‘डिफेंस कॉरिडोर’ इज़राइल के हाथ में बागडोर!

जल्दी ही बुंदेलखंड क्षेत्र ‘इज़राइली कॉरिडोर’ बन जाएगा. अभी बुंदेलखंड के सात जिले इस ‘कॉरिडोर’ में शामिल होंगे, लेकिन आगरा,

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नापाक सियासतदानों के कारण बर्बाद हो गई बुंदेलों की पावन भूमि : नेताओं ने बुंदेलखंड को लूट-लूट कर ऐसा बना दिया

न सियासत का सलीका, न बोलने की समझ, न नेतृत्व वाले गुण और न ही नमकहलाली की नियत! यही निचोड़

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अकाल से बेहाल बुंदेलखंड

बीती आठ फरवरी को दिल्ली के जंतर-मंतर पर बुंदेलखंड से आए लोगों ने अपनी समस्याओं को लेकर धरना दिया. बुंदेलखंड

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जब तोप मुकाबिल हो : सरकार का इक़बाल ख़त्म हो चला है

जब जनता में निराशा ज्यादा बढ़ जाती है, तो वह निराशा एक बड़े तूफान की भूमिका भी बना जाती है.

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खजुराहो : अदभुत मूर्ति शिल्प का बेजो़ड नमूना

खजुराहो के मंदिरों की बात ही निराली है. यहां की मूर्तियां नृत्य और संगीत की छटा से भक्तों का मन

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बुंदेलखंड : फ़रमानों से निजात

दस्युओं के परिवारीजन विधानसभा चुनाव में हिस्सा तो ले रहे हैं, लेकिन उनकी गतिविधियां स़िर्फ अपने तक सीमित रह गई हैं. जिन बाहुबलियों को अपने आक़ा पर नाज़ हुआ करता था, वे भी जनता के बीच से नदारद दिख रहे हैं, क्योंकि दस्यु सम्राटों का खात्मा हो चुका है.

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बुंदेलखंडः महापर्व में घरवाले ही शामिल नहीं हैं

उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड, यह नाम सुनते ही एक ऐसी तस्वीर सामने उभर कर आती है, जहां भूख है, सूखा है, मौत है और घरों में लटके ताले हैं. जिन घरों में ताले नहीं लगे हैं, वहां स़िर्फ बुज़ुर्ग है, जो दिल्ली या अन्य बड़े शहरों में पलायन कर चुके अपने बच्चों द्वारा भेजे गए पैसों की वजह से जिंदा है, न कि केंद्र या सूबे की सरकार के अनुदान से. एक आंकड़े के मुताबिक़, पिछले पांच सालों में बुंदेलखंड से ढाई लाख से ज़्यादा लोग पलायन कर चुके हैं.

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बुंदेलखंडः बसपा में कलह

उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड सु़र्खियों में है. वोटों की महाभारत में सबकी नज़र बुंदेली भूमि पर है. वर्ष 1987 के राठ विधानसभा उपचुनाव में बहुजन समाज पार्टी सूबे में पहली बार दूसरे नंबर पर आई थी. यहीं से बुंदेलखंड में बसपा के पैर जमने शुरू हुए और आज वह सत्ता में है. लेकिन अब बसपा में सबकुछ ठीक-ठाक नहीं है.

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बुंदेलखंडः फटती धरती, कांपते लोग

बुंदेलखंड में बेतरतीब ढंग से खनन और भूजल दोहन के चलते ख़तरे की घंटी बज चुकी है. हमीरपुर में सबसे अधिक 41 हज़ार 779 हेक्टेयर मीटर प्रतिवर्ष भूजल दोहन हो रहा है. महोबा, ललितपुर एवं चित्रकूट में खनन मा़फ़िया नियम-क़ायदों को तिलांजलि देकर पहाड़ के पहाड़ समतल भूमि में बदल रहे हैं.

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बुंदेलखंड : पैकेज के बावजूद बदहाली बरकरार

देश के बीमारू राज्यों में शुमार उत्तर प्रदेश के सात ज़िलों में फैला बुंदेलखंड आज भी जल, ज़मीन और जीने के लिए तड़पते लोगों का केंद्र बना हुआ है. रोज़ी-रोटी और पानी की विकट समस्या से त्रस्त लोग पलायन के लिए मजबूर हैं. प्रदेश के कुल क्षेत्रफल का आठवां हिस्सा खुद में समेटे यह समूचा अंचल भूमि के उपयोग-वितरण, सिंचाई, उत्पादन, सूखा, बाढ़ और आजीविका जैसे तमाम मामलों में बहुत पीछे है.

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मरती नदियां, उजड़ता बुंदेलखंड

चंबल, नर्मदा, यमुना और टोंस आदि नदियों की सीमाओं में बसने वाला क्षेत्र बुंदेलखंड तेज़ी से रेगिस्तान बनने की दिशा में अग्रसर है. केन और बेतवा को जोड़कर इस क्षेत्र में पानी लाने की योजना मुश्किलों में फंस गई है. जो चंदेलकालीन हज़ारों तालाब बुंदेलखंड के भूगर्भ जल स्रोतों को मज़बूती प्रदान करते थे, वे पिछले दो दशकों के दौरान भू-मा़फिया की भेंट चढ़ गए हैं.

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वादों का मारा बुंदेलखंड

बुंदेलखंड में चित्रकूट के घाट पर न तो संतों की भीड़ है और न चंदन घिसने के लिए तुलसीदास जी हैं. हां, बुंदेलखंड की व्यथा सुनने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एवं कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ज़रूर बांदा आए. उन्होंने पानी की सुविधा के लिए दो सौ करोड़ रुपये देने का वादा करके आंसू पोंछने की कोशिश की है, लेकिन यहां की जनता के दु:ख-दर्द दूर होते नज़र नहीं आ रहे हैं.

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बुंदेलखंडः केन-बेतवा नदी को जोड़ने की योजना

बुंदेलखंड में जल्द ही नदियों को जो़डने की परियोजना शुरू होने वाली है. उत्तर प्रदेश का जनपद बुंदेलखंड खनिज संपदा से भरपूर होने के बाद भी अति पिछड़ेपन से जूझ रहा है. यहां की धरती से लगभग 40,000 कैरेट हीरा निकाला जा चुका है और लगभग 14,00,000 कैरेट हीरे का भंडार मौजूद है.

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बुंदेलखंडः किराए की कोख, मजबूरी या शौक

उत्तर प्रदेश के बुदेलखंड क्षेत्र में अगर समस्याओं की बात की जाए तो का़फी लंबी फेहरिस्त बनती है. जिसमें बेरोजगारी, सूखा, भुखमरी और दस्यु सरगनाओं जैसी कई समस्याएं हैं. इन्हीं वजहों से बुंदेलखंड का सामाजिक और आर्थिक ढांचा चरमराया हुआ है.

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पारीछा थर्मल पावर प्रोजेक्‍ट राख ने नर्क बना दी जिंदगी

बुंदेलखंड के वाशिंदों को विकास के नाम पर विनाश के भंवर जाल में उलझाने का खेल खेला जा रहा है. झांसी मुख्यालय से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पारीछा थर्मल पावर स्टेशन की गगनचुंबी चिमनियों से निकलने वाली राख ने आसपास के गांवों में रहने वाले हज़ारों लोगों की ज़िंदगी नर्क कर दी है.

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क्रशरों का कहर: लोगों का जीना दूभर

यूं तो बुंदेलखंड के वीरों की गाथाएं एवं दंतकथाएं विश्वविख्यात हैं, लेकिन यहां के मौजूदा हालात मरता क्या न करता जैसे हैं. गड्‌ढों में तब्दील हो चुके पहाड़ और अंधाधुंध खनन बुंदेलखंड की सबसे बड़ी त्रासदी है. कभी चंदेलकालीन सरोवरों एवं देशावरी पान के लिए प्रसिद्ध बुंदेलखंड आज अपनी पहचान के लिए खनिज उद्योग का मोहताज है. जब-जब बुंदेलखंड की बदहाली का शोर उठा तो शासन-प्रशासन ने खनिज उद्योग का हवाला देकर उसे दबा दिया. बुंदेलखंड सदियों से विंध्य पर्वत श्रंखला का गढ़ माना जाता है, लेकिन अब न केवल पर्वतों का अस्तित्व संकट में है, बल्कि उनकी मौजूदगी ने यहां के किसानों एवं मजदूर तबके की मुश्किलें भी बढ़ा दी हैं. क्रशर उद्योग को काल मानने वालों की संख्या अकेले महोबा जनपद में 20 से 25 हज़ार है.

किसी क्षेत्र की बदहाली दूर करने की बात उठे और उद्योगों का जिक्र न हो, यह मुमकिन नहीं, लेकिन जब कोई कहे कि उद्योग ही उस क्षेत्र की बदहाली का कारण है तो यह हजम करना मुश्किल होगा, पर बुंदेलखंड की ज़मीनी हक़ीक़त कुछ ऐसी ही है. झांसी, हमीरपुर, चित्रकूट, बांदा और महोबा में उद्योग की शक्ल अख्तियार कर चुके क्रशर लोगों के लिए जी का जंजाल बन गए हैं. क्रशरों से उड़ने वाली धूल के चलते हज़ारों बीघा कृषि भूमि बंजर हो चुकी है. विस्फोट के समय पत्थर टूटकर खेतों पर गिरते हैं, नतीजा मुंह का निवाला भी छिन जाता है. रही-सही कसर क्रशरों को कच्चे माल की आपूर्ति करने वाले वाहन फसल रौंद कर पूरी कर देते हैं. कुछ लोगों ने धूल से खेती को होने वाले ऩुकसान के बारे में ज़िला कृषि अधिकारी से जन सूचना अधिकार के तहत जानकारी मांगी तो उन्होंने यह तो माना कि पत्थरों की धूल उत्पादन क्षमता पर प्रतिकूल असर डालती है, लेकिन वह इससे भूमि के बंजर होने संबंधी सवाल का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे सके.

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सार-संक्षेपः बुंदेलखंड में दुल्हन खरीदना मजबूरी

मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैले पिछड़े और ग़रीब अंचल बुंदेलखंड में स्त्री-पुरूष लिंगानुपात इस बुरी तरह बिगड़ गया

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बुंदेलखंड के पत्‍थर खदान मजदूरों का दर्द

गगनचुंबी इमारतों एवं सड़कों की ख़ूबसूरती बढ़ाने के लिए पत्थर का सीना चाक करनेऔर नदी से बालू निकालने वाले मज़दूरों को दो जून की रोटी के बदले सिल्कोशिस नामक रोग मिल रहा है. विंध्याचल पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य स्थित बुंदेलखंड में उत्तर प्रदेश भाग के ललितपुर, झांसी, महोबा, हमीरपुर, बांदा एवं चित्रकूट आदि ज़िले पूरे भारत में पत्थरों के लिए प्रसिद्ध हैं.

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सार-संक्षेप

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान राज्य के भोले-भाले मेहनतकश किसानों की सहानुभूति बटोर कर अपनी राजनीति चमकाना तो जानते हैं, लेकिन वे किसानों के हित में काम कैसे करते हैं, इसकी नज़ीर यह है कि किसानों की क़र्ज़ मा़फी की घोषणा हुए एक वर्ष हो गया, लेकिन आज भी नौ लाख किसान अपनी क़र्ज़ मा़फी का इंतजार कर रहे हैं

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बुंदेलखंड को राज्य बनाने के नाम पर सियासत

दो दशक से बुंदेलखंड राज्य मुक्ति मोर्चा मुहिम चला रहा है. इसी के तहत चित्रकूट से पैदल यात्रा शुरू हुई. यूं तो बुंदेलखंड क्षेत्र दो राज्यों में विभाजित है-उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश, लेकिन भू-सांस्कृतिक दृष्टि से यह क्षेत्र एक-दूसरे से विभिन्न रूपों में जुड़ा हुआ है. रीति-रिवाजों, भाषा और विवाह संबंधों ने इस एकता को मजबूत कर दिया है.

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बुंदेलखंड बेबस और बदहाल है

बुंदेलखंड में लोग ज़िंदगी जीते नहीं, ढोते हैं. प्रकृति और व्यवस्था दोनों ही उनकी कड़ी परीक्षा लेती हैं. ब़ंजर जमीन, पानी की कमी, बेरोजगारी, विकास योजनाओं का अभाव और सरकारी-प्रशासनिक उपेक्षा ने यहां लोगों का जीना मुहाल कर रखा है. हद तो यह कि उन्हें मिलने वाली मदद भी सियासी दांवपेंच में उलझ कर रह जाती है.

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