वर्ष 2008 में ग्लोबल इकोनॉमी स्लो डाउन (वैश्विक मंदी) आया. उस समय वित्त मंत्री पी चिदंबरम थे. हिंदुस्तान में सेंसेक्स टूट गया था, लेकिन आम भावना यह थी कि इस मंदी का हिंदुस्तान में कोई असर नहीं होने वाला है. उन दिनों टाटा वग़ैरह का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा था और एक धारणा यह बनी कि भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व की अर्थव्यवस्था की ज़रूरत नहीं है.
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नक्सलवाद, भौगोलिक स्थिति और पिछड़ापन आदि वे कारण हैं, जो विंध्याचल मंडल को प्रदेश के विकसित हिस्सों से अलग करते हैं. मंडल के तीन ज़िलों में से एक भदोही को विकसित कहा जा सकता है, किंतु कालीन उद्योग में आई मंदी ने जनपद की अर्थव्यवस्था को काफी प्रभावित किया.
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मौजूदा समय में पाकिस्तान आर्थिक दुश्वारियों के सबसे खराब दौर से गुजर रहा है. हालांकि स्थिति से निपटने के लिए सरकार हरसंभव कोशिश कर रही है, अर्थव्यवस्था में स्थिरता और मंदी से बचने के लिए तमाम नीतियां बनाई जा रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात अभी भी काफी खराब हैं.
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अमेरिकी अर्थशास्त्री पॉल कुर्गमैन ने जब वैश्विक मंदी की आशंका जताई थी और बुश प्रशासन को आगाह किया था कि पूरा विश्व भयानक आर्थिक मंदी की चपेट में आ सकता है तो उस व़क्त विश्व कला बाज़ार में भारतीय कलाकृतियों की क़ीमतें आसमान छू रही थीं और भारतीय कलाकारों की पेंटिंग्स करोड़ों रुपये में नीलाम हो रही थीं.
Tags: M F Husain, Paul Kurgman, Tyeb Mehta, global art market, paintings, एम एफ हुसैन, तैयब मेहता, पॉल कुर्गमैन, मंदी Posted in आर्थिक, कला और संस्कृति by Author: अनंत विजय | 1 Comment » | Read More... |
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जनता एक ज़िम्मेदार संसद का निर्माण करे |
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