जानिए क्यों मुलायम ने लोहिया ट्रस्ट से अखिलेश समर्थकों को निकाला

दीनबंधु कबीर : इस्तीफा देने वालों में शामिल डॉ. अशोक वाजपेयी मुलायम के पुराने वफादार साथियों में रहे हैं. मुलायम

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आय से अधिक सम्पत्ति का प्रेत जया के बाद माया पर छाया

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता की आय से अधिक संपत्ति उनके लिए विपत्ति का कारण बनी और उन्हें जेल जाना पड़ा.

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फिर मिले मुलायम और अमर सिंह साफ़ हो रहा है वापसी का रास्ता

राजनीतिक ताप समझें, तो यह स्पष्ट हो रहा है कि अमर सिंह के समाजवादी पार्टी में शरीक होने का रास्ता

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जब तोप मुक़ाबिल हो : अब पार्टी उम्मीदवार नहीं, जन उम्मीदवार

लोकसभा चुनावों के बाद की स्थिति की बात करें, तो कांग्रेस का नेता कौन होगा, यह तय है. राहुल गांधी

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उत्तर प्रदेश :मुस्लिम वोटों के लिए कांगे्रस की कसरत

उत्तर प्रदेश में मुसलमानों को लेकर राजनीति तेज हो गई है. कांग्रेस जहां केंद्र सरकार की अल्पसंख्यक कल्याण से संबंधित

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मुसलमानों को खुश करने में व्यस्त हैं सभी पार्टियां …लेकिन किधर जाएंगे मुसलमान

राजनीति और अंकगणित में एक बुनियादी फ़र्क है. अंकगणित में दो और दो का जोड़ हर हाल में चार ही

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जब तोप मुकाबिल हो : प्रार्थना कीजिए, सब कुछ अच्छा हो

कांग्रेस सबसे अच्छी स्थिति में है. भारतीय जनता पार्टी की अंतर्कलह ने उसे नया जीवनदान दे दिया है. महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी एवं

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महिला आरक्षण बिल : पुरुष सांसदों को आपत्ति क्यों ?

पिछले साल दिल्ली में सामूहिक बलात्कार के हादसे के बाद देश में महिला सशक्तिकरण की आवाज़ फिर से बुलंद होने

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शब्दबाण से मुलायम आहत : कांग्रेस के गले की हड्डी बने बेनी

अपने बड़बोलेपन के चलते केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा एक बार फिर सुर्खियों में हैं. इस बार उनके निशाने पर

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अखिलेश सरकार का एक साल – कामयाबी पर भारी नाकामी

एक साल पहले जब सपा के युवा नेता अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बड़े सूबे की

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तीसरा मोर्चा संभावनाएं और चुनौतियां

लोकसभा में एफडीआई के मुद्दे पर दो दलों ने जो किया, वह भविष्य की संभावित राजनीति का महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है. शायद पहली बार मुलायम सिंह और मायावती किसी मुद्दे पर एक सी समझ रखते हुए, एक तरह का एक्शन करते दिखाई दिए. यह मानना चाहिए कि अब यह कल्पना असंभव नहीं है कि चाहे उत्तर प्रदेश का चार साल के बाद होने वाला विधानसभा का चुनाव हो या फिर देश की लोकसभा का आने वाला चुनाव, ये दोनों साथ मिलकर भी चुनाव लड़ सकते हैं.

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अन्ना और रामदेव की वजह से आशाएं जगी हैं

अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसे लोगों को सावधान हो जाना चाहिए. इतने दिनों के बाद भी उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा है कि कौन-सा सवाल उठाना चाहिए और कौन-सा नहीं. एक वक़्त आता है, जिसे अंग्रेजी में सेचुरेशन प्वाइंट कहते हैं. शायद जो नहीं होना चाहिए, वह हो रहा है, यानी लोकतंत्र सेचुरेशन प्वाइंट की तऱफ ब़ढ रहा है.

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सियासी दलों के मुस्लिम चेहरे

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र जहां मुलायम सिंह ने मुसलमानों की रहनुमाई का किरदार निभाने के लिए आज़म खां को आगे कर रखा है. खरी बात कहने वाले आज़म खां फायर ब्रांड मुस्लिम नेता हैं. मुलायम के साथ अधिकतर जनसभाओं में मंच पर एक साथ संगत करते हुए देखे जाते हैं.

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मुलायम सिंह का परिवार : अखिलेश-शिवपाल में ठनी रार

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का यह नया चेहरा है, जहां नीतियों पर अलगाव है, टकराहट है, सत्ता हथियाने की लालसा है और पार्टी में वर्चस्व को लेकर अंदर ही अंदर सुलग रहा गुस्सा है. यह अखिलेश यादव का समाजवाद है, जो उनके पिता मुलायम सिंह यादव के समाजवाद से बिल्कुल उलट है.

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उत्तर प्रदेश की जनता को हस्तक्षेप करना चाहिए

अखिलेश यादव के एक बयान ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल पैदा कर दी. अखिलेश समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हैं और मुलायम सिंह यादव के पुत्र. डी पी यादव को पार्टी में न लेने की घोषणा ने उनकी पार्टी में भी मतभेद पैदा किए और उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा को कॉर्नर पर खड़ा कर दिया. आम तौर पर माना जाता है कि अगर यह फैसला मुलायम सिंह को लेना होता तो वह संभवत: डी पी यादव को पार्टी में लेने के लिए हरी झंडी दे देते, लेकिन अखिलेश यादव ने निजी तौर पर यह फैसला लिया और यह फैसला उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की राय के खिला़फ लिया.

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उत्तर प्रदेशः सपा अधिवेशन- न दिशा मिली न दशा संभली

आगरा में समाजवादी पार्टी का आठवां राष्ट्रीय अधिवेशन ऊहापोह और नसीहतों के बीच समाप्त हो गया. ताज नगरी के तारघर मैदान में बने लोहिया नगर में सपा नेताओं ने पहले दिन बसपा पर तो दूसरे दिन कांग्रेस पर निशाना साधा. कई मुद्दों पर भटकाव सा़फ दिखाई दिया. शुरू से लेकर अंत तक पार्टी तय नहीं कर पाई कि उसका दुश्मन नंबर वन कौन है?

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उत्तर प्रदेश का चुनाव कई पार्टियों का भविष्य तय करेगा

अगला घमासान उत्तर प्रदेश में होने वाला है. मुख्यमंत्री मायावती राजनीतिक तौर पर सबसे आगे हैं. मायावती ने अपनी पार्टी के ऐसे सदस्यों को, जिनके प्रति स्थानीय स्तर पर आक्रोश पैदा हुआ है, बदला है और ऐसे लोगों को साथ लेने की कोशिश की है, जो उन्हें वोट दिलवा सकें. मायावती सर्वजन की भाषा बोल रही हैं. उत्तर प्रदेश में राज करने की चाबी भी इसी भाषा में है.

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सांसद-विधायक निधि में फंसा विकास

बिहार में विधायक निधि खत्म कर नीतीश कुमार एक बार फिर चर्चा में हैं. उत्तर प्रदेश में भाकपा को छोड़कर अन्य किसी दल ने इसका समर्थन नहीं किया. बात जहां करोड़ों रुपए की आती है तो सारे दल एक साथ दिखाई देते हैं. इन दलों के सांसद विधायक इस बात का जवाब देने से भागते हैं कि वह जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली सरकारी निधि का कितना उपभोग करते हैं. इस निधि से किसे लाभान्वित किया जाता है. उत्तर प्रदेश में जन प्रतिनिधियों को मिलने वाली निधियां अपनों की तिजोरी भरने का साधनमात्र बनकर रह गई हैं. अधिकांश जनप्रतिनिधि तो इस निधि के धन को पूरी तरह से खर्च तक नहीं कर पाते हैं. उदाहरण के तौर पर मैनपुरी जनपद को देखते हैं, जहां से समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव सांसद हैं. मुलायम सिंह बड़े नेता हैं लेकिन सांसद निधि खर्च करने के मामले में वह भी कंजूस ही दिखाई देते हैं. विधायकों का भी कमोवेश यही हाल है

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