दिल्ली का बाबू : बाबुओं पर घोटालों की मार

रेलवे बोर्ड के चेयरमैन की नियुक्ति का मसला पिछले कुछ दिनों से चर्चा का विषय बना हुआ है. अब इस

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संविधान के रास्ते से भटकता देश

यह मायने नहीं रखता कि सरकार किसकी बन रही है. कोई भी सरकार सत्ता में आए, हमें संविधान में उल्लेखित

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इतिहास के आईने में एक ईमानदार प्रधानमंत्री

यूपीए सरकार के दस साल पूरे होने वाले हैं. इन दस सालों में क्या हुआ? हम विकास की राह पर

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सूचना अधिकार : बीपीएल चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता कैसे आएगी?

इस अंक में हम एक ऐसी समस्या पर बात कर रहे हैं, जो सीधे-सीधे ग़रीबों के अधिकारों और विकास से

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ग़रीबो को उनका हक़ कैसे मिलेगा?

जिस देश की अधिकांश आबादी ग़रीब हो, वहां यह ज़रूरी हो जाता है कि ग़रीबों से जु़डी योजनाओं को ईमानदारी

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मनरेगा : ग्रामीण आजीविका के नाम पर सजाधजा झुनझुना! – ऊंचा शोर खुलेआम फ़र्ज़ीवाड़ा?

मनरेगा के नाम पर कहीं खुलेआम फ़र्ज़ीवाड़ा चल रहा है, तो कहीं डेढ़ सौ से अधिक बने शौचालय छह महीने

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बिहार: एसी-डीसी बिल : सीबीआई जांच की तलवार

पटना उच्च न्यायालय के बाद बिहार में एसी-डीसी बिल में 67 हज़ार करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितता का मामला अब देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में गूंज रहा है. आम भाषा में समझें तो यह मामला खर्च के लिए सरकारी खज़ाने से निकाली गई राशि का हिसाब न देने का है. इसे लेकर सरकार पर घोटाले का शक किया जा रहा है.

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मनरेगा : सरकारी धन की बंदरबाट

नक्सलवाद, भौगोलिक स्थिति और पिछड़ापन आदि वे कारण हैं, जो विंध्याचल मंडल को प्रदेश के विकसित हिस्सों से अलग करते हैं. मंडल के तीन ज़िलों में से एक भदोही को विकसित कहा जा सकता है, किंतु कालीन उद्योग में आई मंदी ने जनपद की अर्थव्यवस्था को काफी प्रभावित किया.

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मनरेगा पर सियासत

देश में आज भ्रष्टाचार सबसे ब़डा मुद्दा बना हुआ है, मगर अ़फसोस की बात यह है कि सियासी पार्टियां जनहित के बजाय पार्टी हित के लिए इसका इस्तेमाल कर रही हैं. कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी द्वारा उत्तर प्रदेश में केंद्रीय योजनाओं को लागू करने में कोताही बरतने का आरोप लगाते ही इस पर सियासी रंग च़ढना शुरू हो गया है.

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आरटीआई, मनरेगा और जॉब कार्ड

ग्रामीण क्षेत्र में रोज़गार पैदा करने के लिए सरकार ने अपनी महत्वाकांक्षी योजना मनरेगा को सफल बनाने के लिए हज़ारों करो़ड रुपये खर्च करने की योजना बनाई. यह योजना गांवों तक पहुंची भी, लेकिन हर योजना की तरह मनरेगा भी भ्रष्टाचार का शिकार हो गई.

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पानी कब बनेगा चुनावी मुद्दा?

देश भर में रोज़गार मुहैया कराने वाली अति महत्वाकांक्षी परियोजना मनरेगा की सफलता प्रचार माध्यमों द्वारा गाए जाने के बावजूद गांवों से पलायन थमा नहीं है. पेयजल मिशन का यशोगान इस चुनावी माहौल में पवित्र ॠचाओं से कम सात्विक नहीं लगा, मगर इस साल भी गांव-शहर पानी की कमी से आतंकित ज़रूर रहे.

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मनरेगा का काला सच

बीते तीन सालों से तमाम आशंकाओं और अटकलों के बीच देश में ठीक-ठाक बारिश होती रही है. औसत बारिश का 78 प्रतिशत, जैसा कि विशेषज्ञ बताते हैं. दैनिक ज़रूरतों और दूसरे कामों के लिए हमें जितना पानी चाहिए, उससे दोगुनी मात्रा में पानी बरस कर जल- संकायों एवं धरती के गर्भ में जमा हो रहा है.

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मनरेगा का हिसाब-किताब

नरेगा अब मनरेगा ज़रूर हो गई, लेकिन भ्रष्टाचार अभी भी ख़त्म नहीं हुआ. इस योजना के तहत देश के करोड़ों लोगों को रोज़गार दिया जा रहा है. गांव के ग़रीबों-मजदूरों के लिए यह योजना एक तरह संजीवनी का काम कर रही है. सरकार हर साल लगभग 40 हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च कर रही है, लेकिन देश के कमोबेश सभी हिस्सों से यह ख़बर आती रहती है कि कहीं फर्जी मस्टररोल बना दिया गया तो कहीं मृत आदमी के नाम पर सरपंच-ठेकेदारों ने पैसा उठा लिया. साल में 100 दिनों की जगह कभी-कभी स़िर्फ 70-80 दिन ही काम दिया जाता है.

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रोजगार की तलाश में पलायन जारी

ग्रामीणों को 100 दिन रोज़गार उपलब्ध कराने के दावों और वादों के साथ चलाई जा रही महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना को लागू हुए चार वर्ष हो गए हैं, किंतु पलायन रुकने का नाम नहीं ले रहा है. ग्रामीणों को रोज़गार उपलब्ध कराने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की ओर से पैसा तो मिल रहा है, बावजूद इसके छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों से रोज़गार की तलाश में लोगों का पलायन जारी है.

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पूर्ण स्वच्छता अभियान और मनरेगा

मनरेगा की उपयोगिता और इसके उद्देश्यों को लेकर कोई संदेह नहीं. यह भी सच्चाई है कि इसमें ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने की संभावनाएं मौजूद हैं, लेकिन अब तक का अनुभव यही बताता है कि इसके क्रियान्वयन में सुधार की ज़रूरत है. यदि इसे पूर्ण स्वच्छता अभियान जैसी व्यक्तिगत लाभ योजनाओं से जोड़ दिया जाए तो दोनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है.

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मनरेगा : का़फी गुंजाइश है सुधार की

मनरेगा के तहत काम के दौरान मज़दूरों को मिलने वाली सुविधाएं संदेह के घेरे में हैं. योजना में इन सुविधाओं से संबंधित स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए गए हैं, लेकिन इनका कहां तक पालन किया जाता है, यह संदेहास्पद है. योजना के अंतर्गत कराए जा रहे कार्यस्थलों पर न तो प्राथमिक चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध होती और न ही पीने का साफ पानी.

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मनरेगा : अधिकारियों की ज़िम्मेदारी तय हो

मनरेगा का उद्देश्य केवल ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार के अवसर उपलब्ध कराकर गांवों से शहरों की ओर हो रहे पलायन पर रोक लगाना ही नहीं है, बल्कि दूरदराज के क्षेत्रों में परिसंपत्ति का निर्माण करना भी है. इस नज़रिये से देखें तो सरकार को बाज़ार के अनुरूप न्यूनतम मज़दूरी में लगातार बदलाव करना होगा. इससे ग्रामीण मज़दूर शहरों में उपलब्ध ज़्यादा मज़दूरी वाले रोज़गार के अवसरों की ओर कम आकर्षित होंगे. यदि ऐसा नहीं होता है तो लोग गांव में रहकर मनरेगा के लिए काम करने को तैयार नहीं होंगे और ग्रामीण क्षेत्रों में आधारभूत संरचना के निर्माण एवं विकास की हमारी हसरत भी धरी की धरी रह जाएगी.

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सहरसा में चल रही है लूट की योजना

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना यानि मनरेगा की तस्वीर सहरसा, सुपौल व मधेपुरा जिलों में काफी धुंधली नजर आ रही है. पलायन रोककर स्थायी परिसंपत्ति निर्माण कराए जाने की सरकार की गरीब हितकारी योजना मनरेगा को इसमें जारी लूट-खसोट ने पूरी तरह विकृत कर रख दिया है.

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मनरेगा : अनुभव से सीखने की ज़रूरत

महात्मा गांधी नेशनल रूरल इंप्लायमेंट गारंटी प्रोग्राम (मनरेगा) की शुरुआत हुए चार साल से ज़्यादा व़क्त बीत चुका है और अब यह देश के हर ज़िले में लागू है. अपनी सफलता से तमाम तरह की उम्मीदें पैदा करने वाले मनरेगा को सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी एवं आकर्षक योजनाओं में गिना जा रहा है.

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मनरेगा, जो मन में आए करो!

उत्तर प्रदेश में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोज़गार योजना (मनरेगा) ग़रीबों के लिए केंद्र सरकार की खास योजना है. लेकिन अधिकारियों ने इसे अपनी तरह से चलाने की मनमानी शुरू कर दी है. इस समय प्रदेश के अधिकारियों और कर्मचारियों के मन में जो आ रहा है वही, इस योजना के लिए भेजे गए फंड के साथ किया जा रहा है.

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सार–संक्षेप : दो अभ्यारण्य संकट में

सतना ज़िले में बनने वाले दो अभ्यारण्य इन दिनों सरकारी दस्तावेजों के मध्य कहीं गुम हो गए हैं. वन्य प्राणियों को सुरक्षित करने के नाम पर इन अभ्यारण्यों का निर्माण मार्कन्डे और सर्भंग ऋषि के नाम पर किया गया था.

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मनरेगा मुर्दों ने की मजदूरी

प्रदेश में भ्रष्टाचार के नित नए कीर्तिमान कायम किए जा रहे हैं. महात्मा गांधी के नाम वाली राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना तो सरकारी अमले के लिए अवैध कमाई की गंगा बन चुकी है. आए दिन कोई न कोई ऐसा उदाहरण सुनने या देखनों को मिल ही जाता है जब इस योजना का दुरूपयोग होता रहता है.

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मनरेगा रोजगार नहीं, धोखा है

मध्य प्रदेश में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना को लेकर सरकार भले ही बड़े-बड़े दावे करती हो, लेकिन हक़ीक़त यही है कि राज्य में कहीं भी ग्रामीण श्रमिकों को औसतन 60 दिन का काम भी नहीं मिल रहा है. जबकि क़ानूनी तौर पर श्रमिकों को कम से कम 100 दिन का रोज़गार मिलना चाहिए.

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