BOX OFFICE : बुरी तरह पिटी फन्ने खां, मुल्क और कारवां का रहा ये हाल

नई दिल्ली (प्रवीण कुमार) फन्ने खां – वैसे फिल्म फन्ने खां काफी अच्छे विषय पर बनाई गई फिल्म कही जा सकती

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रेमंड को माफी अवाम को मंजूर नहीं

अमेरिकी दूतावास कर्मी रेमंड डेविस की गोली से जब दो पाकिस्तानी नागरिक मारे गए थे तो कट्टरपंथियों ने यह कहते हुए चीखना-चिल्लाना शुरू कर दिया था कि यदि अमेरिका के दबाव में रेमंड की रिहाई हुई तो मुल्क में हुकूमत के विरुद्ध आग भड़क उठेगी, लेकिन रेमंड इस्लामी शरीयत के मुताबिक़ ब्लड मनी देकर रिहा हो गया.

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आज़ादी के 63 बरसों बाद भी बेगाने

हमारे मुल्क के नीति नियंता किस तरह ग़ैर ज़िम्मेदारी और बिना दूरअंदेशी से अपनी नीतियां बनाते हैं, इसका एहसास हमें अभी हाल में आए शत्रु संपत्ति संशोधन और विधिमान्यकरण विधेयक का हश्र देखकर होता है. हिंदुस्तानी मुसलमानों की ज़मीन-जायदाद से सीधे-सीधे जुड़े इस संवेदनशील विधेयक, जिस पर मुल्क भर में बहुत विचार-विमर्श की ज़रूरत थी, को गोया इस तरह पेश करने की तैयारी थी, मानो यह कोई मामूली विधेयक हो.

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अल्‍पसंख्‍यकों की हालत समझना जरूरी

संयुक्त राष्ट्र संघ में लगभग दो सौ सदस्य देश हैं, लेकिन इनमें शायद ही कोई मुल्क ऐसा हो, जिसकी पूरी आबादी एक ही मज़हब, भाषा, नस्ल या फिर संस्कृति की हो. यानी इन सभी मुल्कों में बहुसंख्यक आबादी के साथ-साथ अल्पसंख्यक आबादी भी है. ऐसे कुछ मामले हो सकते हैं कि एक राज्य में किसी एक समूह का बहुमत न हो, लेकिन एक अल्पसंख्यक समूह कई अन्य के साथ मिलकर पूरी आबादी का पचास फ़ीसदी से कम हो सकता है.

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