किसानों की मूल समस्याओं की उपेक्षा

पिछले दिनों वर्ष 2013-14 का बजट वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने पेश किया. मीडिया से लेकर अर्थशास्त्रियों की पैनी नज़र

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उड़ीसा ने अन्‍ना हजारे को सिर-आंखों पर बैठाया : राजनीति को नए नेतृत्‍व की जरूरत है

अन्ना हजारे कार्यकर्ता सम्मेलन में शिरकत करने के लिए उड़ीसा दौरे पर गए. उनकी अगवानी करने के लिए बीजू पटनायक हवाई अड्डे पर हज़ारों लोग मौजूद थे, जो अन्ना हजारे जिंदाबाद, भ्रष्टाचार हटाओ और उड़ीसा को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के नारे लगा रहे थे. अन्ना ने कहा कि हमारा काम बहुत बड़ा है और किसी को भी खुद प्रसिद्धि पाने के लिए यह काम नहीं करना है.

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यूपीए सरकार का नया कारनामा : किसान कर्ज माफी घोटाला

आने वाले दिनों में यूपीए सरकार की फिर से किरकिरी होने वाली है. 52,000 करोड़ रुपये का नया घोटाला सामने आया है. इस घोटाले में ग़रीब किसानों के नाम पर पैसों की बंदरबांट हुई है. किसाऩों के ऋण मा़फ करने वाली स्कीम में गड़बड़ी पाई गई है. इस स्कीम का फायदा उन लोगों ने उठाया, जो पात्र नहीं थे. इस स्कीम से ग़रीब किसानों को फायदा नहीं मिला. आश्चर्य इस बात का है कि इस स्कीम का सबसे ज़्यादा फायदा उन राज्यों को हुआ, जहां कांग्रेस को 2009 के लोकसभा चुनाव में ज़्यादा सीटें मिली. इस स्कीम में सबसे ज़्यादा खर्च उन राज्यों में हुआ, जहां कांग्रेस या यूपीए की सरकार है.

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जन सत्‍याग्रह- 2012 अब सरकार के पास विकल्‍प नहीं है

जन सत्याग्रह मार्च ग्वालियर से 3 अक्टूबर को शुरू हुआ. योजना के मुताबिक़, क़रीब एक लाख किसान ग्वालियर से चलकर दिल्ली पहुंचने वाले थे. इस मार्च में शामिल होने वालों में सभी जाति-संप्रदाय के अदिवासी, भूमिहीन एवं ग़रीब किसान थे. ग्वालियर से आगरा की दूरी 350 किलोमीटर है. हर दिन लगभग दस से पंद्रह किलोमीटर की दूरी तय करता हुआ यह मार्च दिल्ली की तऱफ बढ़ रहा था.

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सरकार जवाब दे यह देश किसका है

हाल में देश में हुए बदलावों ने एक आधारभूत सवाल पूछने के लिए मजबूर कर दिया है. सवाल है कि आखिर यह देश किसका है? सरकार द्वारा देश के लिए बनाई गई आर्थिक नीतियां और राजनीतिक वातावरण समाज के किस वर्ग के लोगों के फायदे के लिए होनी चाहिए? लाजिमी जवाब होगा कि सरकार को हर वर्ग का ख्याल रखना चाहिए. आज भी देश के साठ प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं. मुख्य रूप से सरकारी और निजी क्षेत्र में काम कर रहा संगठित मज़दूर वर्ग भी महत्वपूर्ण है.

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जनरल वी के सिंह का आहृवान : भ्रष्‍टाचार के समूल नाश का संकल्‍प लीजिए

देश को बचाने के लिए आज़ादी के संकल्पों को याद करके भ्रष्टाचार के समूल नाश का संकल्प युवा पीढ़ी को लेना होगा, भ्रष्टाचार का कीड़ा देश की रूह को खाए जा रहा है. यह बात पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह ने अयोध्या-फैज़ाबाद दौरे के दौरान कही. उन्होंने कहा कि सेना को उच्च तकनीक का इस्तेमाल करके ख़ुद को मज़बूत करते रहना चाहिए. पड़ोसी देश चीन यदि अपनी सेना को मज़बूत करता है तो यह उसका हक़ है, हमें भी ख़ुद को तैयार करना होगा.

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मणिपुर जमीन की एक लड़ाई यहां भी

क्या पूर्वोत्तर को तभी याद किया जाएगा, जब कोई सांप्रदायिक हिंसा होगी, जब लोगों का खून पानी बनकर बहेगा? या तब भी उनके संघर्ष को वह जगह मिलेगी, उनकी आवाज़ सुनी-सुनाई जाएगी, जब वे अपने जल, जंगल एवं ज़मीन की लड़ाई के लिए शांतिपूर्ण तरीक़े से विरोध करेंगे? मणिपुर में तेल उत्खनन के मसले पर जारी जनसंघर्ष की धमक आखिर तथाकथित भारतीय मीडिया में क्यों नहीं सुनाई दे रही है? एस बिजेन सिंह की खास रिपोर्ट :-

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कर्ज का कुचक्र और किसान

बीते 22 जुलाई को उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद जनपद की तहसील रुदौली के सिठौली गांव में ज़मीन नीलाम होने के डर के चलते किसान ठाकुर प्रसाद की मौत हो गई. ठाकुर प्रसाद का बेटा अशोक गांव के एक स्वयं सहायता समूह का सदस्य था. उसने समूह से कोई क़र्ज़ नहीं लिया था. समूह के जिन अन्य सदस्यों ने क़र्ज़ लिया था, उन्होंने अदायगी के बाद नो ड्यूज प्रमाणपत्र प्राप्त कर लिया था.

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प्रधानमंत्री विदेशी पूंजी लाएंगे

विदेशी पूंजी निवेश के बारे में पिछली बार सरकार ने फैसला ले लिया था, लेकिन संसद के अंदर यूपीए के सहयोगियों ने ही ऐसा विरोध किया कि सरकार को पीछे हटना पड़ा. खुदरा बाज़ार में विदेशी निवेश का विरोध करने वालों में ममता बनर्जी सबसे आगे रहीं. सरकार ने कमाल कर दिया. भारत दौरे पर आई अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ममता से मिलने सीधे कोलकाता पहुंच गईं.

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सरकार आदिवासियों की सुध कब लेगी

छत्तीसगढ़ को क़ुदरत ने अपार संपदा से नवाज़ा है, जिसका उपयोग यदि सही ढंग से किया जाए तो यह क्षेत्र के विकास में का़फी सहायक सिद्ध हो सकता है. इस नक्सल प्रभावित क्षेत्र में नाममात्र विकास हो पा रहा है.

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सीरिया : गृह युद्ध के आसार

सीरिया की समस्या बढ़ती जा रही है. हिंसा और प्रतिहिंसा का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है. अरब लीग के विशेष दूत को़फी अन्नान की शांति योजना भी सफल होती दिखाई नहीं दे रही है. को़फी अन्नान ने कहा है कि सीरिया गृह युद्ध की ओर बढ़ रहा है.

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सरकारी घोषणाओं का क्या हुआ

आम तौर पर एक सरकार जनता की सुविधाओं के लिए कोई योजना बनाती है या उसकी घोषणा करती है और बाद की कोई सरकार आकर उस योजना को ठंडे बस्ते में डाल देती है. इसके अलावा कई मौक़ों पर (खासकर किसी आपदा के व़क्त) सरकार की तऱफ से मदद देने की घोषणा की जाती है

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स्कूल की हालत कैसे सुधरेगी

सरकारी स्कूल इस देश के करोड़ों बच्चों के लिए किसी लाइफ लाइन से कम नहीं हैं. वजह, निजी स्कूलों का ख़र्च उठा पाना देश की उस 70 फीसदी आबादी के लिए बहुत ही मुश्किल है, जो रोज़ाना 20 रुपये से कम की आमदनी पर अपना जीवन यापन करती है.

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मनरेगा का हिसाब-किताब कैसे लें

नरेगा अब मनरेगा ज़रूर हो गई, लेकिन भ्रष्टाचार अभी भी ख़त्म नहीं हुआ. इस योजना के तहत देश के करोड़ों लोगों को रोज़गार दिया जा रहा है. गांव के ग़रीबों-मजदूरों के लिए यह योजना एक तरह से संजीवनी का काम कर रही है. सरकार हर साल लगभग 40 हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च कर रही है, लेकिन देश के कमोबेश सभी हिस्सों से यह ख़बर आती रहती है कि कहीं फर्जी मस्टर रोल बना दिया गया तो कहीं मृत आदमी के नाम पर सरपंच-ठेकेदारों ने पैसा उठा लिया.

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राहुल को हार का डर सताने लगा है

उत्तर प्रदेश में मिली हार के बाद राहुल ने अपना दायरा सीमित कर लिया है. राहुल गांधी बात भले ही पूरे प्रदेश की करते दिखते हों, लेकिन सच्चाई यही है कि उनका सारा ध्यान अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी पर लगा है. उन्हें अब इस बात का डर सता रहा है कि अगर हालात नहीं बदले तो 2014 के लोकसभा चुनाव में उनके लिए अपनी सीट बचाना भी मुश्किल हो जाएगा.

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उत्तर प्रदेशः घोटालों के गुरुघंटाल

सामाजिक एवं राजनीतिक मंच पर एक-दूसरे की टांग खींचने और खून के प्यासे लगने वाले नेताओं का असली चेहरा जनता कभी-कभी देख पाती है. सबके अपने-अपने स्वार्थ हैं, जो उन्हें एक-दूसरे के क़रीब लाते हैं. नेताओं की मिलीभगत के चलते उत्तर प्रदेश की पहचान आज घोटालों के प्रदेश के रूप में होती है. पिछले 20-25 वर्षों में तो घोटालों की बाढ़ सी आ गई.

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समाज को आईना दिखाती रिपोर्ट

हाल में यूनीसेफ द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार भारत में 22 फीसदी लड़कियां कम उम्र में ही मां बन जाती हैं और 43 फीसदी पांच साल से कम उम्र के बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकतर बच्चे कमज़ोर और एनीमिया से ग्रसित हैं. इन क्षेत्रों के 48 प्रतिशत बच्चों का वज़न उनकी उम्र के अनुपात में बहुत कम है. यूनिसेफ द्वारा चिल्ड्रन इन अर्बन वर्ल्ड नाम से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शहरी ग़रीबों में यह आंकड़ा और भी चिंताजनक है, जहां गंभीर बीमारियों का स्तर गांव की तुलना में अधिक है.

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जल संसाधन मंत्रालयः एनपीसीसी में यह क्‍या हो रहा है

जल, थल और नभ, भ्रष्टाचार के कैंसर ने किसी को नहीं छोड़ा. जहां उंगली रख दीजिए, वहीं भ्रष्टाचार का जिन्न निकल आता है. बड़े घोटालों की बात अलग है. ऐसे सरकारी संगठन भी हैं, जिनके बारे में अमूमन आम आदमी नहीं जानता और इसी का फायदा उठाकर वहां के बड़े अधिकारी वह सब कुछ कर रहे हैं, जिसे संस्थागत भ्रष्टाचार की श्रेणी में आसानी से रखा जा सकता है.

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बेवल पंचायतः ईमानदारी की कीमत चुकाता एक सरपंच

संजय ब्रह्मचारी उर्फ संजय स्वामी की आंखों में एक सपना था. वह सपना था, गांधी जी के सपनों को साकार करने का. दिल्ली एवं मुंबई में हमारी सरकार, लेकिन हमारे गांव में हम ही सरकार यानी हमारा गांव हमारी सरकार. 13 सितंबर, 2010 की रात हरियाणा के महेंद्रगढ़ ज़िले की बेवल पंचायत में इस सपने को साकार करने की एक शुरुआत हुई थी, जब संजय स्वामी ने ग्रामसभा की खुली बैठक में सरपंच पद का प्रभार काफी मशक्कत के बाद संभाला था.

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दुष्टतापूर्ण नीति

भारत में तो एक तरह से यह स्थिति आ गई है कि शासन को भारतीय राष्ट्रीय मज़दूर संघ ही चला रहा है. कोई भी काम हो, अगर उसके अधिकारीगण कराना चाहेंगे तो फौरन हो जाएगा, चाहे वह काम क़ानूनन वैध हो अथवा अवैध. कोई मिल, फैक्ट्री या कारखाना कितने ही वर्षों से नुक़सान में चल रहा हो, मज़दूर आवश्यक संख्या से बहुत ज़्यादा हों, यहां तक कि धीरे-धीरे मिल की सारी पूंजी समाप्त हो जाए, पर इन श्रमिक संघों के कान पर जूं नहीं रेंगेगी.

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फसल बीमा योजना किसानों के साथ छलावा है

हमारे मुल्क में किसानों की हालत सुधारने या उन्हें राहत देने के मक़सद से सरकारी स्तर पर कई पहल हुई हैं. एक दशक पहले शुरू हुई राष्ट्रीय फसल बीमा योजना ऐसी ही एक पहल है. इस योजना का सीधा-सीधा मक़सद फसल नष्ट होने की स्थिति में क्षतिपूर्ति करना और किसान को मदद पहुंचाना है. अपने घोषित मक़सद की वजह से ज़ाहिर है कि यह योजना काफी लोकलुभावनी दिखाई देती है, लेकिन हक़ीक़त इसके उलट है.

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पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर टकराव

भारत का समाजवादी लोकतंत्र प्रतिनिधित्व की राजनीति में अच्छी तरह रचा-बसा है. यहां विशेषज्ञों की सभा और समिति के बारे में आमतौर पर यह माना जाता है कि वे स्थितियों को बेहतर ढंग से समझते हैं. बनिस्बत उनके जो ऐतिहासिक तौर पर सत्ता प्रतिष्ठान में निर्णायक भूमिका रखते हैं. यह सब एक प्रक्रिया के तहत होता है. इसमें प्राथमिकताएं सुनिश्चित होती हैं, योजनाओं का मूल्यांकन किया जाता है और विकास के रास्ते तैयार किए जाते हैं.

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अपनी पंचायत का लेखा-जोखा मांगें

स्वराज, लोक स्वराज या गांधी का हिंद स्वराज आख़िर क्या है? गांधी जी का सपना था कि देश का विकास पंचायती राज संस्था के ज़रिए हो. पंचायती राज को इतना मज़बूत बनाया जाए कि लोग ख़ुद अपना विकास कर सकें. आगे चलकर स्थानीय शासन को ब़ढावा देने के नाम पर त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था लागू भी की गई.

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एक सीमावर्ती गांव की असली तस्वीर

भारत को गांवों का देश कहा जाता है, क्योंकि यहां की अधिकतर आबादी आज भी गांव में ही निवास करती है, प्रकृति की गोद में जीवन बसर करती है और प्राकृतिक संसाधनों के माध्यम से जीवन के साधन जुटाती है. शहरी सुख-सुविधाओं से दूर ज़िंदगी कितनी कठिनाइयों से गुज़रती है, इसका अंदाज़ा लगाना बड़े शहरों में रहने वालों के लिए मुश्किल है.

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जान देंगे, ज़मीन नहीं

बिहार राज्य विद्युत बोर्ड द्वारा बरौनी ताप विद्युत संयंत्र का विस्तारीकरण किया जाना है. राज्य मंत्रिमंडल ने 3666 करोड़ रुपये की इस योजना को स्वीकृति प्रदान कर दी है. सरकार का कहना है कि फिलहाल 2250 मेगावॉट क्षमता वाले कोयला आधारित विद्युत संयंत्र की स्थापना होगी.

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यूआईडीः नागरिकों के मूल अधिकारों के साथ खिलवाड़

जब लोकपाल बिल को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर अन्ना हज़ारे का एक दिवसीय अनशन शुरू हुआ तो उन्होंने सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को जनलोकपाल बिल पर बहस करने की दावत दी, लेकिन सांसदों ने यह कहकर हंगामा खड़ा कर दिया कि इस बिल पर चर्चा करने का अधिकार केवल संसद को है, सड़क पर चर्चा नहीं होनी चाहिए. क्या सरकार और हमारे नेता इस बात का जवाब दे सकते हैं कि जब संसद की स्टैंडिंग कमेटी ने यूआईडीएआई के चेयरमैन नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में जारी आधार स्कीम पर सवालिया निशान लगाते हुए उसे ख़ारिज करके सरकार से उस पर दोबारा ग़ौर करने के लिए कहा है तो फिर क्यों अभी तक यह कार्ड बनने का सिलसिला जारी है.

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यूपीए का अवसान हो रहा है

भारत में शिशु मृत्यु दर के आंकड़े अच्छे नहीं हैं. हर साल बहुत सारे बच्चे पांच साल की आयु सीमा पार नहीं कर पाते हैं. यही स्थिति भारत सरकार की भी दिखाई पड़ती है. ऐसी कोई भी चुनी हुई सरकार, जिसके समय में आर्थिक विकास की काफी अच्छी संभावनाएं दिखाई दें, वह कम ही अपना कार्यकाल पूरा करने से वंचित रहती है.

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बेकारी की समस्या

सामान वित्त वितरण तो दरकिनार, आज तो भारत में सबसे बड़ी समस्या बेकारी की है. तृतीय पंचवर्षीय योजना सफलतापूर्वक संपादित हो जाने के बाद भी योजना आयोग को आशा है कि 2 करोड़ नए रोज़गार पैदा हो जाएंगे

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मनरेगा पर सियासत

देश में आज भ्रष्टाचार सबसे ब़डा मुद्दा बना हुआ है, मगर अ़फसोस की बात यह है कि सियासी पार्टियां जनहित के बजाय पार्टी हित के लिए इसका इस्तेमाल कर रही हैं. कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी द्वारा उत्तर प्रदेश में केंद्रीय योजनाओं को लागू करने में कोताही बरतने का आरोप लगाते ही इस पर सियासी रंग च़ढना शुरू हो गया है.

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