चम्पारण में गांधी जी की 16 फीट की प्रतिमा का अनावरण… लेकिन गांधी के सिद्धांत किसे याद हैं

चम्पारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष समारोह और महात्मा गांधी के 150वीं जयंती को लेकर 10 अप्रैल 2017 से ही चम्पारण गांधीमय

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गांधी-नेहरू को ‘कचरा’ कह बुरे फंसे बीजेपी सांसद

रविवार को असम के बीजेपी सांसद कामाख्या प्रसाद तासा अपने बातों की वजह से विवादों में फंस गए हैं. प्रसाद

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सार्वजनिक की जाएंगी बापू की शहादत से जुड़ी जानकारियां, सीआईसी ने दिया आदेश

नई दिल्ली : केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने महात्मा गांधी की हत्या से संबंधित सभी जानकारियों को सार्वजनिक करने का

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गांधी को पुनर्जीवित करने वाला नहीं रहा

भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 1948 में दुनिया को अलविदा कह दिया था. पश्‍चिम में बहुत कम ही लोग

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गांधी को नहीं जानती हैं अरुंधति राय

बुकर पुरस्कार से सम्मानित मशहूर लेखिका अरुंधति राय ने पिछले दिनों केरल विश्‍वविद्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि

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जननायक को समझने की कोशिश

पत्रिका परिषद साक्ष्य का यह नया अंक है. बिहार विधान परिषद की यह अनियतकालीन वैचारिक-साहित्यिक पत्रिका तक़रीबन पंद्रह वर्षों से

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सच्चर रिपोर्ट : राजनीतिक हाशिये पर मुसलमान

भारत में मुसलमानों के पिछड़ेपन का कारण उनका राजनीतिक सशक्तिकरण न होना है. अगर वे राजनीतिक रूप से सशक्त होंगे

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जब तोप मुकाबिल हो : सत्ता के गलियारों से निकलता भ्रष्टाचार

वे फाइलें, जिनका सीधा रिश्ता कोल ब्लॉक के आबंटन से है और जिन पर कोयला मंत्री के रूप में प्रधानमंत्री

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सूक्तियों की कसौटी पर प्रेमचंद

हर साहित्यकार का मूल्यांकन तत्कालीन परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए, लेकिन कुछ अति उत्साही आलोचक आज की सामाजिक

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ज़िंदगी से प्यार करती हूँ-जीना चाहती हूँ

अगर आप आयरन लेडी इरोम शर्मिला को देखकर नहीं पिघलते और आपको शर्म नहीं आती, तो फिर आपको आत्म-निरीक्षण की

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मदर इंडिया की जीवनी

भारतीय राजनेताओं में महात्मा गांधी के बाद इंदिरा गांधी लेखकों एवं राजनीतिक टिप्पणीकारों की पसंद हैं. उन पर प्रचुर मात्रा में लिखा गया और अब भी लिखा जा रहा है. महात्मा गांधी अपने विचारों को लेकर लेखकों को चुनौती देते हैं, वहीं इंदिरा गांधी अपनी राजनीति, अपने निर्णयों और उसके पीछे की वजहों से लेखकों के लिए अब भी चुनौती बनी हुई हैं.

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बापू की वस्तुओं की नीलामी पर तीखी प्रतिक्रियाः कांग्रेस गांधी की गुनहगार है

मोहनदास करम चंद गांधी यानी महात्मा गांधी के निधन को 65 वर्षों से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन आज भी वह पूरी दुनिया के लिए उतने ही प्रासंगिक नज़र आते हैं, जितने वह जीते जी हुआ करते थे. गांधी जी की समकालीन कई महान हस्तियां इतिहास के पन्नों तक सिमट कर रह गई हैं, लेकिन गांधी दर्शन आज भी जीने की कला बना हुआ है. कुछ मामलों में तो लगता है कि आज उनकी प्रासंगिकता ज़्यादा बढ़ गई है.

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पूर्वी चंपारणः महात्‍मा गांधी केंद्रीय विश्‍वविद्यालय, जनसंघर्ष और नेतागिरी

संघर्ष ज़मीन तैयार करता है और फिर उसी ज़मीन पर नेता अपनी राजनीतिक फसल उगाते हैं. कुछ ऐसा ही हो रहा है मोतिहारी में महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए बने संघर्ष मोर्चा के साथ. चंपारण की जनता केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए दिन-रात एक करके संघर्ष करती है और जब दिल्ली आती है अपनी बात केंद्र तक पहुंचाने, तो वहां मंच पर मिलते हैं बिहार के वे सारे सांसद, जो संसद में तो इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोलते, लेकिन जनता के बीच भाषणबाज़ी का मौक़ा भी नहीं छोड़ते.

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इस बार सरकार ने गांधी को मारा

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के खून से सनी घास एवं मिट्टी, उनका चश्मा और चरखा सहित उनसे जुड़ी 29 चीज़ें ब्रिटेन में नीलाम हो गईं और इस देश का दुर्भाग्य देखिए, सरकार ने इस बारे में कुछ नहीं किया. इतना ही नहीं, इसके बारे में न तो सरकार ने किसी को बताया और न देश के मीडिया ने यह जानने की कोशिश की कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की धरोहर खरीदने वाला व्यक्ति कौन है,

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पुराने तथ्य, नई किताब

कुछ दिनों पहले ही हिंदी-अंग्रेजी में एक साथ प्रकाशित वेबसाइट फेस एंड फैक्ट्स के प्रबंध संपादक जयप्रकाश पांडे का बेहद गुस्से में फोन आया. उन्होंने बताया कि न्यूयॉर्क टाइम्स के पूर्व कार्यकारी संपादक जोसेफ लेलीवेल्ड ने महात्मा गांधी का अपमान करते हुए एक किताब लिखी है-ग्रेट सोल: महात्मा गांधी एंड हिज स्ट्रगल विद इंडिया.

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अन्‍ना हजारे न महात्‍मा गांधी हैं और न लोकनायक जय प्रकाश नारायणः अन्ना को अन्ना ही रहने दो

अन्ना के आंदोलन के दौरान युवाओं को यह कहते पाया गया कि उन्होंने न तो जेपी को देखा और न ही गांधी को देखा, उनके लिए अन्ना हजारे ही गांधी और जय प्रकाश नारायण हैं. इसमें कोई शक़ नहीं है कि अन्ना हजारे ने शहरी युवाओं को जगाया है. आज के संदर्भ में यह एक अनोखी उपलब्धि है.

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कांग्रेस के 125 साल

महात्मा गांधी को यह उम्मीद थी कि वह 125 सालों तक जिएंगे. काश कि ऐसा हो पाता. गांधी जी तो 1948 में ही काल कवलित हो गए, लेकिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, जिसकी सेवा में उन्होंने अपनी ज़िंदगी के आख़िरी तीस साल बिता दिए, आज अपनी उम्र के 125वें पड़ाव पर ज़रूर पहुंच चुकी है.

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