एक फिल्म आई थी, जिसका एक बहुत मशहूर संवाद था, तारीख़ पर तारीख़, तारीख़ पर तारीख़, तारीख़ पर तारीख़. दरअसल, यह वाक्य हमारी न्याय-व्यवस्था की उस कमज़ोरी को दर्शाता है, जिसमें न्याय पाने की चाह लिए पीढ़ियां गुज़र जाती हैं. लेकिन फिर भी न्याय नहीं मिलता. सच तो यह है कि आज देश के जो [...]
Tags: अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष, अमेरिका, अर्थशास्त्री, खेती, ग़रीब, ग़रीबी, घोटाला, चंद्रशेखर, देश, नरसिम्हा राव, नौजवानों, न्याय-व्यवस्था, प्रधानमंत्री, बिजली, भविष्य, भाषण, भ्रष्टाचार, मनमोहन सिंह, राजीव गांधी, विदेशी बैंकों, वीपी सिंह, व्यवस्था, सामाजिक परिवर्तन, हिंदुस्तान Posted in जब तोप मुकाबिल हो by Author: संतोष भारतीय | 1 Comment » | Read More... |
यह एक पुराना तर्क है कि जब समस्याएं असामान्य हों, तो ऐसी समस्याओं से निपटने का तरीक़ा भी असामान्य होना चाहिए. अगर कठिन समस्याओं से निपटने के लिए हम साधारण तरी़के अपनाएंगे, तो वे कभी हल नहीं होंगी. कुछ साल पहले तक भारत एक सुपर पावर बनने की ओर अग्रसर था, लेकिन पिछले तीन सालों [...]
Tags: आम आदमी, कांग्रेस पार्टी, कॉरपोरेट जगत, खोखला, ग़रीब आदमी, दिशाहीन, बजट, भारत, भाषण, भ्रष्टाचार, मनमोहन सिंह, महिला, युवा, यूपीए सरकार, राहुल गांधी, वित्त मंत्री, व्यवसायियों, सोनिया गांधी Posted in Crousel1, पहला पन्ना by Author: डा. मनीष कुमार | No Comments » | Read More... |
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा में आया अंतर अब साफ़-साफ़ दिखाई देने लगा है. संघ की नींव किसने डाली और धीरे-धीरे पिछले 87 सालों में कैसे बदलाव आए, उन्हीं बिंदुओं पर चौथी दुनिया की विशेष पड़ताल…. केशवराव बलिराम हेडगेवार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक थे. दरअसल, उन्होंने ही प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की असफल क्रांति [...]
Tags: अजमेर, अर्धसैनिक संगठन, आरएसएस, केशवराव बलिराम हेडगेवार, कोलकाता, गोलवलकर, चुनौतियों, नाथूराम गोडसे, बालासाहेब देवरस, भाषण, मुसलमानों, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, समझौता एक्सप्रेस, समाचारपत्रों, हिंदुत्व Posted in Crousel2, कवर स्टोरी-2 by Author: निर्मलेंदु | No Comments » | Read More... |
शायद जयप्रकाश नारायण और कुछ अंशों में विश्वनाथ प्रताप सिंह के बाद देश के किसी नेता को जनता का इतना प्यार नहीं मिला होगा, जितना अन्ना हजारे को मिला है. मुझे लगा कि अन्ना हजारे के साथ कुछ समय बिताया जाए, ताकि पता चले कि जनता उन्हें किस नज़रिए से देखती है और उन्हें क्या रिस्पांस देती है.
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संसद सर्वोच्च है, संसद पवित्र है, संसद लोकतंत्र का मंदिर है और हिंदुस्तान में संसद आज आम आदमी के सुख, सुरक्षा और लोकतंत्र की गारंटी है. इसी संसद ने 1950 में एक संविधान बनाया था. 1950 के बाद संसद का यह धर्म था कि वह संविधान की मूल भावना की रक्षा करे. सवाल यह है कि क्या संसद ने 1950 में बने संविधान की आत्मा, संविधान की भावना की रक्षा की?
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बीती 27 फरवरी को बंगलुरू में ईटीवी उर्दू और ईटीवी कन्नड़ ने एक सेमिनार किया, जिसका विषय था-फ्यूचर ऑफ कॉरपोरेट्स इन इंडिया. मुख्य वक्ता कंपनी मामलों के केंद्रीय मंत्री वीरप्पा मोइली थे और मुख्य अतिथि थे कर्नाटक के मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा. सेमिनार में जाफर शरीफ, एम वी राजशेखर एवं जमीर पाशा भी शामिल थे, जो कर्नाटक की बड़ी हस्तियां हैं.
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग की भूमिका पर शुरू से ही सवालिया निशान लगते रहे हैं, चाहे वह हाथी की मूर्तियां ढकवाने का आदेश हो या कोई और काम. जनता ने चुनाव आयोग के दोहरे मापदंड अपनाने वाले रवैये पर सवाल भी उठाया. चुनाव आयोग के कई फैसले लोगों की समझ से परे भी रहे.
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याद कीजिए अप्रैल का महीना और जंतर-मंतर. जनलोकपाल के लिए अन्ना का आंदोलन. माहौल और मौसम की गरमाहट. लेकिन अप्रैल से दिसंबर तक आते-आते दिल्ली की यमुना में का़फी पानी बह चुका था.
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जाना था जापान पहुंच गए चीन समझ गए ना… यह गीत अक्सर किसी न किसी हस्ती पर लागू होता रहता है. हाल में यह दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पर लागू हुआ. दरअसल हुआ यह कि शीला मोहिउद्दीन नगर विधानसभा क्षेत्र में कांगे्रस प्रत्याशी की सभा में प्रचार के लिए जा रही थीं, लेकिन रास्ते में उनका हेलीकॉप्टर भटक गया.
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जनता एक ज़िम्मेदार संसद का निर्माण करे |
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