पुलिस सुधार बिल 2013- लोगों में ख़ौफ़

जम्मू और कश्मीर सरकार पुलिस सुधार बिल 2013 लाना चाहती है. राज्य में इस बिल के विरोध में आवाज़ बुलंद

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सरकार जवाब दे यह देश किसका है

हाल में देश में हुए बदलावों ने एक आधारभूत सवाल पूछने के लिए मजबूर कर दिया है. सवाल है कि आखिर यह देश किसका है? सरकार द्वारा देश के लिए बनाई गई आर्थिक नीतियां और राजनीतिक वातावरण समाज के किस वर्ग के लोगों के फायदे के लिए होनी चाहिए? लाजिमी जवाब होगा कि सरकार को हर वर्ग का ख्याल रखना चाहिए. आज भी देश के साठ प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं. मुख्य रूप से सरकारी और निजी क्षेत्र में काम कर रहा संगठित मज़दूर वर्ग भी महत्वपूर्ण है.

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संशोधित भूमि अधिग्रहण बिल: काला कानून, काली नीयत

उदारीकरण का दौर शुरू होते ही जब सवा सौ साल पुराने भूमि अधिग्रहण क़ानून ने अपना असर दिखाना शुरू किया, तब कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को यह मुद्दा अपनी छवि बनाने के एक अवसर के रूप में दिखा. नतीजतन, अपनी तऱफ से उन्होंने इस कानून में यथाशीघ्र संशोधन कराने की घोषणा कर दी. घोषणा चूंकि राहुल गांधी ने की थी, इसलिए उस पर संशोधन का काम भी शुरू हो गया.

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संशोधित भूमि अधिग्रहण बिलः ग्रामीण विकास या ग्रामीण विनाश

ओडिसा के जगतसिंहपुर से लेकर हरियाणा के फतेहाबाद में ग्रामीण भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं. दूसरी ओर झारखंड के कांके-नग़डी में आईआईएम के निर्माण के लिए हो रहे भूमि अधिग्रहण का लोग विरोध कर रहे हैं. इस पर सरकार का कहना है कि देश को विकास पथ पर बनाए रखने के लिए भूमि अधिग्रहण आवश्यक है.

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विद्वान प्रधानमंत्री विफल प्रधानमंत्री

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ईमानदार हैं, सौम्य हैं, सभ्य हैं, मृदुभाषी एवं अल्पभाषी हैं, विद्वान हैं. उनके व्यक्तित्व की जितनी भी बड़ाई की जाए, कम है, लेकिन क्या उनकी ये विशेषताएं किसी प्रधानमंत्री के लिए पर्याप्त हैं? अगर पर्याप्त भी हैं तो उनकी ये विशेषताएं सरकार की कार्यशैली में दिखाई देनी चाहिए. अ़फसोस इस बात का है कि मनमोहन सिंह के उक्त गुण सरकार के कामकाज में दिखाई नहीं देते.

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असफल वित्त मंत्री सक्रिय राष्‍ट्रपति

वर्ष 2008 में ग्लोबल इकोनॉमी स्लो डाउन (वैश्विक मंदी) आया. उस समय वित्त मंत्री पी चिदंबरम थे. हिंदुस्तान में सेंसेक्स टूट गया था, लेकिन आम भावना यह थी कि इस मंदी का हिंदुस्तान में कोई असर नहीं होने वाला है. उन दिनों टाटा वग़ैरह का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा था और एक धारणा यह बनी कि भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व की अर्थव्यवस्था की ज़रूरत नहीं है.

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आंदोलन जारी है…

कभी पास, कभी दूर. टीम अन्ना और रामदेव के बीच का रिश्ता कुछ ऐसा ही है. टीम अन्ना बार-बार रामदेव के साथ मिलकर आंदोलन चलाने की बात से इंकार करती रही है, लेकिन इस बार जब अन्ना हजारे ने यह घोषणा कर दी कि वह 3 जून को दिल्ली में बाबा रामदेव के साथ होंगे तो चाहकर भी टीम अन्ना के सदस्य इसका विरोध नहीं कर पाए.

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इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शनः अन्‍ना चर्चा समूह, सवाल देश की सुरक्षा का है, फिर भी चुप रहेंगे? अन्‍ना हजारे ने प्रधानमंत्री से मांगा जवाब…

आदरणीय डॉ. मनमोहन सिंह जी,

पिछले कुछ महीनों की घटनाओं ने भारत की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर देश की जनता को का़फी चिंतित किया है. लेकिन अधिक चिंता का विषय यह है कि क्या इतनी चिंताजनक घटनाएं हो जाने के बावजूद कुछ सुधार होगा? अभी तक की भारत सरकार की कार्रवाई से ऐसा लगता नहीं कि कुछ सुधरेगा.

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कंपनी बिल-2011 : राजनीतिक दलों का दोहरा रवैया

14 दिसंबर, 2011 को लोकसभा में एक घटना घटी. डॉ. वीरप्पा मोइली ने दोपहर के बाद कंपनी बिल-2011 लोकसभा में पेश किया. इस बिल में राजनीतिक दलों को कंपनियों द्वारा दिए जाने वाले धन का प्रावधान है. इस बिल के पेश होने के एक घंटे के अंदर कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी बोलने के लिए खड़े हुए. उन्होंने कहा कि काला धन प्रमुख तौर पर हमारे चुनाव में मिलने वाले चंदे से जुड़ा हुआ है और इस चुनावी चंदे के स्वरूप में परिवर्तन करके काले धन की समस्या पर बहुत हद तक क़ाबू पाया जा सकता है.

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लोक स्‍वराजः टीम अन्‍ना का नया आंदोलन

समय सीमा 2014. इससे पहले टीम अन्ना एक नया आंदोलन शुरू करेगी, नाम होगा लोक स्वराज. काग़ज़ी तैयारी हो चुकी है, ज़मीनी तैयारी भी लगभग शुरू हो गई है. इंतज़ार है तो स़िर्फ विधानसभा चुनाव ख़त्म होने का. इसके बाद फिर एक बिल आएगा. फिर से आंदोलन होगा. फिर से एक मांग होगी. आख़िर क्या है नया मुद्दा, कैसे शुरू होगा नया आंदोलन और क्या है एजेंडा? पेश है चौथी दुनिया की यह ख़ास रिपोर्ट…

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लोकपाल के नाम पर धोखाः कहां गया संसद का सेंस ऑफ हाउस

इस बार दिल्ली की जगह मुंबई में अन्ना का अनशन होगा. जंतर-मंतर और रामलीला मैदान से गिरफ्तारियां दी जाएंगी. इसकी घोषणा टीम अन्ना ने कर दी है. आख़िरकार, वही हुआ, जिसकी आशंका चौथी दुनिया लगातार ज़ाहिर कर रहा था. अगस्त का अनशन ख़त्म होते ही चौथी दुनिया ने बताया था कि देश की जनता के साथ धोखा हुआ है.

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यूआईडीः नागरिकों के मूल अधिकारों के साथ खिलवाड़

जब लोकपाल बिल को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर अन्ना हज़ारे का एक दिवसीय अनशन शुरू हुआ तो उन्होंने सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को जनलोकपाल बिल पर बहस करने की दावत दी, लेकिन सांसदों ने यह कहकर हंगामा खड़ा कर दिया कि इस बिल पर चर्चा करने का अधिकार केवल संसद को है, सड़क पर चर्चा नहीं होनी चाहिए. क्या सरकार और हमारे नेता इस बात का जवाब दे सकते हैं कि जब संसद की स्टैंडिंग कमेटी ने यूआईडीएआई के चेयरमैन नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में जारी आधार स्कीम पर सवालिया निशान लगाते हुए उसे ख़ारिज करके सरकार से उस पर दोबारा ग़ौर करने के लिए कहा है तो फिर क्यों अभी तक यह कार्ड बनने का सिलसिला जारी है.

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व़क्त की नज़ाकत को समझने की ज़रूरत

अक्सर यह माना जाता है कि नियम बनाए जाते हैं और बनाते समय ही उसे तोड़ने के रास्ते भी बन जाते हैं. क़ानून बनाए जाते हैं और उनसे बचने का रास्ता भी उन्हीं में छोड़ दिया जाता है तथा इसी का सहारा लेकर अदालतों में वकील अपने मुल्जिम को छुड़ा ले जाते हैं. शायद इसीलिए बहुत सारे मामलों में देखा गया है कि अपराधी बाहर घूमते हैं, जबकि बेगुनाह अंदर होते हैं.

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सांप्रदायिक दंगा निरोधक विधेयकः मौजूदा कानून कहीं से कमतर नहीं

भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के बावजूद देश में टाडा जैसे क़ानून लागू हुए, मगर अपराध फैलते ही रहे. परिणाम यह हुआ कि जनता की मांग के मद्देनज़र न्याय की प्राप्ति के लिए 2005 और 2009 में विभिन्न स़िफारिशों एवं संशोधनों पर आधारित नया विधेयक प्रस्तुत किया गया. अब 2011 में पुराने क़ानूनों में संशोधन करके नया बिल पेश कर दिया गया है.

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सांप्रदायिक दंगा निरोधक विधेयक: ईमानदारी से अमल की दरकार

भारतीय जनता पार्टी ने सांप्रदायिक दंगा निरोधक विधेयक की क़डी आलोचना की है. उसने कहा कि यह बिल खतरनाक है और भेदभाव पर आधारित है. इसका ग़लत इस्तेमाल किया जाएगा, क्योंकि इसमें निष्पक्षता नहीं बरती जा सकती. बिल में इस बात की झलक मिलती है कि सांप्रदायिक दंगे बहुसंख्यक वर्ग द्वारा फैलाए जाते हैं.

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अन्ना हजारे से चुक हो गई

अन्ना हजारे का आंदोलन दिशाहीनता का शिकार हो गया है. दिशाहीनता कई स्तर पर नज़र आ रही है. दिशाहीनता का मतलब इस बात से है कि अन्ना हजारे और उनके सर्वगुण संपन्न मैनेजरों ने आंदोलन तो शुरू कर दिया, लेकिन वे यह अनुमान ही नहीं लगा पाए कि आने वाले दिनों में कौन-कौन सी चुनौतियां सामने आने वाली हैं.

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अन्ना को विजय हजारे की तरह खेलना होगा

जिस हजारे को मैंने सबसे पहले आदर देना शुरू किया था, वह अन्ना नहीं, विजय सैम्युअल हजारे थे. वह रणजी ट्रॉफी में बड़ौदा की ओर से खेलते थे. फिर 1950 की शुरुआत में भारत के लिए भी खेले. वह चौथे नंबर पर बैटिंग के लिए जाते थे और अपनी पूरी ताक़त लगा देते थे. तब भारत को क्रिकेट मैच में लगातार हार का मुंह देखना पड़ता था, जबकि हजारे हमेशा यह कोशिश करते थे कि कम से कम मैच को ड्रा कर दिया जाए बजाय हारने के.

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दिल्‍ली का बाबूः मुखिया विहीन बैंकिंग सेक्टर

पिछले 9 महीने से पंजाब एंड सिंध बैंक के सीएमडी का पद रिक्त है, लेकिन अब तक इस मसले को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय और वित्त मंत्रालय के बीच जारी तनातनी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है. अब तक ये दोनों मिलकर यह तय नहीं कर पाए हैं कि चली आ रही परंपरा के अनुसार इस पद पर एक सिख को बैठाया जाए या नहीं.

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भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था को उड़ा ले जाएगी अन्‍ना की आंधी

देश भर में अन्ना हजारे की जय जयकार, भ्रष्टाचार के ख़िला़फ आंदोलन की गूंज, शहरी युवाओं का सड़कों पर उतरना और कैंडिल मार्च, यह सब एक नई राजनीति की शुरुआत के संकेत हैं. भारत की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां सत्तापक्ष और विपक्ष के मायने बदल गए हैं. सत्तापक्ष में कांग्रेस पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और अन्य राजनीतिक दलों के साथ-साथ ब्यूरोक्रेसी है और उसके विरोध में देश की जनता खड़ी है. मतलब यह कि एक तऱफ देश चलाने वाले लोग हैं और दूसरी तऱफ देश की जनता है.

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सरकारी लोकपाल बनाम जन लोकपाल

आखिर क्या है जन लोकपाल? क्यों सरकार जन लोकपाल को लेकर परेशान है? असल में जन लोकपाल बिल एक ऐसा क़ानून है, जो भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के लिए किसी ताबूत से कम नहीं साबित होगा. पिछले 42 सालों में यह विधेयक कई बार क़ानून बनते-बनते नहीं बन पाया. यूपीए सरकार ने बिल का मसौदा तैयार तो किया, लेकिन सिविल सोसायटी के लोग और अब तो आम आदमी भी बिल के प्रावधानों से खुश नहीं है.

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जनता जाग चुकी हैः गलती स्‍वीकारने का नहीं, सुधारने का वक्‍त

बीती 16 फरवरी को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कुछ न्यूज़ चैनलों के संपादकों से मिले, बाक़ायदा एक प्रेस कांफ्रेंस के ज़रिए. बहुत सी बातें हुईं. पहले प्रधानमंत्री के कुछ चुनिंदा बयानों पर ऩजर दौड़ाएं.

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मिलिए लोकतंत्र के राजाओं से

राजनीति पेशा है या समाजसेवा का ज़रिया, इसका जवाब इस साल संसद के मानसून सत्र को देखकर पता लग जाता है. सत्र के दौरान सांसदों ने जिस तरीक़े से अपना वेतन और भत्ता बढ़ाने की मांग की, उससे यह साफ हो गया कि इन माननीयों के लिए राजनीति समाजसेवा का ज़रिया तो कतई नहीं हो सकती.

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दिल्‍ली का बाबूः सुधार के लिए बिल

सेवानिवृत्ति के बाद नियामक संस्थाओं के साथ जुड़ने के सपने संजो रहे नौकरशाहों के लिए योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया का बयान चिंता का कारण बन सकता है. नियामक संस्थाओं में सुधार के लिए प्रस्तावित बिल पर चर्चा करते हुए अहलूवालिया ने कहा था कि सचिव स्तर से सेवानिवृत्त होने वाले अधिकारी उन नियामक संस्थाओं से न जुड़ें तो अच्छा है, जिनसे सेवाकाल में उनका वास्ता रहा है.

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संसदीय सत्रों का भी ऑडिट हो

आज भारत में ऐसा एक भी संस्थान नहीं है, जिसके कार्यकलापों का एक निश्चित अवधि में अंकेक्षण (ऑडिट) न किया जाता हो. अंकेक्षण समय की मांग और ज़रूरत दोनों है. यह वह हथियार है, जिसके माध्यम से हम किसी भी संस्थान की ख़ामियों का पता लगा सकते हैं और उनका निराकरण कर सकते हैं.

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बटाईदारी बिल भ्रम का भंवर

सरकार कहती है कि बटाईदारी बिल लागू नहीं होगा, लेकिन विपक्ष का दिल है कि मानता ही नहीं. सरकार कहती है कि जब बंगाल में बटाईदारी बिल लागू नहीं हुआ तो बिहार में कहां से लागू होगा. विपक्ष कहता है कि सरकार की नीयत में खोट है. अगर बिल लागू नहीं करना है तो फिर सरकार इसे पूरी तरह खारिज़ क्यों नहीं कर देती.

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नीतीश को पटखनी देंगे शरद

राज्यसभा में महिला बिल को लेकर हुई फजीहत के बाद आहत शरद यादव ने लोकसभा में आने वाले इस बिल और राज्यसभा चुनाव में नीतीश कुमार को पटखनी देने की तैयारी शुरू कर दी है.

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सार –संक्षेप : महिलाएं पुलिस में झूठी रिपोर्ट लिखवाती हैं

महिलाओं के हितों की सुरक्षा के लिए बनाए गए दहेज प्रताड़ना और घरेलू हिंसा जैसे विशेष क़ानून का महिलाएं ही नाजायज़ फायदा उठा रही हैं. महिला थाना पुलिस के पास 50 फीसदी ऐसे मामले आ रहे हैं जिनमें पति या ससुराल पक्ष के खिला़फ झूठी शिकायत कर प्रकरण दर्ज़ कराने के प्रयास किए जाते हैं.

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केवल उद्देश्य अच्छा होने से बात नहीं बनती

ज्‍यादा उत्साह स्पष्ट लक्ष्यों का कोई विकल्प नहीं है. महिला आरक्षण बिल की नेकनीयती को लेकर कोई संदेह नहीं, समस्या तो बिल के प्रावधानों को अमल में लाने के तरीक़ों पर है. ऐसा लगता है, जैसे राजनीतिक रूप से सही दिखने की चाहत में राजनीतिक वास्तविकताओं को परे रख दिया गया है.

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दिग्विजय बनाएंगे तीसरा मोर्चा

बिहार में नीतीश कुमार के खिला़फ चुनावी जंग में उतरने के लिए तीसरे मोर्चे का खाका खींचने का काम तेजी से शुरू हो गया है. कांग्रेस के अंदर मचे घमासान ने तीसरे मोर्चे की संभावना को अचानक काफी प्रबल कर दिया. यही वजह है कि नीतीश को सत्ता से उखाड़ने के लिए अलग-अलग घेराबंदी में लगे नेताओं के साथ तीसरे मोर्चे को ज़मीन पर उतारने के लिए बांका के सांसद दिग्विजय सिंह ने बिगुल फूंक दिया है.

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इस्लाम और महिलाओं में खाई पैदा मत कीजिए

संसद के उच्च सदन में महिला आरक्षण बिल पास होने के बाद कुछ अजीब तरह की आवाज़ें सुनाई दे रही हैं. कुछ ऐसे सम्माननीय लोगों ने भी अपनी झुंझलाहट प्रकट की है, जिनसे इसकी अपेक्षा नहीं की जा सकती थी.

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