बड़ी कठिन है न्‍याय की डगर

सब मानते हैं कि देर से मिला इंसा़फ भी नाइंसा़फी के बराबर होता है. इसके बावजूद हमारे देश में म़ुकदमे कई पीढि़यों तक चलते हैं. हालत यह है कि लोग अपने दादा और परदादा के म़ुकदमे अब तक झेल रहे हैं. इंसान खत्म हो जाता है, लेकिन म़ुकदमा बरक़रार रहता है. इसकी वजह से बेगुनाह लोग अपनी ज़िंदगी जेल की सला़खों के पीछे गुज़ार देते हैं. कई बार पूरी ज़िंदगी क़ैद में बिताने या मौत के बाद फैसला आता है कि वह व्यक्ति बेक़सूर है.

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आरटीआई का इस्तेमाल ऐसे करें

हमारे पास पाठकों के ऐसे कई पत्र आए, जिनमें बताया गया कि आरटीआई के इस्तेमाल के बाद किस तरह उन्हें परेशान किया गया या झूठे मुक़दमे में फंसाकर उनका मानसिक और आर्थिक शोषण किया गया. यह एक गंभीर मामला है और आरटीआई क़ानून के अस्तित्व में आने के तुरंत बाद से ही इस तरह की घटनाएं सामने आती रही हैं.

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बेवल पंचायतः ईमानदारी की कीमत चुकाता एक सरपंच

संजय ब्रह्मचारी उर्फ संजय स्वामी की आंखों में एक सपना था. वह सपना था, गांधी जी के सपनों को साकार करने का. दिल्ली एवं मुंबई में हमारी सरकार, लेकिन हमारे गांव में हम ही सरकार यानी हमारा गांव हमारी सरकार. 13 सितंबर, 2010 की रात हरियाणा के महेंद्रगढ़ ज़िले की बेवल पंचायत में इस सपने को साकार करने की एक शुरुआत हुई थी, जब संजय स्वामी ने ग्रामसभा की खुली बैठक में सरपंच पद का प्रभार काफी मशक्कत के बाद संभाला था.

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सुप्रीम कोर्ट में बदलाव ज़रूरी है

इस विषय के बारे में लिखने में एक अलग रोमांच है, इसलिए मैं बहुत सी ऐसी बातें यहां लिख सकता हूं, जो कि मैं उच्चतम न्यायालय में जजों के सामने बहस करते समय नहीं बोल सकता. जब बात होती है कि भारतीय न्यायपालिका के साथ क्या परेशानियां हैं तो हमें जवाब में हां या न कहना पड़ता है, लेकिन मेरा जवाब हां भी है और न भी. मैं उच्चतम न्यायालय में वर्ष 1979 से हूं.

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हठयोगी समेत दर्जनों संतों के खिला़फ मुक़दमा

बाबा रामदेव और उनके स्वाभिमान ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने संतों के खिला़फ हरिद्वार कोतवाली में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता हठयोगी समेत बीस-पच्चीस लोगों के विरुद्ध आपराधिक मुकदमा दर्ज कराकर आग में घी डालने का काम कर दिया है.

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इंसाफ़ की आवाज़ कहीं से नहीं आती

पाकिस्तान में दो साल पहले स्वतंत्रता के ऐतिहासिक संघर्ष के बाद सस्ते और तात्कालिक न्याय के लिए बड़े-बड़े दावों के साथ वजूद में आने वाली स्वतंत्र न्यायपालिका से तात्कालिक न्याय की उम्मीद आज भी एक सपना ही है. न्यायपालिका की बहाली के बावजूद पाकिस्तानी अदालतों में लंबित पड़े मुक़दमों की संख्या 13 लाख से अधिक हो चुकी है.

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पुस्‍तक अंशः मुन्‍नी मोबाइल- 20

इस बीच एक प्रस्ताव आया. प्रस्ताव लाने वाले रेडियो में काम करने वाले उनके मित्र थे. बोले, तुम्हारी पत्नी तलाक चाहती है. तो इसमें समस्या क्या है? आनंद भारती बोले, तलाक का मुक़दमा तो कोर्ट में पेंडिंग है.

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पुस्‍तक अंशः मुन्‍नी मोबाइल- 19

नन्हीं सूफी रोज़-रोज़ की तकरार को अपनी आंख से गुज़रते देखती. आनंद का तेज़ गुस्सा देख वह सहमी सी रहती. एक बार कुछ ऐसी ख़ास घटना हो गई, जिससे दरार और बढ़ गई और शिवानी ने अपना सामान बांध मायके जाने का निश्चय कर लिया. आनंद भारती ने कभी किसी को मनाना सीखा ही नहीं था.

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