भारत की संसद की परिकल्पना लोकतंत्र की समस्याओं और लोकतंत्र की चुनौतियों के साथ लोकतंत्र को और ज़्यादा असरदार बनाने के लिए की गई थी. दूसरे शब्दों में संसद विश्व के लिए भारतीय लोकतंत्र का चेहरा है. जिस तरह शरीर में किसी भी तरह की तकली़फ के निशान मानव के चेहरे पर आ जाते हैं, उसी तरह भारतीय लोकतंत्र की अच्छाई या बुराई के निशान संसद की स्थिति को देखकर आसानी से लगाए जा सकते हैं.
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भारतीय राजनीति में शर्मनाक कीर्तिमान स्थापित हो रहे हैं. क्या हमने अमेरिका को भारत की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप करने की छूट दे दी है. अगर नहीं, तो देश की विपक्षी पार्टियां और मीडिया ने यह बात क्यों नहीं उठाई कि अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने ममता बनर्जी से खुदरा बाज़ार में विदेशी पूंजी निवेश जैसे विवादित मामले पर क्यों बात की?
Tags: America, Hillary Clinton, Politics, capital, competition, government, unemployment, अमेरिका, पूंजी, प्रतियोगिता, बेरोज़गारी, राजनीति, सरकार, हिलेरी क्लिंटन Posted in आर्थिक, कवर स्टोरी-2, कानून और व्यवस्था, पहला पन्ना, राजनीति, विदेश, विधि-न्याय, समाज by Author: डा. मनीष कुमार | 2 Comments » | Read More... |
गर्द के ग़ुबार में आग की तस्वीरें धुंधली दिखती हैं, पर वह आग अगर किसी इंसान की देह में लगी हो तो किसी भी दर्शक की संवेदनाओं के कोमल तंतु को झुलसाने के लिए का़फी हैं. बंगाल में इस समय चुनावी गर्द का कोहरा है और प्रसून दत्ता जैसे बेरोज़गार युवक द्वारा आत्मदाह की कोशिश, वह भी बंगाल की उम्मीद ममता बनर्जी के घर के सामने, एक राष्ट्रीय मुद्दा बनती है.
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वर्ष 1857 के आंदोलन को अंग्रेजों ने किसी तरह दबा तो दिया, लेकिन यह बात उनकी समझ से बाहर थी कि आख़िर यह सब हुआ कैसे. यह आंदोलन कैसे हुआ, कैसे इतना फैला और किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी. ये सारी बातें समझने के लिए अंग्रेजों ने एक आयोग बनाया, जिसकी अध्यक्षता सर ए ओ ह्यूम को सौंपी गई.
Tags: Kutumbkkm, development, economic, law, poverty, unemployment, village, आर्थिक, कुटुंबक्कम, गांव, बेरोज़गारी, विकास, व्यवस्था, ग़रीबी Posted in आर्थिक, कानून और व्यवस्था, राज्य, विधि-न्याय, समाज, स्टोरी-6 by Author: शशि शेखर | No Comments » | Read More... |
ग्रामीणों को 100 दिन रोज़गार उपलब्ध कराने के दावों और वादों के साथ चलाई जा रही महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना को लागू हुए चार वर्ष हो गए हैं, किंतु पलायन रुकने का नाम नहीं ले रहा है. ग्रामीणों को रोज़गार उपलब्ध कराने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की ओर से पैसा तो मिल रहा है, बावजूद इसके छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों से रोज़गार की तलाश में लोगों का पलायन जारी है.
Tags: Employment, Manarega, guarantees, labor, planning, unemployment, गारंटी, बेरोज़गारी, मजदूरी, मनरेगा, योजना, रोजगार Posted in समाज, स्टोरी-6 by Author: शिवा कुमार | No Comments » | Read More... |
संजय साव की उम्र 32 साल है. वह बिहार के गोपालगंज का रहने वाला है. गांव में रहकर वह इतना नहीं कमा पाता कि अपने परिवार के भोजन और अन्य ज़रूरतों को पूरा कर सके. दिक्कतों को झेलते-झेलते परेशान होकर वह कमाने के लिए बाहर जाने का फैसला करता है, ताकि अपने घर कुछ पैसा भेज सके और बच्चों को कम से कम दो व़क्त की रोटी नसीब हो.
Tags: Delhi, Industry, Noida, company, unemployment, worker, उद्योग, कंपनी, दिल्ली, नोएडा, बेरोज़गारी, वर्कर Posted in आर्थिक, जरुर पढें, राज्य, समाज by Author: कुमार सुशांत | 1 Comment » | Read More... |
फैक्ट्रियों में मज़दूरी करके, सड़कों पर रिक्शा-ऑटो एवं छोटी-मोटी दुकान चलाकर किसी तरह अपनी ज़िंदगी गुजार रहे इन लोगों का भविष्य वैसे ही अनिश्चितता के भंवर में उलझा हुआ है, रही-सही कसर महंगाई ने पूरी कर दी है. दिल्ली के बारे में कहा जाता है कि यहां हर आय वर्ग के लोगों के लिए रहने की संभावना मौजूद है, लेकिन अब यह मिथक टूटता जा रहा है.
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मुसीबतें हर आम इंसान और समाज पर आती हैं. हम लड़ते भी हैं. इस लड़ाई में अगर कोई हमदर्द न मिले तो लोग असहाय और बेसहारा महसूस करने लगते हैं. ऐसा लगने लगता है कि सब कुछ ख़त्म हो रहा है. इससे भी ख़तरनाक स्थिति तब पैदा होती है जब कोई ख़ुदगर्ज हमदर्द बनने का नाटक करता है.
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नेपाल उबल रहा है. राजनीतिक दलों एवं सरकार की हठधर्मिता के चलते जनता का मोहभंग हो रहा है और देश में अकेली पड़ी राजशाही को अपने लिए नई संभावनाएं दिखने लगी हैं. नए संविधान के गठन की समय सीमा नज़दीक आती जा रही है, लेकिन संविधान का कोई नामोनिशान भी अब तक नज़र नहीं आ रहा.
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एक राष्ट्र के रूप में आज हम जिन समस्याओं से रूबरू हैं, वह बेवजह नहीं है. आतंकवाद, बढ़ती बेरोज़गारी, ग़रीबी, शिक्षा का अभाव, संस्थाओं के बीच टकराव और सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने के लिए मची होड़ आदि सारी समस्याओं की जड़ में दशकों का कुशासन और देश के प्रति हमारी प्रतिबद्धता में कमी है.
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जनता एक ज़िम्मेदार संसद का निर्माण करे |
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