जनसमस्याओं के समाधान की इच्छाशक्ति किसी भी राजनीतिक दल में नहीं है

अभी भी देश में ऐसे लोगों की बड़ी संख्या है, जो चुनाव में किस पार्टी ने क्या किया और कौन

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लापरवाही, मनमानी और भ्रष्‍टाचार का गढ़

साढ़े पांच दशक पूर्व कई लोक कल्याणकारी उद्देश्यों को लेकर स्थापित किया गया भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) आज लापरवाही, मनमानी

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बुंदेलखंड : पैकेज के बावजूद बदहाली बरकरार

देश के बीमारू राज्यों में शुमार उत्तर प्रदेश के सात ज़िलों में फैला बुंदेलखंड आज भी जल, ज़मीन और जीने के लिए तड़पते लोगों का केंद्र बना हुआ है. रोज़ी-रोटी और पानी की विकट समस्या से त्रस्त लोग पलायन के लिए मजबूर हैं. प्रदेश के कुल क्षेत्रफल का आठवां हिस्सा खुद में समेटे यह समूचा अंचल भूमि के उपयोग-वितरण, सिंचाई, उत्पादन, सूखा, बाढ़ और आजीविका जैसे तमाम मामलों में बहुत पीछे है.

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भूखों को रोटी देने की कवायद

देश में खाद्य सुरक्षा विधेयक को मंज़ूरी मिलने से भुखमरी से होने वाली मौतों में कुछ हद तक कमी आएगी, ऐसी उम्मीद की जा सकती है. हाल में प्रगतिशील जनतांत्रिक गठबंधन (यूपीए) की अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 को मंज़ूरी दी है.

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वादों का मारा बुंदेलखंड

बुंदेलखंड में चित्रकूट के घाट पर न तो संतों की भीड़ है और न चंदन घिसने के लिए तुलसीदास जी हैं. हां, बुंदेलखंड की व्यथा सुनने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एवं कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ज़रूर बांदा आए. उन्होंने पानी की सुविधा के लिए दो सौ करोड़ रुपये देने का वादा करके आंसू पोंछने की कोशिश की है, लेकिन यहां की जनता के दु:ख-दर्द दूर होते नज़र नहीं आ रहे हैं.

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बजट 2011 इसमें गरीबों के लिए कुछ भी नहीं है

प्रणब मुखर्जी के बजट में दबे-कुचलों, ग़रीबों, अल्पसंख्यकों, मज़दूरों, महिलाओं, बच्चों और किसानों के लिए धेले भर की जगह नहीं दिखाई पड़ती. बहुत पहले ही देश में बजट का स्वरूप बदल गया था. आज स्थिति यह है कि बजट सरकार की आमदनी और खर्च का ब्योरा नहीं, बल्कि जनता को आंकड़ों में उलझा कर बेवक़ूफ़ बनाने की एक सोची समझी साज़िश बनकर रह गया है.

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जन्म से पहले की भूख

गरीबों के नाम पर योजनाएं ढेर सारी हैं, लेकिन वितरण व्यवस्था में गड़बड़ियों के कारण आर्थिक असमानता की खाई चौड़ी होती जा रही है. भारत में हर साल लगभग 25 लाख शिशुओं की अकाल मृत्यु हो जाती है. इसी तरह 42 प्रतिशत बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार हैं.

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यह संसद और सर्वोच्च न्यायालय की परीक्षा है

अब फैसला सुप्रीम कोर्ट को करना है. साठ साल बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. बिना किसी प्रमाण के कोर्ट ने कहा है कि राम का जन्म वहां हुआ है, जहां बीस साल पहले बाबरी मस्जिद के गुम्बद थे. यह आस्था है और इसे अदालत ने प्रमाण के रूप में माना है. अगर जन्म स्थान कोर्ट मानता है तो कहीं उनका महल होगा, कहीं राजा दशरथ का दरबार होगा, कहीं तीनों महारानियों का निवास रहा होगा.

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सिल्‍क नगरी का सच

चंपानगर (भागलपुर) निवासी मोहम्मद जावेद अंसारी एक बुनकर है. उसके पास ख़ुद का पावरलूम तो है, लेकिन इतना पैसा नहीं कि वह उसे चला सके. इसके अलावा बिजली की समस्या अलग से. नतीजतन, उसके घर की स्थिति दिनोंदिन दयनीय होती जा रही है.

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सार-संक्षेपः गृहयुद्ध का रूप है नक्सलवाद

पुरी पीठ के शंकराचार्य जगतगुरू निश्चलानंद सरस्वती देश में बढ़ते नक्सलवादी प्रभाव और आतंक को भारत में गृहयुद्ध का एक रूप मानते हैं. इनका कहना है कि नेपाल की तरह ही हिन्दू बहुल भारत राष्ट्र की एकता अखंडता और सुरक्षा को विदेशी षड़यंत्रकारी नष्ट करना चाहते हैं और इसके लिए वह नक्सलवादियों को खुला प्रोत्साहन देने के साथ हर तरह की मदद भी कर रहे हैं.

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अन्‍न का अनादर

महंगाई और भूख से परेशान इस देश में भंडारण की समुचित व्यवस्था न होने से अन्न सड़ रहा है. और, यह देश के नीति नियंताओं के लिए शर्म की बात है. महंगाई के मुद्दे पर हो रहे हंगामे को शांत करने के लिए प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह एवं वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि रबी की फसल आने के बाद महंगाई में गिरावट दर्ज़ होगी, लेकिन शायद उन्हें यह नहीं मालूम कि पिछले वर्ष भी देश में अनाज की कमी नहीं थी.

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अभी भी चुनौती है डंपर कांड

मुख्यमंत्री एवं मंत्रियों द्वारा विधानसभा के पटल पर रखी गई, संपत्ति संबंधी जानकारी में राज्य के वित्तीय विशेषज्ञों को असमंजस में डाल दिया है. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में शिवराज सिंह चौहान और उनकी पत्नी समेत सात व्यक्तियों के ख़िला़फ जनहित याचिका ख़ारिज़ कर दी है.

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अनाज के लिए तरसते आदिवासी

मध्य प्रदेश के खंडवा ज़िले के कोरकू आदिवासी बहुल खालवा विकासखंड में आदिवासी अनाज के लिए तरस रहे हैं. पिछले वर्ष विधानसभा चुनाव के समय यह क्षेत्र भुखमरी से पीड़ित आदिवासियों की व्यथा-गाथा के कारण चर्चा में आया था. लगभग दो माह की अवधि में खालवा में 50 से ज़्यादा बच्चे कुपोषण का शिकार होकर असमय काल के गाल में समा गए.

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ममता दीदी, जरा नज़र इधर भी डालें

देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली भारतीय रेल में कल्याणकारी योजना के तहत कई अर्द्धसरकारी संस्थाएं चलाई जाती है जिनमें रेलवे मनोरंजन संस्थान, कैंटीन, को-ऑपरेटिव, सिलाई सेंटर, आर्युवेदिक एवं होम्योपैथिक स्वास्थ्य केंद्र आदि हैं. इन संस्थानों में हज़ारों श्रमिक कार्यरत हैं लेकिन विडंबना है कि रेलवे के इन उपक्रमों में कार्यरत श्रमिकों को जो मासिक वेतन दिया जा रहा है उसमें श्रम अधिनियम एवं रेलवे बोर्ड के नियमों की खुल्लम-खुल्ला अवहेलना की जा रही है.

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