यह आम आदमी की पार्टी है

भारतीय राजनीति का एक शर्मनाक पहलू यह है कि देश के राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दलों की कमान चंद परिवारों तक सीमित हो गई है. कुछ अपवाद हैं, लेकिन वे अपवाद ही हैं. अगर ऐसा ही चलता रहा तो देश के प्रजातंत्र के लिए खतरा पैदा हो जाएगा. राजनीतिक दलों और देश के महान नेताओं की कृपा से यह खतरा हमारी चौखट पर दस्तक दे रहा है, लेकिन वे देश की जनता का मजाक उड़ा रहे हैं.

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एक नहीं, देश को कई केजरीवाल चाहिए

साधारण पोशाक में किसी आम आदमी की तरह दुबला-पतला नज़र आने वाला शख्स, जो बगल से गुजर जाए तो शायद उस पर किसी की नज़र भी न पड़े, आज देश के करोड़ों लोगों की नज़रों में एक आशा बनकर उभरा है. तीखी बोली, तीखे तर्क और ज़िद्दी होने का एहसास दिलाने वाला शख्स अरविंद केजरीवाल आज घर-घर में एक चर्चा का विषय बन बैठा है. अरविंद केजरीवाल की कई अच्छाइयां हैं तो कुछ बुराइयां भी हैं. उनकी अच्छाइयों और बुराइयों का विश्लेषण किया जा सकता है, लेकिन इस बात पर दो राय नहीं है कि देश में आज भ्रष्टाचार के खिला़फ जो माहौल बना है, उसमें अरविंद केजरीवाल का बड़ा योगदान है.

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सच का सिपाही मारा गया

सच जीतता ज़रूर है, लेकिन कई बार इसकी क़ीमत जान देकर चुकानी पड़ती है. सत्येंद्र दुबे, मंजूनाथ, यशवंत सोणावने एवं नरेंद्र सिंह जैसे सरकारी अधिकारियों की हत्याएं उदाहरण भर हैं. इस फेहरिस्त में एक और नाम जुड़ गया है इंजीनियर संदीप सिंह का. संदीप एचसीसी (हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी) में हो रहे घोटाले को उजागर करना चाहते थे.

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एक आंदोलन का भटकना

जय प्रकाश नारायण अलग तरह के नायक थे. उनकी विचारधारा उन्हें मार्क्सवाद एवं समाजवाद से गांधीवाद की ओर ले गई. उनके जीवन भर की योजना थी, गांधी के भूदान, श्रमदान एवं ग्रामदान जैसे विषयों पर संरचनात्मक काम करना.

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सेना के आंतरिक कार्यक्षेत्र में अनाधिकृत हस्‍तक्षेप

जिस तरह सेना के नेतृत्व में भ्रष्ट बैंकों, वित्तीय संस्थानों और उद्योगों की साझेदारी से ऊर्जा और अन्य कंपनियों के हितों के लिए अमेरिकी मीडिया व्यवसायिक घरानों का मुखपत्र बन गई थी, उसी तरह भारत में भी व्यवसायिक समूहों के स्वामित्व वाले टीवी चैनलों में नीरा राडिया टेप के केस के दौरान टीवी एंकर कॉर्पोरेट घरानों का रु़ख लोगों के सामने रख रहे थे.

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सेना, साज़िश और सियासत

पिछले तीन सालों में कांग्रेस के नेतृत्व में चल रही सरकार में घट रही घटनाएं और उसके दूरगामी परिणामों से देश की अवाम चिंतित ही नहीं, बेहद परेशान भी है. पिछले दिनों जिस तरह से देश में सैन्य बग़ावत की खबरों की अटकलें लगीं, वे आज़ाद भारत के इतिहास में एक अनहोनी की तरह है.

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सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्र की गरिमा को पुनर्स्थापित किया

एक बार फिर उच्चतम न्यायालय ने देश की प्रतिष्ठा बचाई और उसका मान रखा. जहां एक तऱफ देश की कार्यपालिका भ्रष्ट मंत्रियों के ख़िला़फ कार्रवाई करने में असफल रही, वहीं एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने देश के सम्मान को बचाया और उसकी गरिमा को पुनर्स्थापित किया. पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने 2-जी के सभी लाइसेंस निरस्त कर दिए. सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह बुद्धिमानी का परिचय देते हुए निष्पक्षता दिखाई, वह इस देश के लोकतंत्र के लिए एक बेहतरीन उदाहरण है.

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भारत यानी डॉ. जैकेल और मिस्टर हाइड

पाकिस्तान भारत की तरह किस मायने में समान है? इसमें कोई शक नहीं कि वह क्रिकेट में बेहतर है. इंग्लैंड से हुए मुक़ाबले में उसे जीत मिली, जबकि ऑस्ट्रेलिया में भारत का सूपड़ा सा़फ हो गया. जहां तक सुप्रीम कोर्ट का सवाल है तो निश्चित तौर पर वह भी भारत के सुप्रीम कोर्ट की तरह अच्छा है.

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मैरिड टू अमेरिका

अस्सी के दशक में कालचक्र और आतंक ही आतंक जैसी अंडरवर्ल्ड पर कामयाब फिल्में बनाने वाले लेखक, निर्देशक दिलीप शंकर पांच साल के लंबे अंतराल के बाद मैरिड टू अमेरिका नाम की फिल्म लेकर एक बार फिर दर्शकों के बीच हैं. रंगमंच से फिल्मों में आए दिलीप शंकर की बॉलीवुड में अंतिम फिल्म निगेहबान थी, जो साल 2007 में आई थी.

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नव उदारवाद की प्रयोगशाला में भ्रष्‍टाचार

एक दशक पहले यह खतरा पहचान में आने लगा था कि अगर नव उदारवादी नीतियों के मुक़ाबले में खड़े होने वाले जनांदोलनों का राजनीतिकरण और समन्वयीकरण नहीं हुआ तो नव उदारवाद के दलाल, चाहे वे नेता हों, नौकरशाह हों, बुद्धिजीवी हों, एनजीओबाज हों, धर्मगुरु हों, कलाकार हों या खिलाड़ी, विरोध के सारे प्रयास नाकाम कर देंगे. वही हो रहा है.

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अन्ना और रामदेव उम्मीद की एक किरण हैं

यह देश विश्वास का मारा हुआ है. इस देश ने हर उस आदमी पर भरोसा किया, जिसने कहा कि हम समस्याओं से निजात दिलाएंगे. एक ओर नेहरू, इंदिरा, राजीव एवं वी पी सिंह तो दूसरी ओर जनता ने डॉ. राम मनोहर लोहिया और जेपी पर भरोसा किया. लोहिया ने सबसे पहले मिली-जुली सरकार की शुरुआत की थी.

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भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था को उड़ा ले जाएगी अन्‍ना की आंधी

देश भर में अन्ना हजारे की जय जयकार, भ्रष्टाचार के ख़िला़फ आंदोलन की गूंज, शहरी युवाओं का सड़कों पर उतरना और कैंडिल मार्च, यह सब एक नई राजनीति की शुरुआत के संकेत हैं. भारत की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां सत्तापक्ष और विपक्ष के मायने बदल गए हैं. सत्तापक्ष में कांग्रेस पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और अन्य राजनीतिक दलों के साथ-साथ ब्यूरोक्रेसी है और उसके विरोध में देश की जनता खड़ी है. मतलब यह कि एक तऱफ देश चलाने वाले लोग हैं और दूसरी तऱफ देश की जनता है.

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भ्रष्टाचार के खिला़फ जनता को आगे आना होगा

हिंदुस्तान सबसे बड़ा प्रजातंत्र होने के बावजूद दुनिया का 72 वां सबसे भ्रष्ट देश है. दुनिया में 86 ऐसे देश हैं, जहां भारत से कम भ्रष्टाचार है. आज़ादी के बाद से ही हम भ्रष्टाचार के साथ जूझ रहे हैं. भ्रष्टाचार के खिला़फ कारगर क़ानून बनाने की योजना इंदिरा गांधी के समय से चल रही है. 42 साल गुज़र गए, फिर भी हमारी संसद लोकपाल क़ानून बना नहीं सकी.

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यह संसद के चेतने का समय है

संसद को चेतना होगा. देश की सारी संस्थाओं पर विशेषकर संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल खड़े हो गए हैं. इन्हें सवालों के दायरे में आने से बचाना चाहिए, नहीं तो व्यवस्था पर विश्वास का संकट पैदा हो जाएगा. नए संकट के बादल दिखाई दे रहे हैं.

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आजाद भारत के महान घोटाले

किसी भी लोकतंत्र का स्वास्थ्य इस बात पर निर्भर करता है कि उसके तीनों अंगों-विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संबंध कैसे हैं और इन तीनों में जवाबदेही बची है या नहीं. आज भारत की दुर्दशा भी इन्ही दो कारकों पर आंकी जा सकती है. पिछले साल भारत में भ्रष्टाचार और घोटालों का बोलबाला रहा.

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दिल्‍ली का बाबूः भ्रष्ट बाबू और सरकारी निष्क्रियता

केंद्रीय सतर्कता आयोग की 2009 की वार्षिक रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ है कि कैसे बहुत सारे भ्रष्ट बाबू खुद पर लगे आर्थिक दंड का भुगतान करने से बच गए और इसकी वजह रही सरकारी निष्क्रियता. रिपोर्ट के मुताबिक़, 2009 में पैनल ने भ्रष्टाचार से संबंधित 5783 शिकायतों की जांच की, लेकिन स़िर्फ 42 फीसदी दागी बाबुओं को ही दंडित किया जा सका.

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भ्रष्टाचार एक लाइलाज बीमारी

उन्नीस सौ पचास के दशक के आख़िरी दिनों में गुजरात में एक अभिनेता-लेखक हुआ करते थे, जयंती पटेल. उन्होंने एक नाटक लिखा था नेता अभिनेता, जिसमें मुख्यमंत्री अपने एक भ्रष्ट मंत्री से इस्ती़फे की मांग करता है, लेकिन इसके साथ ही यह भी कहता है कि उसे केवल अपना इस्ती़फा देना है, पैसे वापस नहीं करने हैं.

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इस्लाम की हक़ीक़त की चिंता किसे है?

यदि इस्लाम के वजूद की कोई एक वजह है तो इसका सीधा संबंध एक ऐसे समाज से है, जिसमें समानता हो और जो हर तरह की इच्छाओं और दमन से स्वतंत्र हो. इस नज़रिए से देखें तो इस्लाम के लिए इससे ज़्यादा अधार्मिक और कुछ नहीं हो सकता, यदि कोई नवजात शिशु भूख से मर रहा हो, कोई बच्चा अपने पेट के लिए भीख मांगने को मजबूर हो.

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दिल्‍ली का बाबूः नौकरशाहों का बढ़ा रुतबा

प्रशासन में विशेषज्ञ और सामान्य के बीच का मतभेद नया नहीं है और न ही यह बात किसी से छुपी है कि विशेषज्ञों को उनके काम के मुताबिक़ महत्व नहीं मिलता. इन दिनों सड़क परिवहन मंत्रालय के इंजीनियरों की फौज नौकरशाहों से ख़़फा है. इंजीनियरों का आरोप है कि नौकरशाह उन्हें किनारे करने की कोशिश कर रहे हैं.

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विधायक कोष : आपके विधायक जी ने कितना काम किया?

कोई नेता जब आप से वोट मांगने आता है तो क्या कहता है? वह कहता है कि आप उसे वोट दें ताकि वह आने वाले पांच सालों तक आपकी सेवा करता रहे. मतलब, जनता मालिक और नेता सेवक. लेकिन चुनाव जीतने के बाद क्या होता है? क्या आपको यह पता चलता है कि विधायक जी को स्थानीय क्षेत्र के विकास के लिए जो करोड़ों रुपये सरकार की तऱफ से मिलते हैं, वो कहां जाते हैं?

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भ्रष्ट राशन दुकानदारों का इलाज है आरटीआई

भारत में राशन व्यवस्था की शुरुआत के पीछे का एक मक़सद यह भी था कि कम आय वाले लोगों और ग़रीब आदमी को दो व़क्त का भोजन नसीब हो सके, लेकिन ग़रीब लोगों का भोजन भी भ्रष्टाचारियों की गिद्ध दृष्टि से बच नहीं सका. लगातार आरोप लगते रहे हैं कि ग़रीबों के हिस्से का राशन अधिकारी से लेकर राशन दुकानदार तक मिल-बांट कर खा रहे हैं.

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ट्रक एंट्री का गोरखधंधा

नीतीश सरकार एक ओर जहां राज्य की माली हालत एवं राजस्व की कमी का रोना रोते हुए विकास के लिए केंद्र से अतिरिक्त सहायता और बिहार को विशेष राज्य का दर्ज़ा देने की मांग कर रही है, वहीं दूसरी तरफ परिवहन विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं अधिकारी-दलाल गठजोड़ के कारण राज्य को प्रति वर्ष करोड़ों रुपये का चूना लग रहा है.

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सरकारी भ्रष्टजनों का खाता उजागर

भ्रष्टाचार के लिए बदनाम मध्य प्रदेश के शासन-प्रशासन में अब तक भ्रष्ट तत्वों के सम्मान की रक्षा के लिए उनके नाम उजागर नहीं किए जाते थे. यहां तक कि मुख्यमंत्री भी विधानसभा में प्रश्नकाल के दौरान अक्सर जानकारी एकत्र की जा रही है जैसी टालू सूचना देकर भ्रष्ट तत्वों के चेहरे बेनक़ाब नहीं होने देते थे.

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दिल्‍ली का बाबू : सतर्कता आयोग का नया नुस्खा

ऐसा लगता है कि नौकरशाही में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में केंद्रीय सतर्कता आयोग ने अब खुद ही मोर्चा संभाल लिया है. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भ्रष्ट अधिकारियों के यहां आयकर विभाग के छापों की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि अब आयोग के एक नए फैसले ने उनकी चिंताओं को कई गुना बढ़ा दिया है.

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मध्य प्रदेश नाकारा और निरंकुश अ़फसरशाही के शिकंजे में

राजधानी में होली पर्व की पूर्व बेला में प्रसारित एक गुमनाम पर्चा प्रशासनिक क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ था. यह पर्चा कुछ स्थानीय अ़खबारों में पूरे नमक मिर्च के साथ छापा भी गया है. इस पर्चे ने प्रशासन का मनोबल और भी कमज़ोर दिया है.

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बाबुओं पर नीतीश की नकेल

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्य के करोड़पति नौकरशाहों (इसकी चर्चा हम पहले भी कर चुके हैं) पर लगाम कसने की कवायद में अब अपना अगला कदम उठाने की तैयारी में हैं. उनकी यह कवायद यदि कामयाब होती है तो भ्रष्ट नौकरशाहों को न केवल अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ेगा, बल्कि भ्रष्टाचार के आरोप प्रमाणित होने पर उनकी संपत्ति भी जब्त हो जाएगी.

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