बिहार में पंचायती राज नहीं, मुखियाराज है

एक समय सरपंच ग्राम पंचायत का सबसे महत्वपूर्ण पद माना जाता था, लेकिन बिहार में इस पद की अहमियत कम होने लगी है. लगभग ढाई दशक बाद बिहार में वर्ष 2001 में पंचायत के चुनाव हुए तो लोगों को लगा कि ग्राम स्वराज का जो सपना महात्मा गांधी और लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने देखा था, वह साकार होने वाला है.

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भाजपा और विपक्ष दोनों ठेंगे पर

बिहार में इन दिनों सरकार व इसके मुखिया नीतीश कुमार के क्रियाकलापों से भाजपा व पूरा विपक्ष हाशिए पर आ गया है. विधानसभा सत्र के दौरान विधेयकों को पास कराने में विपक्ष की अनदेखी से नेता प्रतिपक्ष अब्दुल बारी सिद्दीक़ी का़फी आहत हैं. बात जब हद से बाहर हो गई तो राज्यपाल से मिलकर सरकार के अलोकतांत्रिक आचरण एवं निरंकुश व्यवहार पर कार्रवाई की गुहार लगाई गई.

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लिट्टी-चोखा और मुर्गा-दारू का दौर शुरू

अक्सर ज़िले में होने वाले त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर सरगर्मी बढ़ती जा रही है. विभिन्न पदों के दावेदार अपनी रणनीति को अंजाम देने के लिए कई तरह के हथकंडे भी आज़मा रहे हैं. बेशक़ इस बार चुनाव में प्रत्याशियों की भारी भीड़ होगी, क्योकि पंचायत में होने वाली अकूत कमाई ने दर्जनों लोगों को चुनाव लड़ने की भूख जगाई है.

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प्‍यार की सजा हुक्‍का-पानी बंद

एक प्रेमी युगल ने शादी क्या कर ली. गांव वाले उसके जान के दुश्मन बन गए. उसके परिजनों को गांव वालों ने जीना मुहाल कर दिया है. उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया है. उसके परिवार से गांव का कोई भी व्यक्ति नहीं बोलता है. आ़खिर उस प्रेमी युगल का क़सूर क्या है. स़िर्फ यही न कि उसने प्यार किया और उससे शादी कर ली है, तो क्या प्यार करने की उसे सजा मिली है.

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दागदार दामन को निशंक दबंगई से धोना चाहते हैं

उत्तराखंड राज्य के मुखिया डा. रमेश पोखरियाल निशंक पर जिस तरह एक के बाद एक भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे है, उससे इस बात की आशंका ब़ढ जाती है कि सूबे के मुखिया का दामन बेदाग़ नहीं है. यह बात दीगर है कि रंगमंच एवं पत्रकारिता की उपज निशंक अपने दामन पर लगे दाग़ को अपनी दबंगयी से लोकतांत्रिक रास्ते से हट कर धोने का लगातार प्रयास कर रहे है.

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दिल्‍ली का बाबू: कुर्सी के लिए मारामारी

राष्ट्रीय राजमार्ग विकास प्राधिकरण (एनएचएआई) शायद आजकल देश के सबसे व्यस्त सरकारी संगठनों में से एक है. इसकी वजह केवल देश भर में चल रहे राजमार्ग निर्माण और विकास कार्य ही नहीं हैं.

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श्रमदान से बंजर भूमि में आई बहार

मगध प्रमंडल के गया ज़िले के अतरी प्रखंड में नरावट पंचायत के साठ दलित परिवारों ने दृढ़ इच्छाशक्ति, सामूहिकता एवं एकता की जो मिसाल क़ायम की है, वह समाज के सभी वर्गों के लिए प्रेरणाप्रद है. मुरली पहाड़ी की तलहटी में बसा है नरावट पंचायत का टोला वनवासी नगर.

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