जूनियर विश्व कप हॉकी में भारत से उम्मीदें

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आठ दिसम्बर से शुरू हुई जूनियर विश्व कप हॉकी प्रतियोगिता में भारतीय हॉकी टीम

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ट्यूनिशिया : क्या गठबंधन सरकार को कोई ख़तरा है? : ट्यूनिशिया को मिस्र न समझा जाए

मिस्र में मुर्सी के विरुद्ध जो शक्तियां काम कर रही थीं, कुछ हद तक वही विदेशी शक्तियां ट्यूनिशिया में भी

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गृहयुद्ध की कगार पर मिस्र : राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना ज़रूरी

हालात साफ़ इशारा कर रहे हैं कि मिस्र में कभी भी गृहयुद्ध छिड़ सकता है. राष्ट्रपति मुर्सी को अपदस्थ किए

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तकसीम चौक प्रदर्शन : तुर्की को कमज़ोर करने का षड्यंत्र

तकसीम चौक का विरोध प्रदर्शन पश्‍चिमी मीडिया की नज़र में भले ही मिस्र, लीबिया एवं ट्यूनीशिया की क्रांति जैसा रहा

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हज़ारों साल पुराना मक़बरा

मिस्र में पुरातत्वविदों ने चार हज़ार साल पुराने एक मक़बरे का पता लगाया है. इसमें पत्थर की एक पट्टिका पाई गई है, जिस पर अंतिम संस्कार से संबंधित प्राचीन आख्यान खुदे हुए हैं. मिस्र के पुरातत्व मंत्री मुहम्मद इब्राहिम ने कहा है, कई वर्षों के दौरान पहली बार ऐसा हुआ है जब इस तरह के एक संरक्षित मक़बरे को खोजा गया है.

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सीरिया : बशर वास्तविकता को स्वीकार करें

सीरिया में मार्च 2011 से राष्ट्रपति बशर अल असद के विरुद्ध आंदोलन चल रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार, सरकार विरोधी विद्रोह को दबाने के लिए की गई कार्रवाई में अब तक पांच हज़ार लोग मारे जा चुके हैं. हालांकि सीरिया इस आंकड़े को ग़लत बताता है, लेकिन दो हज़ार लोगों के मरने की पुष्टि तो वह भी कर रहा है.

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मिस्र : मार्शल तांतवी का तांडव

कहा जाता है कि क्रांति अपने पुत्रों को निगल जाती है. क्या मिस्र में कुछ ऐसा ही होने वाला है? जिन लोगों ने देश में लोकतंत्र की बहाली के लिए अपना क़ीमती समय ख़र्च किया, संसाधन लगाए और होस्नी मुबारक को इस्ती़फा देने के लिए मजबूर किया, आज उन्हीं के साथ फिर से अन्याय किया जा रहा है.

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मिस्रः यह संकुचित लोकतंत्र है

मिस्र में संसदीय चुनाव शुरू हो गए हैं. तीन चरणों में होने वाले ये चुनाव जनवरी तक चलेंगे. प्रथम चरण के चुनाव संपन्न हो चुके हैं और उनके नतीजे भी आ चुके हैं. जो नतीजे सामने आए हैं, उन पर कई प्रश्न उठाए जा सकते हैं.

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मिस्र की दूसरी क्रांति

हम लोगों ने इसलिए संघर्ष नहीं किया था कि एक तानाशाह को सत्ता से हटाकर दूसरे तानाशाह के लिए ज़मीन तैयार करें. हमें लोकतंत्र चाहिए, सैनिक हस्तक्षेप से चलने वाला शासन नहीं. ऐसी ही आवाज़ें उठ रही हैं मिस्र की राजधानी क़ाहिरा के उस तहरीर चौक से, जहां हज़ारों लोग एक बार फिर से सेना के सत्ता पर क़ाबिज़ होने की मंशा को चकनाचूर करने के लिए एकत्रित हुए हैं.

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क्रांति की राह पर यमन

लीबिया, ट्यूनीशिया और मिस्र में सत्ता के विरुद्ध जनता का आंदोलन सफल रहा. तीनों देशों के तानाशाहों को पराजित होना पड़ा, लेकिन आंदोलन अभी थमा नहीं है. अगली बारी यमन की है. यमन में भी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष हो रहा है. राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह को सत्ता से बेदखल करने के लिए खूनी जंग चल रही है. सऊदी अरब से इलाज कराकर अब्दुल्ला सालेह की वापसी के बाद हिंसा-प्रतिहिंसा का दौर फिर शुरू हो गया है.

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गद्दाफी और लीबिया का भविष्य

अफ्रीका में परिवर्तन की बयार बह रही है. सूडान में गृह युद्ध का अंत उसके विभाजन के साथ हुआ. मिस्र और ट्यूनीशिया में सत्ता के विरुद्ध आंदोलन हुए और सफल भी हुए. इसके साथ ही फरवरी 2011 के मध्य में एक महिला सामाजिक कार्यकर्ता की गिरफ़्तारी के बाद लीबिया में सरकार का विरोध शुरू हुआ

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सेना मुग्ध, जनता क्षुब्ध

पहले ट्यूनीशिया, फिर मिस्र के बाद लीबिया में मोअम्मर गद्दा़फी के तानाशाही शासन के विरुद्ध जन विद्रोह भड़का तो लगा कि अब गद्दा़फी का हश्र भी ट्यूनीशिया और मिस्र के शासकों की तरह होगा, लेकिन यहां की कहानी लगातार बदलती जा रही है.

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अरब देशों में परिवर्तन का दौर

मिस्र और ट्यूनीशिया का हालिया घटनाक्रम सुखद आश्चर्य के रूप में सामने आया. शायद ही किसी को यह उम्मीद रही होगी कि इन देशों में अचानक जनाक्रोश का विस्फोट हो जाएगा, परंतु ज़मीनी हक़ीक़त जानने-समझने वाले लोगों के लिए इन दो देशों में हुई जनक्रांति अनापेक्षित नहीं थी.

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जनता जाग चुकी हैः गलती स्‍वीकारने का नहीं, सुधारने का वक्‍त

बीती 16 फरवरी को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कुछ न्यूज़ चैनलों के संपादकों से मिले, बाक़ायदा एक प्रेस कांफ्रेंस के ज़रिए. बहुत सी बातें हुईं. पहले प्रधानमंत्री के कुछ चुनिंदा बयानों पर ऩजर दौड़ाएं.

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मिस्र का सत्‍ता परिवर्तनः तानाशाही नहीं चलेगी

मिस्र के इतिहास में 11 फरवरी, 2011 का दिन उस समय दर्ज हो गया, जब देश की सत्ता पर 30 वर्षों तक क़ाबिज रहने वाले 82 वर्षीय राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को भारी जनाक्रोश के चलते राजधानी काहिरा स्थित अपना आलीशान महल अर्थात राष्ट्रपति भवन छोड़कर शर्म-अल-शेख़ भागना पड़ा. तमाम अन्य देशों के स्वार्थी, क्रूर एवं सत्तालोभी तानाशाहों की तरह मिस्र में भी राष्ट्रपति होस्नी मुबारक ने अपनी प्रशासनिक पकड़ बेहद मज़बूत कर रखी थी.

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मिस्र से सबक ले सरकार

आम आदमी का आक्रोश धीरे-धीरे बढ़ रहा है. महंगाई, घोटाले और भ्रष्टाचार इस आक्रोश को हवा दे रहे हैं. इन समस्याओं की असल वजह और इस मसले पर राजनीतिक दलों से लेकर आम आदमी और मीडिया की भूमिका को देखना-समझना होगा.

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लोकतंत्र की इस लड़ाई में भारत कहां है

अमेरिका किसी भी हाल में नहीं जीत सकता. यदि वह किसी देश के आंतरिक मामलों में दखल देता है तो उसकी निंदा होती है. लेकिन यदि, जैसा कि मिस्र में हो रहा है, अमेरिका ने जल्द ही हस्तक्षेप नहीं किया तो होस्नी मुबारक जैसे एक अलोकप्रिय तानाशाह को हटाना मुश्किल हो जाएगा.

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पश्चिम एशिया में क्रांतिः लोकतंत्र के लिए मुसलमान

जब भी किसी देश में लोग सड़कों पर बेरोज़गारी, महंगाई, ग़रीबी या किसी अन्य मांग को लेकर सरकार के खिला़फ लामबंद होते हैं तो उसे आंदोलन कहा जाता है. लेकिन जब कोई आंदोलन विद्रोह का रूप ले लेता है, जब किसी आंदोलन का मक़सद सत्ता परिवर्तन होता है तो उसे क्रांति कहते हैं.

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संसद के समक्ष चुनौतियां

जनता महंगाई की मार से त्रस्त है. अशिक्षा और बेरोज़गारी ने जीवन दु:खद बना दिया है. ग़रीबी एक अभिशाप बनकर रह गई है. बच्चों के लिए शिक्षा तो एक सपना भर है, क्योंकि पेट भरने को भोजन ही नहीं है.

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सदियों पुरानी ममियों की खोज

मिस्र के पुरातत्वविदों ने राजधानी काहिरा से तीन सौ किलोमीटर दूर रेगिस्तान में एक नक्काशीदार प्लास्टर में 14 ताबूत खोज निकाले हैं. इनमें से एक ताबूत महिला का है. खुदाई का नेतृत्व करने वाले महमूद अफीफी का कहना है कि यह बहरिया ओएसिस में पाई गई रोमन शैली की पहली ममी है.

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मोसाद का ख़ौ़फनाक क़हर

पूरी दुनिया के चप्पे-चप्पे में मौजूद मोसाद को इसके लिए भी ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा. आख़िरकार, उसके शातिर और क़ाबिल ख़ुफ़िया एजेंटों ने उनका पता लगा ही लिया. जिसकी तलाश में मोसाद मोरक्को भटक रहा था, ब्लैक सेप्टेंबर का वह ख़तरनाक सदस्य अली हसन सालमेह बेरूत में मौजूद था. एक बार फिर मोसाद ने उसे घेरने का पूरा प्लान तैयार कर लिया और साथ में मौक़े पर ही उसे ख़त्म करने का पूरा साज़ो-सामान भी. अपने इस गुप्त मिशन को मोसाद ने कुछ इस तरह अंजाम दिया कि ख़ुद अली हसन को भी पता नहीं चल पाया कि जिस गाड़ी में वह सवार है, वह गाड़ी नहीं बल्कि चलता-फिरता मौत का सामान है.

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