यह खामोशी देश के लिए खतरनाक है

कोयला घोटाला अब स़िर्फ संसद के बीच बहस का विषय नहीं रह गया है, बल्कि पूरे देश का विषय हो गया है. सारे देश के लोग कोयला घोटाले को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि इसमें पहली बार देश के सबसे शक्तिशाली पद पर बैठे व्यक्ति का नाम सामने आया है. मनमोहन सिंह कोयला मंत्री थे और यह फैसला चाहे स्क्रीनिंग कमेटी का रहा हो या सेक्रेट्रीज का, मनमोहन सिंह के दस्तखत किए बिना यह अमल में आ ही नहीं सकता था.

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सीएजी, संसद और सरकार

आज़ादी के बाद से, सिवाय 1975 में लगाए गए आपातकाल के, भारतीय लोकतांत्रिक संस्थाएं और संविधान कभी भी इतनी तनाव भरी स्थिति में नहीं रही हैं. श्रीमती इंदिरा गांधी ने संविधान के प्रावधान का इस्तेमाल वह सब काम करने के लिए किया, जो सा़फ तौर पर अनुचित था और अस्वीकार्य था. फिर भी वह इतनी सशक्त थीं कि आगे उन्होंने आने वाले सभी हालात का सामना किया. चुनाव की घोषणा की और फिर उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

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संसद ने सर्वोच्च होने का अधिकार खो दिया है

भारत की संसद की परिकल्पना लोकतंत्र की समस्याओं और लोकतंत्र की चुनौतियों के साथ लोकतंत्र को और ज़्यादा असरदार बनाने के लिए की गई थी. दूसरे शब्दों में संसद विश्व के लिए भारतीय लोकतंत्र का चेहरा है. जिस तरह शरीर में किसी भी तरह की तकली़फ के निशान मानव के चेहरे पर आ जाते हैं, उसी तरह भारतीय लोकतंत्र की अच्छाई या बुराई के निशान संसद की स्थिति को देखकर आसानी से लगाए जा सकते हैं.

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जनलोकपाल : बहस की जगह भाषण विरोध और प्रदर्शन

याद कीजिए अप्रैल का महीना और जंतर-मंतर. जनलोकपाल के लिए अन्ना का आंदोलन. माहौल और मौसम की गरमाहट. लेकिन अप्रैल से दिसंबर तक आते-आते दिल्ली की यमुना में का़फी पानी बह चुका था.

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काला धन पर बहसः नीति और नीयत दोनों में खोट है

काला धन. एक ऐसा शब्द जिसके सहारे विपक्ष जनता को सुनहरे भविष्य और खुद के लिए सत्ता का सपना देख रहा है. लालकृष्ण आडवाणी ने इसी मुद्दे पर रथ यात्रा कर डाली. संसद में इस मुद्दे पर बहस कराने के लिए बीजेपी ने ए़डी-चोटी का ज़ोर लगा दिया. बहस भी हुई, लेकिन नतीजा स़िफर.

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