मारुति, मजदूर और तालाबंदी : कामगारों की अनदेखी महंगी पड़ेगी

मज़दूरों की गहमागहमी और मशीनों की घरघराहट से गुलज़ार रहने वाले मानेसर (गुड़गांव) के मारुति सुजुकी प्लांट में इन दिनों सन्नाटा पसरा हुआ है. प्लांट के भीतर मशीनें बंद हैं और काम ठप पड़ा है. पिछले महीने मारुति सुजुकी प्रबंधन और मज़दूरों के बीच हुए विवाद में कंपनी के एचआर हेड की मौत हो जाने के बाद हिंसा भड़क उठी. दोनों पक्षों के बीच हुई मारपीट में कई दर्जन लोग घायल हो गए.

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बंद मिलें और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी

समस्तीपुर बिहार का प्रमुख ज़िला है. यहां पूर्व मध्य रेलवे का मंडलीय कार्यालय है, उत्तर बिहार का इकलौता राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय है. फिर भी यह जिला औद्योगिक क्षेत्र में पिछड़ा है. प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता के बावजूद यहां उद्योग पनप नहीं पा रहे हैं.

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संतति नियमन आवश्यक

बढ़ी हुई जनसंख्या निश्चय ही देश का धन है, पर कब और किस हालत में? ज़रा ग़ौर कीजिए. एक दंपत्ति समृद्ध हैं, अपनी परिचर्या के लिए दो नौकर रखे हुए हैं, सब काम उनके वे दोनों नौकर आराम से कर लेते हैं. एक दूसरे दंपत्ति ने अपनी परिचर्या के लिए, अलग-अलग कामों के लिए 9 नौकर तैनात किए हैं. काम इनका भी आराम से हो जाता है. अब बताइए, वे 9 आदमी विशेष काम करते हैं क्या? नहीं.

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बीडी मजदूर : जीवन में खुशहाली कब आएगी

किसी भी देश की आर्थिक उन्नति उसके औद्योगिक विकास पर निर्भर करती है. अगर वह किसी विकासशील देश की बात हो तो वहां के लघु उद्योग ही उसके आर्थिक विकास की रीढ़ होते हैं. भारत भी एक विकासशील देश है. ज़ाहिर है, भारत के विकास की कहानी के पीछे भी इन्हीं उद्योगों का योगदान है, लेकिन अब भारत धीरे-धीरे विकासशील देशों की कतार में का़फी आगे आ चुका है.

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प्रजातंत्र के नाम पर चीरहरण

भारत ने पिछले दो दशकों में जिस ऊर्जा के साथ विकास किया है, सराहनीय है. लेकिन इस विकास का एक काला पक्ष भी है, जिसे न तो मीडिया देखना चाहता है और न ही देश का मध्यम वर्ग. इस विकास यात्रा के दौरान ग़रीबों की संख्या बढ़ती चली गई. भारत में विश्व के 25 फीसदी ग़रीब लोग थे और आज यह प्रतिशत 39 हो गया है.

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चूडी़ मजदूरों की जिंदगी बेहाल

पुरानी कहावत है कि दिया तले हमेशा अंधेरा रहता है. यह बात पूरी तरह देश के कांच उद्योग फिरोज़ाबाद पर लागू होती है. फिरोजाबाद के कांच उद्योग ने अपनी कला से न स़िर्फ देश की सुहागिनों की कलाइयों को सजाया बल्कि कांच की कलात्मक कारीगरी से विदेशों में भी नाम रोशन किया है.

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माफियाओं से जूझते बालू मजदूर

नाव से लोगों को नदी पार ले जाते, कंधों और पतवारों की जुगलबंदी से नाव खेते, बिखेर कर मछली का जाल फेंकते और शाम के धुंधलके में वापस लौटते मछुवारों की लयबद्ध छवियां बहुत सुहानी लगती हैं. लहरों की धुन पर हिचकोले खाते उनके गीत इस दृश्य को और अधिक दिलकश बनाते हैं.

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हाथठेला मजदूरों का सपना टूटा

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान राजनीति के जादूगर हैं. वह राज्य की भोलीभाली जनता को सुनहरे सपने दिखाने में माहिर हैं और कभी-कभी तो कई दिनों तक सपनों के संसार की सैर भी कराते हैं. बाद में अपने वायदे भूलकर जनता को बेरहमी से धरती पर पटक देते हैं. हाल ही शिवराज सिंह ने राज्य के हज़ारों हाथठेला मज़दूरों की वाहवाही लूटने के लिए वायदा किया था कि सभी हाथठेला चालकों को मालिकाना हक़ दे दिया जाएगा.

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बुंदेलखंड के पत्‍थर खदान मजदूरों का दर्द

गगनचुंबी इमारतों एवं सड़कों की ख़ूबसूरती बढ़ाने के लिए पत्थर का सीना चाक करनेऔर नदी से बालू निकालने वाले मज़दूरों को दो जून की रोटी के बदले सिल्कोशिस नामक रोग मिल रहा है. विंध्याचल पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य स्थित बुंदेलखंड में उत्तर प्रदेश भाग के ललितपुर, झांसी, महोबा, हमीरपुर, बांदा एवं चित्रकूट आदि ज़िले पूरे भारत में पत्थरों के लिए प्रसिद्ध हैं.

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शोषण के शिकार बीड़ी मजदूर

कवि धूमिल की यह कविता बताती है कि आज़ादी के इतने साल बाद श्रम करने वाले आज भी हताश और लाचार हैं. हिंद स्वराज के सौ वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर गांधी को याद करने में तो देश के सभी लोग लगे हैं लेकिन कुटीर उद्योगों से जुड़े श्रमिकों के हालात बद से बदतर हो गए है.

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अप्रवासी मजदूर बदहाली के शिकार

असंगठित क्षेत्र में कार्य कर रहे सैकड़ों अप्रवासी मज़दूरों की जान-माल की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेने के लिए कोई भी तैयार नहीं है. कटनी ज़िले में विभिन्न उद्योगों से जुड़े देश भर के हज़ारों मज़दूर केवल नियोक्ता के रहमोंकरम पर आश्रित हैं. ज़िला प्रशासन या किसी अन्य संस्था द्वारा इन मज़दूरों को सुरक्षा या संरक्षण देने के लिए कोई नियमावली नहीं बनाई गई है.

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पत्थर उद्योग पर बंदी का खतरा

रोहतास और कैमूर ज़िलों में पूर्व से स्थापित बड़े एवं छोटे उद्योगों की बंदी या अवसान के बाद अब सासाराम में भी पत्थर उद्योग पर बंदी का खतरा मंडरा रहा है. तत्कालीन राजद सरकार की पर्यावरण नीतियों के कारण 2001 में अनेक खदानें बंद हो गई थीं. नई सरकार बनने के बाद उम्मीद बंधी थी कि अब मजदूरों के जीवन में कुछ नया होगा, लेकिन जो कुछ देखा जा रहा है, वह उम्मीद से परे है.

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