अर्थनीति तय करेगी देश की राजनीति

2 जी घोटाले में जब ए राजा पकड़े गए, तो कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता, यहां तक कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह

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ध्वस्त अर्थव्यवस्था का मनमोहनी तिलिस्म

अपने दस साल के कार्यकाल के दौरान तीसरी प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी नाकामियों पर मुहर

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पीएम कि कुर्सी के काबिल कौन

पांच राज्यों के चुनाव संपन्न हो चुके हैं और अब लोकसभा चुनाव होने हैं. इसके लिए सभी राजनीतिक दल अपने-अपने

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चुनाव को मनोरंजन का ज़रिया न बनने दें

शायद यही चुनाव का जादू है. हमारे देश के लोग किसी भी चुनाव में चाहे वो कॉरपोरेशन के चुनाव हों,

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यह संसद संविधान विरोधी है

सरकार को आम जनता की कोई चिंता नहीं है. संविधान के मुताबिक़, भारत एक लोक कल्याणकारी राज्य है. इसका साफ़ मतलब है कि भारत का प्रजातंत्र और प्रजातांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार आम आदमी के जीवन की रक्षा और उसकी बेहतरी के लिए वचनबद्ध है. लेकिन सरकार ने इस लोक कल्याणकारी चरित्र को ही बदल दिया है. सरकार बाज़ार के सामने समर्पण कर चुकी है, लेकिन संसद में किसी ने सवाल तक नहीं उठाया.

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संसद ने सर्वोच्च होने का अधिकार खो दिया है

भारत की संसद की परिकल्पना लोकतंत्र की समस्याओं और लोकतंत्र की चुनौतियों के साथ लोकतंत्र को और ज़्यादा असरदार बनाने के लिए की गई थी. दूसरे शब्दों में संसद विश्व के लिए भारतीय लोकतंत्र का चेहरा है. जिस तरह शरीर में किसी भी तरह की तकली़फ के निशान मानव के चेहरे पर आ जाते हैं, उसी तरह भारतीय लोकतंत्र की अच्छाई या बुराई के निशान संसद की स्थिति को देखकर आसानी से लगाए जा सकते हैं.

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खुदरा बाज़ार में विदेशी निवेश : यह एक छलावा है

भारतीय राजनीति में शर्मनाक कीर्तिमान स्थापित हो रहे हैं. क्या हमने अमेरिका को भारत की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप करने की छूट दे दी है. अगर नहीं, तो देश की विपक्षी पार्टियां और मीडिया ने यह बात क्यों नहीं उठाई कि अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने ममता बनर्जी से खुदरा बाज़ार में विदेशी पूंजी निवेश जैसे विवादित मामले पर क्यों बात की?

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पश्मिच बंगालः ममता युवाओं में आस जगाएंगी

गर्द के ग़ुबार में आग की तस्वीरें धुंधली दिखती हैं, पर वह आग अगर किसी इंसान की देह में लगी हो तो किसी भी दर्शक की संवेदनाओं के कोमल तंतु को झुलसाने के लिए का़फी हैं. बंगाल में इस समय चुनावी गर्द का कोहरा है और प्रसून दत्ता जैसे बेरोज़गार युवक द्वारा आत्मदाह की कोशिश, वह भी बंगाल की उम्मीद ममता बनर्जी के घर के सामने, एक राष्ट्रीय मुद्दा बनती है.

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कुटुंबक्‍कमः एक गांव, जो विकास का मॉडल है

वर्ष 1857 के आंदोलन को अंग्रेजों ने किसी तरह दबा तो दिया, लेकिन यह बात उनकी समझ से बाहर थी कि आख़िर यह सब हुआ कैसे. यह आंदोलन कैसे हुआ, कैसे इतना फैला और किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी. ये सारी बातें समझने के लिए अंग्रेजों ने एक आयोग बनाया, जिसकी अध्यक्षता सर ए ओ ह्यूम को सौंपी गई.

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रोजगार की तलाश में पलायन जारी

ग्रामीणों को 100 दिन रोज़गार उपलब्ध कराने के दावों और वादों के साथ चलाई जा रही महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना को लागू हुए चार वर्ष हो गए हैं, किंतु पलायन रुकने का नाम नहीं ले रहा है. ग्रामीणों को रोज़गार उपलब्ध कराने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की ओर से पैसा तो मिल रहा है, बावजूद इसके छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों से रोज़गार की तलाश में लोगों का पलायन जारी है.

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ना जइयो परदेस

संजय साव की उम्र 32 साल है. वह बिहार के गोपालगंज का रहने वाला है. गांव में रहकर वह इतना नहीं कमा पाता कि अपने परिवार के भोजन और अन्य ज़रूरतों को पूरा कर सके. दिक्कतों को झेलते-झेलते परेशान होकर वह कमाने के लिए बाहर जाने का फैसला करता है, ताकि अपने घर कुछ पैसा भेज सके और बच्चों को कम से कम दो व़क्त की रोटी नसीब हो.

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दिल्‍ली की प्रवासी आबादी जाएं तो जाएं कहां!

फैक्ट्रियों में मज़दूरी करके, सड़कों पर रिक्शा-ऑटो एवं छोटी-मोटी दुकान चलाकर किसी तरह अपनी ज़िंदगी गुजार रहे इन लोगों का भविष्य वैसे ही अनिश्चितता के भंवर में उलझा हुआ है, रही-सही कसर महंगाई ने पूरी कर दी है. दिल्ली के बारे में कहा जाता है कि यहां हर आय वर्ग के लोगों के लिए रहने की संभावना मौजूद है, लेकिन अब यह मिथक टूटता जा रहा है.

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बीजेपी के अस्तित्‍व पर संकट

मुसीबतें हर आम इंसान और समाज पर आती हैं. हम लड़ते भी हैं. इस लड़ाई में अगर कोई हमदर्द न मिले तो लोग असहाय और बेसहारा महसूस करने लगते हैं. ऐसा लगने लगता है कि सब कुछ ख़त्म हो रहा है. इससे भी ख़तरनाक स्थिति तब पैदा होती है जब कोई ख़ुदगर्ज हमदर्द बनने का नाटक करता है.

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नेपालः राजशाही वापसी की राह पर

नेपाल उबल रहा है. राजनीतिक दलों एवं सरकार की हठधर्मिता के चलते जनता का मोहभंग हो रहा है और देश में अकेली पड़ी राजशाही को अपने लिए नई संभावनाएं दिखने लगी हैं. नए संविधान के गठन की समय सीमा नज़दीक आती जा रही है, लेकिन संविधान का कोई नामोनिशान भी अब तक नज़र नहीं आ रहा.

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हमने इतिहास से कुछ नहीं सीखा

एक राष्ट्र के रूप में आज हम जिन समस्याओं से रूबरू हैं, वह बेवजह नहीं है. आतंकवाद, बढ़ती बेरोज़गारी, ग़रीबी, शिक्षा का अभाव, संस्थाओं के बीच टकराव और सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने के लिए मची होड़ आदि सारी समस्याओं की जड़ में दशकों का कुशासन और देश के प्रति हमारी प्रतिबद्धता में कमी है.

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