय जनता पार्टी के भीतर एक गहरा सन्नाटा छाया

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न थकेंगे, न झुकेंगे

आखिर अन्ना हज़ारे क्या हैं, मानवीय शुचिता के एक प्रतीक, बदलाव लाने वाले एक आंदोलनकारी या भारतीय राजनीति से हताश लोगों की जनाकांक्षा? शायद अन्ना यह सब कुछ हैं. तभी तो इस देश के किसी भी हिस्से में अन्ना चले जाएं, लोग उन्हें देखने-सुनने दौड़े चले आते हैं? उनकी सभाओं में उमड़ने वाली भीड़ को देखकर कई राजनेताओं को रश्क होता होगा.

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आज भी उतनी ही सुंदर हैं भाग्यश्री

क्रीम कलर के सलवार सूट में जैसे ही वह काले रंग की मर्सिडीज से उतरीं, लोग अपलक उन्हें देखते ही रह गए. वह थीं ही कुछ ऐसी. जी हां, यह और कोई नहीं मैंने प्यार किया की चुलबुली सुमन यानी अभिनेत्री भाग्यश्री थीं. बनारस की धरती पर जब भाग्यश्री ने क़दम रखा, तब उतनी ही खूबसूरत लग रही थीं, जितनी तक़रीबन 22 साल पहले अपनी फिल्म में लगती थीं.

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पूर्वांचल के बुनकरों का दर्दः रिश्‍ता वोट से, विकास से नहीं

केंद्र की यूपीए सरकार से पूर्वांचल के लगभग ढ़ाई लाख बुनकरों को का़फी उम्मीदें थीं. बुनकरों के लिए करोड़ों रुपये के बजट का ऐलान सुनते ही बुनकरों को यक़ीन हो गया कि उनकी हालत अब सुधरने वाली है, लेकिन जब हक़ीक़त सामने आई तो वे खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगे.

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बनारस को जानिए-समझिए

आत्म प्रचार और विज्ञापन के इस दौर में भी कुछ लोग ऐसे हैं, जो किसी प्रतिदान की अपेक्षा के बग़ैर चुपचाप निष्ठापूर्वक अपना काम किए जा रहे हैं. ऐसे ही एक शख्स हैं लेखक-पत्रकार कमल नयन. कमल जी के आलेख का़फी पहले साहित्यिक पत्रिका धर्मयुग में प्रमुखता से प्रकाशित होते रहे.

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सियासी चक्की में पिसी हाथ की कारीगरी

बनारस और उसके आस-पास के इला़के के पांच से छह लाख लोग बनारसी साड़ी के कारोबार से जुड़े हैं. इस उद्योग से जुड़े अनिल कुमार के मुताबिक़ बनारसी साड़ी बनाने वाले आधे से अधिक कारीगर काम धंधे की तलाश में पलायन कर गए हैं. जो घर के मोह में बनारस नहीं छोड़ सके, वह ग़रीबी में जीवन यापन करने को मजबूर हैं. वजह भारतीय नारी के सुहाग और श्रृंगार का प्रतीक बनारसी साड़ी का उद्योग संकट के दौर से गुज़र रहा है. इस काम में लगे हज़ारों कारीगरों की माली हालत का़फी खराब हो चली है.
फिरोजाबाद के चूड़ीबनाने वाले कारीगर लगातार मौत के शिकार होते जा रहे हैं. चूड़ी बनाने के दौरान यह कारीगर खतरनाक रासायनिक तत्वों के संपर्क में आते हैं, जिससे वह गंभीर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं. इस कार्य में हज़ारों महिलाएं व बच्चे भी लगे हैं. घातक बीमारियां इन्हें भी अपना निशाना बना रही है. चूड़ी उद्योग से जुड़े कारीगरों व मज़दूरों की हर सांस के साथ कांच के महीन कण उनके शरीर के अंदर घुसते जाते हैं, जो अंतत: उन्हें मौत के मुंह में धकेल देता है.

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पुस्‍तक अंशः मुन्‍नी मोबइल- 39

बक्सर गंगा के किनारे बसा है. इसीलिए गंगा यहां के लोगों के जीवन में हर तरह से रची-बसी है. गंगा इस इलाक़े की जीवनदायिनी है. बक्सर में उद्योग-धंधे तो हैं नहीं. गंगा के कारण इलाके की ज़मीन बेहद उपजाऊ है. खेती-किसानी मुख्य पेशा है. आजादी के बाद एक टेक्सटाइल मिल लगी थी.

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