अन्ना हजारे नेता नहीं, जननेता हैं

शायद जयप्रकाश नारायण और कुछ अंशों में विश्वनाथ प्रताप सिंह के बाद देश के किसी नेता को जनता का इतना प्यार नहीं मिला होगा, जितना अन्ना हजारे को मिला है. मुझे लगा कि अन्ना हजारे के साथ कुछ समय बिताया जाए, ताकि पता चले कि जनता उन्हें किस नज़रिए से देखती है और उन्हें क्या रिस्पांस देती है.

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जनता से टकराने की कोशिश मत कीजिए

संसद सर्वोच्च है, संसद पवित्र है, संसद लोकतंत्र का मंदिर है और हिंदुस्तान में संसद आज आम आदमी के सुख, सुरक्षा और लोकतंत्र की गारंटी है. इसी संसद ने 1950 में एक संविधान बनाया था. 1950 के बाद संसद का यह धर्म था कि वह संविधान की मूल भावना की रक्षा करे. सवाल यह है कि क्या संसद ने 1950 में बने संविधान की आत्मा, संविधान की भावना की रक्षा की?

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कॉरपोरेट सेक्टर अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी को समझे

बीती 27 फरवरी को बंगलुरू में ईटीवी उर्दू और ईटीवी कन्नड़ ने एक सेमिनार किया, जिसका विषय था-फ्यूचर ऑफ कॉरपोरेट्‌स इन इंडिया. मुख्य वक्ता कंपनी मामलों के केंद्रीय मंत्री वीरप्पा मोइली थे और मुख्य अतिथि थे कर्नाटक के मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा. सेमिनार में जाफर शरीफ, एम वी राजशेखर एवं जमीर पाशा भी शामिल थे, जो कर्नाटक की बड़ी हस्तियां हैं.

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क्‍या चुनाव आयोग सचमुच एक मजबूत संस्‍था है

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग की भूमिका पर शुरू से ही सवालिया निशान लगते रहे हैं, चाहे वह हाथी की मूर्तियां ढकवाने का आदेश हो या कोई और काम. जनता ने चुनाव आयोग के दोहरे मापदंड अपनाने वाले रवैये पर सवाल भी उठाया. चुनाव आयोग के कई फैसले लोगों की समझ से परे भी रहे.

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जनलोकपाल : बहस की जगह भाषण विरोध और प्रदर्शन

याद कीजिए अप्रैल का महीना और जंतर-मंतर. जनलोकपाल के लिए अन्ना का आंदोलन. माहौल और मौसम की गरमाहट. लेकिन अप्रैल से दिसंबर तक आते-आते दिल्ली की यमुना में का़फी पानी बह चुका था.

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चुनावी तड़काः जाना था जापान पहुंच गए…

जाना था जापान पहुंच गए चीन समझ गए ना… यह गीत अक्सर किसी न किसी हस्ती पर लागू होता रहता है. हाल में यह दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पर लागू हुआ. दरअसल हुआ यह कि शीला मोहिउद्दीन नगर विधानसभा क्षेत्र में कांगे्रस प्रत्याशी की सभा में प्रचार के लिए जा रही थीं, लेकिन रास्ते में उनका हेलीकॉप्टर भटक गया.

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स़िर्फ बोलने के लिए बोलना!

इन दिनों जितना बोला जा रहा है, उतना शायद इतिहास में कभी नहीं बोला गया. कौन बोल रहा है, क्यों बोल रहा है, क्या बोल रहा है, समझ में नहीं आ रहा. बोला जाना चीखे जाने में तब्दील हो चुका है. लोग इतनी ताक़त से माइक में चिल्ला रहे हैं कि बोला जाना शोर मचाने की श्रेणी में आ गया है.

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