गुजरात में हो रहा ऐसा विकास कि मजदूर भाग रहे राज्य छोड़कर!

कई साल तक गुजरात के मुख्‍यमंत्री रहे पीएम मोदी ने अपने ही राज्‍य में विकास की ऐसी नींव रखी है

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उड़ीसा ने अन्‍ना हजारे को सिर-आंखों पर बैठाया : राजनीति को नए नेतृत्‍व की जरूरत है

अन्ना हजारे कार्यकर्ता सम्मेलन में शिरकत करने के लिए उड़ीसा दौरे पर गए. उनकी अगवानी करने के लिए बीजू पटनायक हवाई अड्डे पर हज़ारों लोग मौजूद थे, जो अन्ना हजारे जिंदाबाद, भ्रष्टाचार हटाओ और उड़ीसा को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के नारे लगा रहे थे. अन्ना ने कहा कि हमारा काम बहुत बड़ा है और किसी को भी खुद प्रसिद्धि पाने के लिए यह काम नहीं करना है.

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सरकार जवाब दे यह देश किसका है

हाल में देश में हुए बदलावों ने एक आधारभूत सवाल पूछने के लिए मजबूर कर दिया है. सवाल है कि आखिर यह देश किसका है? सरकार द्वारा देश के लिए बनाई गई आर्थिक नीतियां और राजनीतिक वातावरण समाज के किस वर्ग के लोगों के फायदे के लिए होनी चाहिए? लाजिमी जवाब होगा कि सरकार को हर वर्ग का ख्याल रखना चाहिए. आज भी देश के साठ प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं. मुख्य रूप से सरकारी और निजी क्षेत्र में काम कर रहा संगठित मज़दूर वर्ग भी महत्वपूर्ण है.

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श्रमिकों की जिंदगी से खिलवाड़

मध्य प्रदेश का कटनी ज़िला भारत के भौगोलिक केंद्र में स्थित होने के कारण बेशक़ीमती खनिज संपदा के प्रचुर भंडारण सहित जल संपदा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है. यही वजह है कि स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) द्वारा अपने इस्पात उद्योगों हेतु आवश्यक गुणवत्ता पूर्ण कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले चूना पत्थर (लाईम स्टोन) की खदानें यहां के ग्राम कुटेश्वर में स्थापित की गई थीं.

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दुष्टतापूर्ण नीति

भारत में तो एक तरह से यह स्थिति आ गई है कि शासन को भारतीय राष्ट्रीय मज़दूर संघ ही चला रहा है. कोई भी काम हो, अगर उसके अधिकारीगण कराना चाहेंगे तो फौरन हो जाएगा, चाहे वह काम क़ानूनन वैध हो अथवा अवैध. कोई मिल, फैक्ट्री या कारखाना कितने ही वर्षों से नुक़सान में चल रहा हो, मज़दूर आवश्यक संख्या से बहुत ज़्यादा हों, यहां तक कि धीरे-धीरे मिल की सारी पूंजी समाप्त हो जाए, पर इन श्रमिक संघों के कान पर जूं नहीं रेंगेगी.

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नवीनीकरण का विरोध

नई मशीनरी का परिणाम है कम मज़दूरों से अधिक काम करवा सकना. उससे मज़दूरों की ज़रूरत न रहने से कटौती या छंटनी होती है. जो लोग बेकार होते हैं, वे कभी भी नहीं चाहेंगे कि नई मशीनरी लगाई जाए. जो काम करते रहें, उन्हें अधिक वेतन दें तथा हमें निकाल बाहर करें. युक्तीकरण का सबसे बड़ा विरोध इसी बुनियाद पर हो रहा है. नवीनीकरण में सबसे बड़ी बाधा इन मज़दूरों की छंटनी है.

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वर्ग तंत्र और यथास्थितिवाद

पांचवीं योजना वर्ग विभाजन की है. राष्ट्र को या समाज को कई वर्गों में विभक्त मान लिया जाता है और प्राय: हर एक वर्ग की अलग-अलग आय निर्धारित होती है. मान लीजिए, एक वर्ग निम्न कोटि के काम करने वाले मज़दूरों, क़ुलियों, भारवाहकों का है, उन्हें औसतन 70 रुपये माहवार मिलता है. दूसरा वर्ग प्रोफेसर, डॉक्टर इत्यादि लोगों का है, जिन्हें क़रीब 1000 रुपये माहवार मिलता है.

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जिसकी लाठी उसकी भैंस

तीसरी योजना है कि जिसके पास ताक़त हो, वह ले ले. जो संभाल सके, वह रखे. यदि यह कार्यान्वित हुई तो विश्व में कहीं भी शांति या सुरक्षा का नामोनिशान ही नहीं रहेगा. अगर सब ताक़त में या चालाकी में समान हों तो संघर्ष और भी भयानक होंगे, परिणामस्वरूप कोई कुछ भी हथिया न सकेगा. बालक-वृद्ध कम ताक़त वाले हैं, युवा व्यक्ति अधिक ताक़त वाले हैं.

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किसान आंदोलन चौथी दुनिया और सुप्रीम कोर्ट

वर्तमान हालात में जन सरोकारों से जुड़ी पत्रकारिता का स्वरूप क्या हो सकता है? इसकी एक मिसाल चौथी दुनिया की उन रिपोर्टों में देखने को मिलती है, जो देश भर में चल रही जल, जंगल और ज़मीन की लड़ाई से संबंधित हैं. दरअसल, पिछले दो सालों के दौरान लिखी गईं उक्त रिपोट्‌र्स आने वाले समय में समस्याओं की चेतावनी दे रही थीं.

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जो जितने का पात्र है, उतना उसे क्यों न मिले

दूसरी योजना है कि हर एक को उतना मिले, जितने का वह पात्र है. बहुत से व्यक्ति, ख़ासकर जो आराम से हैं, कहते हैं और समझते हैं कि यही ठीक है. जो जितने का पात्र है, उतना उनको मिलता है, मिला हुआ है.

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मांग के मुताबिक़ मूल्य

पहली योजना है कि हर आदमी जितना वह उपार्जन करे, अपनी मेहनत से पैदा करे, उतना पाए. यह योजना देखने में बड़ी उचित और सुंदर प्रतीत होती है, पर जब इसे कार्यरूप में परिणित करना चाहें तो बड़ी कठिनाइयां पेश आती हैं. पहले तो यह निश्चय कर सकना कि किसने कितना पैदा किया, असंभव सा है.

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मध्‍य प्रदेशः वेलस्‍पन कंपनी का कारनामा- देश में कितने और सिंगुर बनेंगे

विकास के नाम पर आ़खिर कब तक किसानों और मज़दूरों को उनके हक़ से वंचित किया जाएगा? सेज, नंदीग्राम, सिंगुर, जैतापुर, फेहरिस्त लंबी है और लगातार लंबी होती जा रही है. इसी क़डी में एक और नाम जु़ड गया है वेलस्पन का. मध्य प्रदेश के कटनी ज़िले में वेलस्पन कंपनी के प्रस्तावित पावर प्लांट की स्थापना हेतु ज़िले की बरही एवं विजयराघवगढ़ तहसीलों के गांव बुजबुजा व डोकरिया के किसानों की लगभग 237.22 हेक्टेयर भूमि का शासन द्वारा अधिग्रहण किए जाने की खबर है.

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संपत्ति के वितरण की विभिन्न प्रणालियां

एक योजना जो आमतौर पर बतलाई जाती है और जो काम करने वाले मज़दूरों को मान्य और प्रिय है वह यह है कि जो आदमी अपने परिश्रम से जितना द्रव्य कमाए या पैदा करे वह उसके पास रहने दिया जाए. दूसरे कई व्यक्ति कहते हैं जो जितने का पात्र है उतना उसे मिले, जिससे कि आलसी, बेकार, कमज़ोर, शिथिल आदमियों को कुछ न मिले और वे नष्ट हो जाएं.

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बजट 2011 इसमें गरीबों के लिए कुछ भी नहीं है

प्रणब मुखर्जी के बजट में दबे-कुचलों, ग़रीबों, अल्पसंख्यकों, मज़दूरों, महिलाओं, बच्चों और किसानों के लिए धेले भर की जगह नहीं दिखाई पड़ती. बहुत पहले ही देश में बजट का स्वरूप बदल गया था. आज स्थिति यह है कि बजट सरकार की आमदनी और खर्च का ब्योरा नहीं, बल्कि जनता को आंकड़ों में उलझा कर बेवक़ूफ़ बनाने की एक सोची समझी साज़िश बनकर रह गया है.

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पूरब न जइयो सइयां, चाकरी नहीं हैः औद्योगिक बदहाली से प्रवासियों का बुरा हाल

यह दौर था 30-40 साल पहले का, जब बिहार-उत्तर प्रदेश में महेंद्र मिश्र की यह पूरबी ख़ूब गाई जाती थी. नाच या नौटंकी में इस तरह के गाने चलते थे. उस जमाने में कमाई के लिए पूरब का क्रेज़ था और प्रवासी श्रमिक सतुआ-भूजा की गठरी लेकर निकल पड़ते थे श्रमसंधान के लिए. उनका रुख़ पूरब की ओर यानी असम व पश्चिम बंगाल की ओर होता था.

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राष्‍ट्रमंडल खेलः सिर्फ पैसे की घपलेबाजी ही नहीं यह इंसानियत पर काला धब्‍बा है

भारत आज विश्व की एक उभरती महाशक्तिहै. इसलिए अगर यहां राष्ट्रमंडल खेल हो रहे हैं तो यह ख़ुशी और गर्व की बात है, लेकिन सवाल है कि इस खेल के पीछे जो खेल चल रहा है, वह कितना जायज़ है? खेल के नाम पर ग़रीबों की ज़िंदगी से आख़िर क्यों खेला जा रहा है?

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मनरेगा : का़फी गुंजाइश है सुधार की

मनरेगा के तहत काम के दौरान मज़दूरों को मिलने वाली सुविधाएं संदेह के घेरे में हैं. योजना में इन सुविधाओं से संबंधित स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए गए हैं, लेकिन इनका कहां तक पालन किया जाता है, यह संदेहास्पद है. योजना के अंतर्गत कराए जा रहे कार्यस्थलों पर न तो प्राथमिक चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध होती और न ही पीने का साफ पानी.

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मियो किसानों का विद्रोह और तबलीगी जमात

वर्ष 1910 के अंत तक मेवात के मियो बहुल ग्रामीण इलाक़ों में कृषकों की समस्याएं अपने चरम पर पहुंच चुकी थीं. इसके साथ-साथ मियो समुदाय के अंदर शिक्षित लोगों का एक नया तबका भी तैयार हो चुका था, जो खेतिहर मज़दूरों की समस्याओं को आवाज़ दे सकता था. उसने 1932-34 के दौरान मेवात क्षेत्र में किसानों के कई आंदोलनों की पृष्ठभूमि तैयार की.

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श्रमिकों के लिए केवल तीन प्रतिशत कल्‍याण राशि उपलब्‍ध

श्रमिकों के कल्याण के लिए उपलब्ध फंड का उपयोग नहीं किया जा रहा है. जो राशि इनके कल्याण के लिए आती है वह किसी और की जेब में जा रही है और यह सब इसलिए क्योंकि राज्य सरकार ने उसके लिए ज़रूरी राज्य सलाहकार समिति का गठन नहीं किया है. छत्तीसगढ़ सरकार के अलावा स्वयं केंद्र की सरकार श्रमिकों के कल्याण के लिए चलाए जाने वाली योजनाओं केवल औपचारिकता बनाकर रखना चाहती है.

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अब पेंशन की टेंशन नहीं

बिहार के जमालपुर से आर के निराला ने हमें पत्र के माध्यम से दो मामलों के बारे में सूचित किया है. दोनों मामले नगर परिषद जमालपुर से संबंधित हैं. पहला मामला चंपा देवी का है. चंपा देवी नगर परिषद जमालपुर में सफाई मज़दूर के तौर पर नियुक्त थीं.

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नक्‍सल क्रांति का एक जनक हताशा से हार गया

हताशा ने न जाने कितनी जानें ली हैं, पर अभी हाल में इसने एक ऐसे नेता को अपना शिकार बनाया है, जिसने आज से 43 साल पहले हथियारों के बल पर उस व्यवस्था को बदलने का सपना देखा था, जो किसानों व मज़दूरों का शोषण करती है, उनका हक़ मारती है. इस हताशा के ताजा शिकार हैं, कानू सान्याल.

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ममता दीदी, जरा नज़र इधर भी डालें

देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली भारतीय रेल में कल्याणकारी योजना के तहत कई अर्द्धसरकारी संस्थाएं चलाई जाती है जिनमें रेलवे मनोरंजन संस्थान, कैंटीन, को-ऑपरेटिव, सिलाई सेंटर, आर्युवेदिक एवं होम्योपैथिक स्वास्थ्य केंद्र आदि हैं. इन संस्थानों में हज़ारों श्रमिक कार्यरत हैं लेकिन विडंबना है कि रेलवे के इन उपक्रमों में कार्यरत श्रमिकों को जो मासिक वेतन दिया जा रहा है उसमें श्रम अधिनियम एवं रेलवे बोर्ड के नियमों की खुल्लम-खुल्ला अवहेलना की जा रही है.

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महिला और बाल व्यापार आदिवासी बालिकाओं की तस्‍करी

मध्य प्रदेश के बालाघाट, छिन्दवाड़ा, मण्डला, डिण्डौरी आदि आदिवासी जनसंख्या बहुल ज़िलों में आए दिन आदिवासी बालिकाओं के अचानक ग़ायब हो जाने की खबरें अब सामान्य घटना हो गई हैं. पुलिस ज़्यादातर घटनाओं की रिपोर्ट दर्ज़ नहीं करती और मजबूरी में यदि रिपोर्ट दर्ज की जाती है तो गुमशुदगी के मद में रिपोर्ट दर्ज़ कर उसे काग़ज़ों में ही द़फन कर दिया जाता है.

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चटकलिया मज़दूरों पर लटका जूट का फंदा

कोलकाता के पास टीटागढ़ के जूट मिल मज़दूर शाम को चौपाल में जब लोक गायिका प्रतिभा सिंह का यह गीत गाते हैं तो माहौल गमगीन हो जाता है. ढोलक की थाप और झाल की झनकार में सिसकते आंसुओं की आवाज़ भले ही दब जाती हो, पर जैसे-जैसे समय बीत रहा है, वैसे-वैसे जूट मज़दूरों की बस्तियों में दरिद्रता का अंधेरा गहराता जा रहा है. सूदखोरों की चांदी है.

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मजदूरों की रोज़ी—रोजी छीनी

कहते हैं, पेट की भूख इंसान से कुछ भी करा सकती है. इसी के चलते कुछ लोग वतन बदर होकर परदेश में रोजी-रोटी की तलाश करते हैं. घर छोड़ अपनों से दूर रहकर कड़ाके की ठंड, भीषण गर्मी और झमाझम बरसात के मौसम में उन्हें पेट की खातिर स़िर्फ और स़िर्फ काम करना होता है. कुछ ऐसी ही व्यथा है झारखंड राज्य के पलामू, लातेहार, गढ़वा, चतरा, लोहरदगा आदि ज़िलों से बिहार के रोहतास, कैमूर एवं भोजपुर में मज़दूरी करने आने वाले प्रवासी मज़दूरों की.

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