विदेशी मुद्रा में तपोभूमि में हलचल

बौद्धों के काग्यू कर्मा पंथ के धर्मगुरु 17वें करमापा पद को लेकर वर्षों से चले आ रहे विवाद से बौद्ध धर्मावलंबियों के साथ-साथ तथागत की तपोभूमि बोधगया तप ही रही थी कि इसी बीच चीन से भागकर आए और तिब्बत की निर्वासित सरकार के राष्ट्राध्यक्ष दलाई लामा का समर्थन लेकर भारत में शरण पाए 17वें करमापा उग्येन त्रिनले दोरजे के हिमाचल स्थित मठ से करोड़ों कीविदेशी मुद्रा पाए जाने और चीन के लिए जासूसी करने के संदेह ने शेष बौद्ध देशों को भी हतप्रभ कर दिया है

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चंपारण के ऐतिहासिक स्‍थलः झूठे वादों की मार से बेहाल

वर्ष 2010 बीत गया और चंपारण के मुद्दे जस के तस रहे. विकास यात्राएं हुईं, नई सरकार का गठन भी हुआ, लेकिन सत्याग्रही भूमि पर मुद्दों का समाधान नहीं हुआ. चंपारण को खास पहचान देने वाले स्थलों का जीर्णोद्धाधार तक नहीं हुआ है.

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सबका मालिक एक

हेमाड पंत जी साई सच्चरित्र में लिखते हैं, बाबा अक्सर कहा करते थे कि सबका मालिक एक. आख़िर इस संदेश का मतलब क्या था? आइए बाबा के इसी संदेश पर कुछ बातें करें. बाबा के विषय में हम जितना मनन करते जाते हैं, उनके संदेशों को समझना उतना ही आसान होता जाता है. बाबा के बारे में लिखना और पढ़ना हम साई भक्तों को इतना प्रिय है कि उनकी एक लेखिका भक्त ने तो अपनी एक किताब में बाबा को ढेर सारे पत्र लिखे हैं. मेरा मानना है कि साई को पतियां लिखूं जो वह होय बिदेस. मन में, तन में, नैन में ताको कहा संदेस. लेकिन साई के विषय में बातें करना जैसे आत्म साक्षात्कार करना है. बाबा ने बहुत सहजता से कहा है, सबका मालिक एक. ऐसा कह पाना शायद बाबा के लिए ही संभव था, क्योंकि समस्त आसक्तियों और अनुरागों से मुक्त एक संत ही ऐसा कह सकता है. प्रचलित धर्म चाहे हिंदू, इस्लाम, सिख, ईसाई, जैन एवं बौद्ध हो या कोई अन्य, प्रश्न यह है कि जो ये धर्म सिखा रहे हैं, क्या वह ग़लत है? अगर ग़लत न होता तो बाबा को इस धरती पर अवतार लेने की आवश्यकता ही न होती.

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एक और अयोध्‍या

भारतीय सभ्यता और संस्कृति को पूरे विश्व में गौरवपूर्ण स्थान हासिल है. संसार ने हमारे प्राचीन महाकाव्यों, पुराणों एवं ग्रंथों का लोहा माना है. विश्व के कई देशों ने हमारी सभ्यता और संस्कृति का अनुकरण किया है. दक्षिण पूर्व एशिया स्थित देश थाइलैंड भी प्रभु श्रीराम के जीवन से प्रेरित है.

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नंदनगढ़ बौद्ध स्‍तूपः क्‍या यह बुद्ध की उपेक्षा है?

चंपारण के लौरिया स्थित नंदनगढ़ बौद्ध स्तूप राष्ट्रीय मानचित्र से अभी भी दूर है. बीते इतिहास को साक्षी भाव में खड़ा होकर बताने वाले इस नंदन गढ़ की देख-रेख को लेकर सरकार बिल्कुल भी चिंतित नहीं है.

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बहिष्कार ने बदली लद्दाख की फिज़ा

लेह से कुछ ही दूर सिंधु नदी के दूसरी ओर चुशोट गांव है, जो लेह ज़िले का सबसे बड़ा गांव माना जाता है. चुशोट में ज़्यादातर लोग बाल्टी शिया समुदाय से हैं. चुशोट में शियाओं का एक सदियों पुराना इमामबाड़ा है, जो बारह शिया इमामों की याद में बनाया गया है.

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लद्दा़ख: धार्मिक अंधविश्वास से बिगड़ा माहौल

लेह में स्थित शियाओं की मस्जिद लद्दा़खी राजाओं के पुराने राजमहल के ठीक बगल में बनी हुई है. कुछ दिनों पहले इसका ईरानी तरीक़े से पुनरुद्धार किया गया है, लेकिन इसके रंगे हुए खंभे और उन पर बने फूलों के ख़ूबसूरत चित्र अभी भी यह गवाही देते हैं कि असल में यह तिब्बती डिज़ाइन से बनी हुई थी.

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विभिन्न धर्मों पर बुद्ध का समाधान

लेह स्थित चोगलमसर के पास है केंद्रीय बौद्ध अध्ययन संस्थान यानी सीआईबीएस. यह भारत के प्रमुख बौद्धिक अनुसंधान और शैक्षिक संस्थानों में से एक है. इसके प्रमुख डॉ. ताशी पालजोर हैं. वह मूलत: हिमाचल प्रदेश के लाहौल से हैं, लेकिन कई सालों से लद्दा़ख में ही रहते हैं.

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लद्दाख: 1989 के बहिष्कार ने बदली फिज़ा

तीस वर्षीय नामग्याल एक लामा है, लेह से लगभग 15 किलोमीटर दूर स्थित थिक्से गोनपा के सदियों पुराने भव्य बौद्ध मठ में उसका निवास है. लद्दाख के अन्य लामाओं की तरह उसने अपना अधिकांश जीवन मठ में ही बिताया है. नामग्याल केवल सात साल का था, जब पहली बार इस मठ में आया था. मठ का जीवन कड़ी दिनचर्या वाला होता है.

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परस्पर अविश्वास से गहराया लेह का सांप्रदायिक विवाद

वर्ष 1989 के आसपास कश्मीर में आतंकवाद के उदय के बाद लेह की बौद्ध जनता को यह अंदेशा होने लगा कि जम्मू एवं कश्मीर में उसका भविष्य सुरक्षित नहीं है. अधिकांश बौद्धों को यह डर सताने लगा कि मुस्लिम समुदाय पूरे इलाक़े पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर सकता है. इस डर के पीछे दो वजहों की अहम भूमिका थी.

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लद्दाख में बौद्ध-मुस्लिमों के बीच बदलते रिश्ते

लद्दाख में रहने वाले तीनों प्रमुख समुदायों बौद्ध, शिया और सुन्नियों के बीच के रिश्ते परंपरागत रूप से सौहार्द्रपूर्ण रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों में राजनीतिक कारणों से इन संबंधों में खटास आई है. इसकी अंतिम परिणति लेह ज़िले में बौद्धों द्वारा मुसलमानों के सामाजिक बहिष्कार के रूप में देखने को मिली, जब लद्दाख बुद्धिस्ट एसोसिएशन (एलबीए) ने 1989 में इससे संबंधित घोषणा को अमलीजामा पहनाया.

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