राजस्‍थान का नंदीग्राम नवलगढ़ : सीमेंट फैक्‍ट्री के लिए भूमि अधिग्रहण

बिन पानी सब सून. राजस्थान के अर्द्ध मरुस्थलीय इलाक़े शेखावाटी की हालत कुछ ऐसी ही है. यहां के किसानों को बोरवेल लगाने की अनुमति नहीं है. भू-जल स्तर में कमी का खतरा बताकर सरकार उन्हें ऐसा करने से रोकती है. दूसरी ओर राजस्थान सरकार ने अकेले झुंझुनू के नवलगढ़ में तीन सीमेंट फैक्ट्रियां लगाने की अनुमति दे दी है. इसमें बिड़ला की अल्ट्राटेक और बांगड़ ग्रुप की श्री सीमेंट कंपनी शामिल है.

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हाथियों का हत्‍यारा कौन

नेपाल सीमा से लगे उत्तर प्रदेश के जनपद खीरी के दुधवा नेशनल पार्क में पिछले दिनों बिजली के हाईटेंशन तारों के कारण एक साथ तीन हाथियों की दर्दनाक मौत हो गई. इस घटना में सबसे हृदय विदारक मौत उस गर्भवती हथिनी की हुई, जिसकी कोख से अपरिपक्व बच्चा बिजली के तेज़ झटके लगने के कारण मां के पेट से बाहर आ गया.

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सूरमा देश का पहला वनग्राम बनाः अब बाघ और इंसान साथ रहेंगे

उत्तर प्रदेश के खीरी ज़िले का सूरमा वनग्राम देश का ऐसा पहला वनग्राम बन गया है, जिसके बाशिंदे थारू आदिवासियों ने पर्यावरण बचाने की जंग अभिजात्य वर्ग द्वारा स्थापित मानकों और अंग्रेज़ों द्वारा स्थापित वन विभाग से जीत ली है. बड़े शहरों में रहने वाले पर्यावरणविदों, वन्यजीव प्रेमियों, अभिजात्य वर्ग और वन विभाग का मानना है कि आदिवासियों के रहने से जंगलों का विनाश होता है, इसलिए उन्हें बेदख़ल कर दिया जाना चाहिए.

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बाघों के लिए बुरी खबर है

इस बार सुंदरवन और पश्चिम बंगाल व उड़ीसा के नक्सल प्रभावित इलाक़ों को भी इस रिपोर्ट में शामिल किया गया है, जो पिछली बार शामिल नहीं थे. सबसे चिंताजनक बात यह है कि बाघों की जो बढ़ोतरी रिपोर्ट उन इलाक़ों से नहीं आई है, जहां प्रोजेक्ट टाइगर दशकों से चल रहा है.

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उत्तराखंडः खतरे में बाघ

देहरादून में एक युवक पर हमला करने वाले बाघ को मार डाला गया. कुछ दिनों पहले यहां वन विभाग ने एक बाघिन को आदमखोर घोषित किया था. वन्यजीव प्रेमियों कि माने तो यहां वन्यजीव और मानव संघर्ष के ब़ढते घटनाओं के उचित कारणों पर भारत सरकार एवं सूबे के प्रशासन को ध्यान देना चाहिए.

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रक्षक की सुरक्षा का सवाल

शेर और बाघों को प्रकृति का वरदान माना जाता है, जिन्हें प्रकृति ने जंगल की रक्षा का दायित्व सौंपा है. अफसोस कि आज जंगल का वही रक्षक स्वयं सुरक्षित नहीं है. उसे सबसे अधिक क्षति मानव ने पहुंचाई. उत्तराखंड में बाघों का 11 हज़ार वर्ष पुराना इतिहास खासा समृद्धशाली है.

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सरकारी अमला कर रहा है बाघों का शिकार

भारत में टाइगर स्टेट का दर्जा प्राप्त मध्य प्रदेश में बाघों की मौत का सिलसिला थम नहीं रहा हैं. खुले वनों में मौजूद बाघों का अवैध शिकार इस बुरी तरह हो रहा है कि अब कई वनक्षेत्र पूरी तरह से बाघ रहित हो चुके हैं, लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि सरकार द्वारा संरक्षित राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यप्राणी अभ्यारण्यों में भी बाघों की मौत आये दिन हो रही है.

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सार-संक्षेप : रीवा में फिर बसेगा स़फेद बाघ

दुनिया में स़फेद बाघ, रीवा की ही देन है, लेकिन मध्य प्रदेश के वन्यप्राणी संरक्षण और वन प्रबंधन कार्यक्रमों की खामियों के कारण अब सफेद बाघ अपनी जन्मभूमि में ही अस्तित्वहीन हो चुका हैं, लेकिन चार दशक बाद अब एक बार फिर सफेद बाघ को रीवा में बसाने के लिए भारत सरकार और राज्य सरकार तैयारी कर रही हैं.

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टाइगर स्‍टेट का सच

मध्य प्रदेश को टाइगर स्टेट का दर्जा मिला हुआ है. यहां बाघों के संरक्षण के लिए विश्व वन्यप्राणी कोष तथा भारत सरकार से हर साल करोड़ों रुपये राज्य के वन विभाग को मिलता है. लेकिन राज्य के आर्थिक विकास की परियोजनाओं के नाम पर राज्य सरकार जिस प्रकार से वन्यप्राणियों की उपस्थिति वाले वनक्षेत्रों में औद्योगिक और खनन परियोजनाओं को मंजूरी दे रही है, उससे बाघों के निवास का प्राकृतिक माहौल नष्ट होने का खतरा बढ़ता जा रहा है.

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कभी नहीं से देर भली

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि वन और पर्यावरण मंत्रालय के अंतर्गत वन एवं वन्य जीवों और पर्यावरण मामलों के लिए अलग-अलग विभाग होंगे. मौजूदा व्यवस्था में पर्यावरण मंत्रालय के अधीन वन्यजीवों के लिए एक अलग शाखा है, जिसके मुखिया पर्यावरण सचिव विजय शर्मा हैं.

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जंगल के राजा पर संकट

विश्व प्रसिद्ध कान्हा नेशनल पार्क में शेरों की संख्या घटकर केवल 89 बची है. वर्ष 1993 में टाइगर रिजर्व घोषित होने के बाद से बढ़ने वाली यह संख्या अब तक के सबसे कम संख्यांक तक पहुंच रही है. कान्हा प्रबंधन भी शेरों की गणना से मीडिया को दूर रखना चाहता है. इससे यह संकेत मिलता है कि, मध्य प्रदेश जैसा विशाल राज्य अपने टाइगर रिजर्व को संरक्षित रख पाने में कहीं-न-कहीं असफल रहा है.

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तस्‍करों के निशाने पर बाघ

तमाम सरकारी घोषणाओं के बावजूद वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना में बाघ संरक्षण के लिए कोई ठोस और कारगर योजना के लागू न होने से बाघों का जीवन बचाने की मुहिम को झटका लग रहा है. देश में कुल तेरह व्याघ्र परियोजनाएं हैं, जिनमें रखरखाव के मामले में वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना तीसरे स्थान पर है, किंतु वास्तविकता के धरातल पर यह सफेद हाथी बनकर रह गई है.

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बाघों की जान ख़तरे में

एक माह के भीतर चार बाघों की मौत ने यह सिद्ध कर दिया है कि अब उत्तराखंड में वन एवं वन्यजीव सुरक्षित नहीं हैं. उक्त घटनाएं नैनीताल के रामनगर स्थित कार्बेट नेशनल रिज़र्व टाइगर पार्क में घटीं. एक तऱफ केंद्र सरकार 2010 को बाघ वर्ष (टाइगर इयर) के रूप में मनाने का मन बना रही है, दूसरी ओर नया साल होते ही चार बाघों की मौत ने राज्य सरकार की नाकामी साबित करने के साथ ही केंद्र सरकार की योजना पर पानी फेर दिया है.

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