मुस्लिम योगा टीचर राफिया नाज की मुश्किलें बढ़ी, मिल रही है तरह-तरह की धमकी

इन दिनों योग गुरु बाबा रामदेव के साथ रांची की एक मुस्लिम महिला योग टीचर राफिया नाज की तस्वीर वायरल

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Video Viral : जब बाइक पर धूम मचाते हुए निकले बाबा रामदेव, देखने वाले हो गये हैरान

नई दिल्ली : अभी तक आपने बाबा रामदेव को सिर्फ योग करते हुए देखा होगा. योग में तो कोई भी

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फिर बढ़ी रामदेव की मुश्किलें, क्वालिटी टेस्ट में फेल हुए 32 प्रोडक्ट्स

नई दिल्ली : योग गुरु बाबा रामदेव की कंपनी पतंजलि पर इन दिनों खतरा मडराता नज़र आ रहा है. जी

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स्वदेशी सामान की वकालत करने वाले रामदेव के प्रोजेक्ट में स्पैनिश कमोड

नई दिल्ली (ब्यूरो, चौथी दुनिया)। वैश्निक मंच पर योग को अलग मुकाम देने वाले बाबा रामदेव का मानना है कि

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छत्तीसगढ़ में रामदेव का विश्व रिकॉर्ड, हजारों लोगों ने एक साथ किया सूर्य नमस्कार

नई दिल्ली (ब्यूरो, चौथी दुनिया)। स्वामी विवेकानंद की जंयती के मौके पर बाबा रामदेव और छत्तीसगढ़ सरकार ने मिलकर विश्व

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प्रजातंत्र बना लाठीतंत्र

एक बार लखनऊ में मुख्यमंत्री कार्यालय के बाहर जबरदस्त प्रदर्शन हुआ. प्रदर्शनकारी पूर्वांचल के अलग-अलग शहरों से लखनऊ पहुंचे थे, उनकी संख्या क़रीब 1500 रही होगी, उनमें किसान, मज़दूर एवं छात्रनेता भी थे, जो अपने भाषणों में मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ आग उगल रहे थे. वे सब अपने भाषणों में सीधे मुख्यमंत्री पर निशाना साध रहे थे. उस प्रदर्शन का नेतृत्व समाजवादी नेता चंद्रशेखर कर रहे थे.

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देशभक्तों और ग़द्दारों की पहचान कीजिए

जब बाबा रामदेव के अच्छे दिन थे, उस समय हिंदुस्तानी मीडिया के कर्णधार उनसे मिलने के लिए लाइन लगाए रहते थे. आज जब बाबा रामदेव परेशानी में हैं तो मीडिया के लोग उन्हें फोन नहीं करते. पहले उन्हें बुलाने या उनके साथ अपना चेहरा दिखाने के लिए एक होड़ मची रहती थी. आज बाबा रामदेव के साथ चेहरा दिखाने से वही सारे लोग दूर भाग रहे हैं. यह हमारे मीडिया का दोहरा चरित्र है.

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यह खामोशी देश के लिए खतरनाक है

कोयला घोटाला अब स़िर्फ संसद के बीच बहस का विषय नहीं रह गया है, बल्कि पूरे देश का विषय हो गया है. सारे देश के लोग कोयला घोटाले को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि इसमें पहली बार देश के सबसे शक्तिशाली पद पर बैठे व्यक्ति का नाम सामने आया है. मनमोहन सिंह कोयला मंत्री थे और यह फैसला चाहे स्क्रीनिंग कमेटी का रहा हो या सेक्रेट्रीज का, मनमोहन सिंह के दस्तखत किए बिना यह अमल में आ ही नहीं सकता था.

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सीएजी के प्रति कांग्रेस का रवैया यह प्रजातंत्र पर हमला है

सीएजी (कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल) यानी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट आई तो राजनीतिक हलक़ों में हंगामा मच गया. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 2006-2009 के बीच कोयले के आवंटन में देश को 1.86 लाख करोड़ का घाटा हुआ. जैसे ही यह रिपोर्ट संसद में पेश की गई, कांग्रेस के मंत्री और नेता सीएजी के खिला़फ जहर उगलने लगे. पहली प्रतिक्रिया यह थी कि सीएजी ने अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा का उल्लंघन किया.

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देश को विजेता का इंतजार है

अगस्त का महीना भारतीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण रहा. सरकार, विपक्ष, अन्ना हजारे और बाबा रामदेव इस महीने के मुख्य पात्र थे. एक पांचवां पात्र भी था, जिसका ज़िक्र हम बाद में करेंगे. इन चार पात्रों ने अपनी भूमिका ब़खूबी निभाई. सरकार और विपक्ष ने अपनी पीठ ठोंकी, दूसरी ओर अन्ना और रामदेव ने अपने आंदोलन को सफल कहा. हक़ीक़त यह है कि ये चारों ही न हारे हैं, न जीते हैं, बल्कि एक अंधेरी भूलभुलैया में घुस गए हैं.

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इतिहास कभी मा़फ नहीं करता

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पंद्रह अगस्त को लाल क़िले से देश को संबोधित किया. संबोधन से पहले लोग आशा कर रहे थे कि वह उन सारे सवालों का जवाब देंगे, जो देश के सामने हैं या जिन्हें उनके सामने उठाया जा रहा है. विरोधी दल तो कोई सवाल उठा नहीं रहे हैं, सवाल स़िर्फ अन्ना हजारे और बाबा रामदेव उठा रहे हैं. उन सवालों को जनता का समर्थन भी हासिल है, जिनका जवाब प्रधानमंत्री को लाल क़िले से देना चाहिए था.

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आडवाणी जी बधाई के पात्र हैं

श्री लालकृष्ण आडवाणी ने अपने ब्लॉग पर एक कमेंट लिखा और उस कमेंट पर कांग्रेस एवं भाजपा में भूचाल आ गया. कांग्रेस पार्टी के एक मंत्री, जो भविष्य में महत्वपूर्ण कैबिनेट मंत्री बन सकते हैं, ने कहा कि भाजपा ने अपनी हार मान ली है. मंत्री महोदय यह कहते हुए भूल गए कि उन्होंने अपनी बुद्धिमानी से लालकृष्ण आडवाणी जी के आकलन को वैधता प्रदान कर दी.

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अन्‍ना की हार या जीत

अन्ना हजारे ने जैसे ही अनशन समाप्त करने की घोषणा की, वैसे ही लगा कि बहुत सारे लोगों की एक अतृप्त इच्छा पूरी नहीं हुई. इसकी वजह से मीडिया के एक बहुत बड़े हिस्से और राजनीतिक दलों में एक भूचाल सा आ गया. मीडिया में कहा जाने लगा, एक आंदोलन की मौत. सोलह महीने का आंदोलन, जो राजनीति में बदल गया. हम क्रांति चाहते थे, राजनीति नहीं जैसी बातें देश के सामने मज़बूती के साथ लाई जाने लगीं.

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यह टीम अन्ना की अग्नि परीक्षा का व़क्त है

विपक्षी दल आखिर परेशान क्यों हैं? अन्ना हजारे के पार्टी बनाने के फैसले से पहले और फैसले के बाद उनकी परेशानी में कोई फर्क़ ही नहीं पड़ा है. जबकि ग़ैर कांग्रेसी विपक्ष लोकनायक जय प्रकाश नारायण के समय और विश्वनाथ प्रताप सिंह के समय ऐसी स्थिति के स्वागत में लगा था. लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने बिहार में चल रहे छात्र-युवा आंदोलन को राजनीतिक दलों से दूर रखने का फैसला लिया था. उनका मानना था कि अगर राजनीतिक दल इस आंदोलन में कूदे तो वे इस आंदोलन को भटका देंगे.

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अन्ना और रामदेव की वजह से आशाएं जगी हैं

अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसे लोगों को सावधान हो जाना चाहिए. इतने दिनों के बाद भी उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा है कि कौन-सा सवाल उठाना चाहिए और कौन-सा नहीं. एक वक़्त आता है, जिसे अंग्रेजी में सेचुरेशन प्वाइंट कहते हैं. शायद जो नहीं होना चाहिए, वह हो रहा है, यानी लोकतंत्र सेचुरेशन प्वाइंट की तऱफ ब़ढ रहा है.

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फिर चूक गए रामदेव

योग गुरु बाबा रामदेव ने आगामी 9 अगस्त से भ्रष्टाचार और काले धन के ख़िलाफ़ देशव्यापी आंदोलन करने का ऐलान किया है. इसके तहत बीते 4 जून से देश भर में ग्राम सभा से लेकर लोकसभा तक मुहिम चलाई जा रही है.

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दिल्‍ली का बाबूः मध्य प्रदेश के भ्रष्ट बाबू

ऐसा लगता है कि बाबा रामदेव भ्रष्टाचार विरोधी अपनी यात्रा के तीसरे चरण में मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश जाएंगे. मध्य प्रदेश में आजकल भ्रष्टाचार के नए-नए मामले निकल कर आ रहे हैं. मध्य प्रदेश कैडर के अधिकारियों की संपत्ति की जांच हो रही है.

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आंदोलन जारी है…

कभी पास, कभी दूर. टीम अन्ना और रामदेव के बीच का रिश्ता कुछ ऐसा ही है. टीम अन्ना बार-बार रामदेव के साथ मिलकर आंदोलन चलाने की बात से इंकार करती रही है, लेकिन इस बार जब अन्ना हजारे ने यह घोषणा कर दी कि वह 3 जून को दिल्ली में बाबा रामदेव के साथ होंगे तो चाहकर भी टीम अन्ना के सदस्य इसका विरोध नहीं कर पाए.

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अन्ना और रामदेव ने जनता का विश्वास खो दिया

अन्ना हजारे और बाबा रामदेव का इन पांच राज्यों में न घूमना शुभ संकेत है. शुभ संकेत इसलिए है, क्योंकि अन्ना हजारे की भाषा कांग्रेस विरोधी थी और बाबा रामदेव तो कांग्रेस की जड़ में मट्ठा डालने का ही काम कर रहे थे. इससे ये जनता की शक्ति के प्रतीक न बने रहकर कांग्रेस पार्टी की विरोधी ताक़त के प्रतीक बन रहे थे. इन्होंने कभी जनता की ताक़त, खराब होते लोकतंत्र, खराब होते चुनाव और आशाएं तोड़ते नेताओं को अपना निशाना नहीं बनाया.

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अन्ना का प्रस्ताविक आमरण अनशन: सरकारी दमन से निपटने की तैयारी क्या है

अन्ना ने मज़बूत लोकपाल बिल पेश न किए जाने की स्थिति में आगामी 16 अगस्त से आमरण अनशन की घोषणा की है. सरकार ने अनशन न करने देने का मन बना रखा है. बाबा रामदेव और उनके साथी आंदोलनकारियों को लाठी के दम पर खदेड़ कर सरकार ने सा़फ कर दिया है कि उसे अन्ना और उनके समर्थकों को खदेड़ने में कोई वक़्त नहीं लगेगा.

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राजनीति का पाखंडी और बनावटी चेहरा

कहते हैं, युद्ध के समय सबसे अधिक क्षति सत्य की ही होती है. भारतीय राजनीति में सत्य का समावेश नहीं रहा है. इसलिए हम इसे लेकर ज़्यादा चिंतित भी नहीं रहते, लेकिन पिछले दिनों हमें ज़बरदस्त रूप से छल कपट, बनावटीपन, आरोप-प्रत्यारोप और अतिश्योक्तिपूर्ण बातें देखने-सुनने को मिलीं.

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भ्रष्‍टाचार और काले धन के खिलाफ आंदोलन में बाबा रामदेव चूक गए

राजनीति भी अजीबोग़रीब खेल है, इसलिए इसे गेम ऑफ इंपोसिबल कहा गया है. यह ऐसा खेल है, जिसमें बड़े-बड़े खिलाड़ी को धराशायी होने में व़क्त नहीं लगता है, छोटे खिलाड़ी बाज़ी मार ले जाते हैं और कभी-कभी सबसे अनुभवी खिलाड़ी भी किसी नौसिखिए की तरह खेल जाता है. यह किसने सोचा था कि बाबा रामदेव के आंदोलन का ऐसा अंत होगा.

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आरोप लगाने से ज़्यादा कठिन है शासन करना

वर्ष 1970 की बात है. एडवर्ड हीथ प्रधानमंत्री पद की दौड़ में हैरल्ड विल्सन के ख़िला़फ खड़े थे और लोगों से यह वादा कर रहे थे कि मैं महंगाई कम कर दूंगा. जब वह जीत गए, प्रधानमंत्री बन गए, तब उन्हें पता चला कि विपक्ष में रहकर आरोप लगाने से ज़्यादा कठिन सत्ता में आने के बाद काम करना होता है, अपने वादों को पूरा करना होता है.

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अन्ना और रामदेव उम्मीद की एक किरण हैं

यह देश विश्वास का मारा हुआ है. इस देश ने हर उस आदमी पर भरोसा किया, जिसने कहा कि हम समस्याओं से निजात दिलाएंगे. एक ओर नेहरू, इंदिरा, राजीव एवं वी पी सिंह तो दूसरी ओर जनता ने डॉ. राम मनोहर लोहिया और जेपी पर भरोसा किया. लोहिया ने सबसे पहले मिली-जुली सरकार की शुरुआत की थी.

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भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से जुड़े सवाल

बीते 27 अप्रैल को दिल्ली के वसंत कुंज इलाक़े में एक सभा थी. मौका था दक्षिण भारत के एक स्वामी जी के 81वें जन्मदिन का. मंच पर लालकृष्ण आडवाणी, अशोक सिंहल, प्रवीण तोगड़िया उमा भारती, गोविंदाचार्य और साध्वी ऋतंभरा मौजूद थे. यह दृश्य उस व़क्त की याद दिला रहा था, जब बाबरी मस्जिद विध्वंस से पहले साधु-संत और राजनेता मंच साझा कर रहे थे.

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अन्ना हजारे से चुक हो गई

अन्ना हजारे का आंदोलन दिशाहीनता का शिकार हो गया है. दिशाहीनता कई स्तर पर नज़र आ रही है. दिशाहीनता का मतलब इस बात से है कि अन्ना हजारे और उनके सर्वगुण संपन्न मैनेजरों ने आंदोलन तो शुरू कर दिया, लेकिन वे यह अनुमान ही नहीं लगा पाए कि आने वाले दिनों में कौन-कौन सी चुनौतियां सामने आने वाली हैं.

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हठयोगी समेत दर्जनों संतों के खिला़फ मुक़दमा

बाबा रामदेव और उनके स्वाभिमान ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने संतों के खिला़फ हरिद्वार कोतवाली में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता हठयोगी समेत बीस-पच्चीस लोगों के विरुद्ध आपराधिक मुकदमा दर्ज कराकर आग में घी डालने का काम कर दिया है.

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बाबा रामदेव जी, पहले इस देश को तो समझिए

हमने बाबा रामदेव से कई सवाल किए. हमें बाबा रामदेव से कोई शिकायत नहीं है. शिकायत इसलिए नहीं है कि देश में कोई भी आदमी कुछ भी व्यापार करने के लिए स्वतंत्र है, चाहे वह व्यापार कारों का हो, चाहे वह व्यापार मिठाई बनाने का हो, चाहे वह व्यापार योग सिखाने का हो या चाहे वह व्यापार दवाइयां बनाने का हो. बहुत सारे लोग व्यापार कर रहे हैं

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लगता है बाबा रामदेव से कांग्रेस डर गई

राजनीति और आध्यात्म में सबसे बड़ा फर्क़ यह है कि आध्यात्म मनुष्य को मौन कर देता है, जबकि राजनीति में मौन रखना सबसे बड़ा पाप साबित होता है. बाबा रामदेव के हमले के बाद कांग्रेस पार्टी आध्यात्म की ओर मुड़ गई है, उसने चुप्पी साध ली है.

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