अगर पेंशन मिलने में परेशानी हो…

बिहार के जमालपुर से आर के निराला ने हमें पत्र के माध्यम से दो मामलों के बारे में सूचित किया था. 

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ट्रेड यूनियन की आवश्यकता और इतिवृत्त

किस तरह मज़दूर पूंजीवादी उद्योगपतियों का मुक़ाबला कर सका, इसका इतिवृत्त है. यह ज़ाहिर था कि कोई स्त्री या पुरुष, जो काम करता हो, नौकरी करता हो, अकेले जाकर मालिक के साथ न बहस कर सकता है, न मुक़ाबला. मालिकों का नपा-तुला यही जवाब होता है कि अगर इस मज़दूरी और स्थिति में तुम काम नहीं करोगे तो तुम्हारे भाई दूसरे सैकड़ों करने वाले तैयार हैं.

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मिथुन दा की छत्रछाया

इस वर्ष फिल्म स्टूडियो सेटिंग एंड एलाइड मज़दूर यूनियन ने गणतंत्र दिवस और अपना वार्षिक उत्सव एक साथ मनाया. यह मज़दूर यूनियन किसी परिचय की मोहताज नहीं है, यह अपनी तरह की एक ही संस्था है और मिथुन चक्रवर्ती की छत्रछाया में फलफूल रही है. इस संस्था के सभी मज़दूर स़िर्फ मिथुन दा को ही अपना चेयरमैन बनाए रखना चाहते हैं और उनके आलावा किसी अन्य को इस पद के लिए स्वीकार नहीं करते.

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कंपनियों का अवतरण

ये मध्यम वर्ग के लोग जो शुरू-शुरू में छुटभैय्या, कारिंदों या मंत्रियों के रूप में सामने आए थे, धीरे-धीरे स्वयं व्यापार करने लगे. एक तऱफ पूंजीपतियों की पूंजी थी, दूसरी तऱफ मज़दूर की मेहनत थी. दोनों का उपयोग करते हुए या दोनों का ही शोषण करके इस वर्ग ने अपना अधिपत्य सारे व्यापार और उद्योग पर जमा लिया.

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नव उदारवाद और भ्रष्टाचार विरोध की राजनीति

हम यह नहीं कहते कि पूर्व प्रचलित पदों, अवधारणाओं एवं तरीक़ों का मौजूदा संदर्भों में नया अर्थ और प्रयोग नहीं हो सकता, बल्कि वह होना चाहिए, लेकिन अपने स्वार्थवश या अपनी कमज़ोरियों पर पर्दा डालने के लिए इनका रूप बिगाड़ देना इनके अवधारणाओं को लांछित करने के साथ-साथ संघर्ष की परंपरा और संवैधानिक मूल्यों के प्रति द्रोह है.

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