भारत- फ्रांस, दोनों को एक दूसरे की ज़रूरत है

फ्रांस के राष्ट्रपति की भारत यात्रा को किन अर्थों में देखा जाना चाहिए. क्या यह फ्रांस की रणनीति का हिस्सा

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भारत-म्यांमार : रिश्तों को बेहतर बनाने की ज़रूरत

म्यांमार में लोकतंत्र की बहाली के प्रयास शुरू होने के साथ ही अमेरिका-यूरोप ने उसके संबंध में अपनी नीतियों पर पुनर्विचार शुरू कर दिया है. अमेरिका की ओर से उस पर आर्थिक प्रतिबंधों में ढिलाई देने का बयान आने लगा है. हिलेरी क्लिंटन ने म्यांमार यात्रा के दौरान इसका संकेत भी दे दिया है.

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ओलांद के हाथों में फ्रांस की बागडोर

राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव संपन्न हो चुका है. सरकोज़ी चुनाव हार गए हैं और फ्रांस्वा ओलांद अब देश के नए राष्ट्रपति होंगे. सोशलिस्ट पार्टी के ओलांद ने फ्रांस की जनता से कुछ वायदे किए हैं. अब उन वायदों को पूरा करना उनकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी होगी. सरकोज़ी की हार की सबसे बड़ी वजह यूरो ज़ोन का आर्थिक संकट और उससे निपटने में नाकामयाबी है. यूरोप के राष्ट्र आर्थिक संकट से बाहर आने के लिए मितव्ययता की नीति अपना रहे हैं.

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अफगानिस्‍तानः रणनीति पर पुनर्विचार की जरूरत है

अफग़ानिस्तान में तालिबान का असर कम होता नहीं दिखाई पड़ रहा है. यहां छिटपुट हमले तो होते ही रहते हैं, लेकिन इस बीच एक बड़ा हमला हुआ, जो अ़फग़ानिस्तान की वर्तमान स्थिति और इसके भविष्य के बारे में पुनर्विचार करने को मजबूर कर देता है. यह हमला पिछले कई हमलों से अलग दिखाई पड़ता है. पहले के हमले किसी दूतावास या किसी विशेष जगह पर बम विस्फोट के ज़रिये किए जाते रहे हैं.

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देशद्रोहियों के चेहरों से नक़ाब हटाए

सेना का यह पूरा क़िस्सा पिछले तीन महीने से चल रहा है और लगातार अलग-अलग तरह के आरोप, चाहे मीडिया हो या संसद के सदस्य हों, लगाते आ रहे हैं. वे आरोप हैं जनरल वी के सिंह पर. आरोप यह है कि हर चीज़ जनरल वी के सिंह ने एक रणनीति के तहत की. खुलासे भी उन्होंने किए, चिट्ठियां भी उन्होंने लिखीं, दिल्ली पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश भी उन्होंने की.

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राहुल गांधी को हार से सबक लेना चाहिए

बजट आ चुका है और उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम भी. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्वीकार किया है कि सहयोगी दलों द्वारा रोड़े अटकाए जाने के कारण वह कोई कठोर निर्णय नहीं ले पाते हैं. अगर कांग्रेस को आने वाले चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करना है तो उसे पुनर्विचार करना होगा कि राहुल गांधी को फिर से मौक़ा दिया जाए या फिर अपनी रणनीति बदली जाए.

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दिल्‍ली का बाबूः बाबुओं का स्थानांतरण

उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद बड़े पैमाने पर बाबुओं का स्थानांतरण शुरू हो गया है. बसपा के नज़दीकी कई बाबुओं का स्थानांतरण किया जा रहा है और उनकी जगह समाजवादी पार्टी के नज़दीक रहे बाबुओं को लाया जा रहा है. सरकार ने जावेद उस्मानी को मुख्य सचिव बनाने का फैसला किया है.

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अब क्या?

दिल्ली में कुछ दिन पहले भूकंप के झटके आए. लेकिन इससे भी बड़ा झटका एक दिन बाद आया. यह झटका उत्तर प्रदेश की राजनीति से संबंधित था. राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की हार को अपनी रणनीति की असफलता बताकर इसकी ज़िम्मेदारी ली. ऐसा पहली बार हुआ है कि नेहरु-गांधी परिवार के किसी व्यक्ति ने ग़लती स्वीकार की है.

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सहकारी बैंक और वित्तीय समावेशन

संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2012 को अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष घोषित किया है. यह भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत का सहकारिता के क्षेत्र में बहुत अहम योगदान रहा है. इसने कृषि एवं ग्रामीण विकास के लिए जिस तरह से सहकारी बैंकों का उपयोग किया है, वह सरहानीय है. इसने न केवल सैद्धांतिक तौर पर सहकारी बैंकों की भूमिका को माना है, बल्कि इसे लागू करने के लिए भी महत्वपूर्ण क़दम उठाया है.

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राहुल गांधी और उत्तर प्रदेश : मिशन-2012 दूर की कौड़ी

उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी ने दिग्विजय सिंह, रीता बहुगुणा जोशी और प्रमोद तिवारी को फ्रंट लाइन के योद्धा के तौर पर नियुक्त किया, जबकि प्रदीप जैन, आरपीएन सिंह एवं जतिन प्रसाद जैसे युवाओं को उन्हें बैकअप देने का काम सौंपा गया.

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उत्तर प्रदेशः कांग्रेस को युवराज पर भरोसा नहीं

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की चुनावी रणनीति अपना स्वरूप लेने लगी है. राहुल गांधी शुरू से यह कहते रहे कि कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश में अकेली चुनाव लड़ेगी. राहुल ने भूमि अधिग्रहण और किसानों की समस्याओं को लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाके में पदयात्रा भी की.

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महाराष्‍ट्रः शिव शक्ति – भीम शक्ति पर आशंका के बादल

राज्य में स्थानीय निकाय चुनावों की आहट देख सभी सियासी दल अपनी रणनीति बनाने में जुट गए हैं. मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए घोषणाओं और वादों के पासे फेंके जा रहे हैं. हालांकि इस काम में विपक्षी गठबंधन दिग्भ्रमित नज़र आ रहा है.

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चीन की सरकार डर गई है

वर्ष 2010-11 दुनिया के विभिन्न देशों में लोकतांत्रिक प्रणाली की समृद्धि के लिए हुई क्रांतियों का गवाह रहा है. इस दरम्यान न सिर्फ आंदोलनकारी चर्चा में रहे, बल्कि कथित तानाशाह शासक भी. चीन में भी लोकतंत्र की बहाली के लिए जमीन तैयार की जा रही है.

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निशाना चूक गया

विकास की लाख रट लगाने के बावजूद शुरू के दो चरणों के मतदान में विकास चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया. जाति के आधार पर होने वाले बिहार के चुनावों की दिशा बदलने के लिए नीतीश कुमार का इस तरफ किया गया कोई भी प्रयास रंग नहीं ला सका. यहां तक की मीडिया के नीतीशीकरण का भी प्रभाव वोटरों पर नहीं पड़ा और बिहार में जातीय ताने-बाने के बीच स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवारों की अपनी छवि के घेरे में वोट पड़े.

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शावकों की बूढ़े शेर से भिड़त

समाजवादियों की धरती जमुई में दो शावकों को बूढ़े शेर का डर सता रहा है. ज़िले के महारथी नरेंद्र सिंह के बेटे अजय प्रताप सिंह एवं जय प्रकाश यादव के भाई विजय प्रकाश यहां से प्रत्याशी हैं और उन्हें कड़ी चुनौती दे रहे हैं बुज़ुर्ग कांग्रेसी नेता अर्जुन मंडल. तीनों प्रत्याशियों की अपनी अलग-अलग ताक़त है तो कमज़ोरियां भी हैं.

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हराने के लिए हमनाम का सहारा

चुनाव जीतने के लिए नेता हर तरह के हथकंडे आज़मा रहे हैं, लेकिन यह हथकंडा कुछ अलग है. राघोपुर और महनार विधानसभा क्षेत्र में विरोधियों को मात देने के लिए उनके हमनाम उम्मीदवार को चुनावी अखाड़े में उतार दिया गया. राघोपुर में जद-यू प्रत्याशी सतीश यादव से मिलते-जुलते नाम वाले सतीश सिंह को शिवसेना के टिकट पर तो महनार में मुंशी लाल राय के खिला़फ निर्दलीय के तौर पर मुंशी लाल राय को ही खड़ा करा दिया गया.

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कहीं दरक न जाए एनडीए की जमीन

नीतीश सरकार की उपलब्धियां गिनाकर वोट पाने की चाहत रखने वाले प्रत्याशियों को इस बार झटका लग सकता है. वजह, जीत के बाद उन्होंने आम जनता से सरोकार रखना भी मुनासिब नहीं समझा, शिलान्यास और उद्घाटन करके मीडिया के सामने बड़ी-बड़ी बातें ज़रूर कीं. एक बार फिर लगभग वही प्रत्याशी चुनावी मैदान में हैं.

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चुनावी तड़काः मधेपुरा का असली नेता कौन?

बात फैली कि नीतीश कुमार इस बार मधेपुरा में कैंप करके चुनाव प्रचार करेंगे. इसके बाद तो तराज़ू पर एक तऱफ नीतीश और एक तऱफ शरद यादव को तौलने का सिलसिला शुरू हो गया. टिकट बंटवारे से पहले से ही आहत शरद यादव के समर्थकों का कहना था कि अब एक मधेपुरा ही तो बचा था शरद जी के लिए, वहां भी अगर माननीय कैंप करेंगे तो क्या मैसेज जाएगा.

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ललन की खिचड़ी में पासवान का तड़का

किसी जासूसी फिल्म की तरह बिहार की चुनावी पटकथा भी रोमांच और अटकलों से सराबोर नज़र आने लगी है. हाल यह है कि आज की तस्वीर कल से जुदा दिखती है. दोस्त और दुश्मन हमशक्ल लग रहे हैं. दिन में एक दूसरे से गले मिलते नेता देर रात में उसकी चुनावी क़ब्र खोदने की रणनीति बनाने में मशगूल दिखते हैं.

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आतंकवाद के खिलाफ जंगः रणनीति में खामी

आतंकवाद के खिला़फ चल रही जंग की रणनीति में कुछ ऐसी आधारभूत खामियां हैं कि इस जंग में जीत हासिल करने का भी शायद ही कोई फायदा हो. युद्ध की रणनीति बनाते समय अमेरिका और पाकिस्तान इस तथ्य को नज़रअंदाज़ कर गए कि यह एक बहुआयामी लड़ाई है.

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भाजपाइयों ने खींचा चुनावी खाका

जैसे-जैसे चुनाव का समय नजदीक आता जा रहा है प्राय: सभी पार्टियों ने चुनावी समर में उतरने के लिए अपनी कमर कसनी शुरू कर दी है. भाजपा ने भी चुनावी रणनीति बनाकर पार्टी कार्यकर्ताओं में एकजुटता लाने एवं उनमें जोश भरने का काम शुरू कर दिया है.

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राहुल को असफल करने की कोशिश

एक महीने बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन होने वाला है, जिसमें कांग्रेस अपना अगला राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनेगी. नि:संदेह वर्तमान अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी को ही कांग्रेस पुनः अपना अध्यक्ष चुनेगी. इसी अधिवेशन में नई कार्यकारिणी का चुनाव और मनोनयन होगा तथा कांग्रेस के केंद्रीय संगठन का भी पुनर्गठन होगा.

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प्रधानमंत्री जी, देश की ओर ईमानदारी से देखिए

लोकसभा और राज्यसभा में एक दिन का शोरशराबा और बात ख़त्म. केवल रस्म अदायगी हुई. एक पत्रिका ने छापा कि भारत सरकार की एक एजेंसी फोन टेप कर रही है. नाम आए, नीतीश कुमार और दिग्विजय सिंह के. पर यह सतही सच्चाई है. यह हमारा ध्यान बंटाने की सफल कोशिश हुई है. साजिश बहुत गहरी है, जिसके सिरे न्यायाधीशों, राजनीतिज्ञों और पत्रकारों तक पहुंचते हैं.

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सुर्खियों में आने लगे हैं नए – पुराने चेहरे

पूर्णिया के कसबा विधानसभा क्षेत्र में चुनावी गतिविधियां त़ेज हो गई हैं. अब देर शाम तक गांवों में नेताओं का जमावड़ा लगना शुरू हो गया है. पुराने नेता जिनकी क्षेत्र में अपनी पहचान है, वे पुराने ढर्रे पर ही चल रहे हैं, लेकिन नए उत्साही युवा नेता चुनाव के पूर्व ही शुभकामनाओं का बैनर और पोस्टर लगवाकर मतदाताओं का दु:ख दर्द बांटते गांवों की पगडंडियों पर देर शाम चहलक़दमी करते नज़र आने लगे हैं.

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