साल 2013 का साहित्यिक लेखा-जोखा

साल 2013 तमाम साहित्यिकगतिविधियों से भरा हुआ रहा. बिल्कुल प्रारम्भ में ही जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल के दौरान आशीष नन्दी महज़

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नए रास्तों की तलाश

राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित लावा सुप्रतिष्ठित ग़ज़लकार, पटकथाकार जावेद अख्तर का दूसरा ग़ज़ल और नज़्म संग्रह है. उनका पहला ग़ज़ल संग्रह तरकश 1995 में प्रकाशित हुआ था. क़रीब डे़ढ दशक से ज़्यादा अरसे बाद दूसरा संग्रह आने पर जावेद कहते हैं, अगर मेरी सुस्ती और आलस्य को नज़र अंदाज़ कर दिया जाए तो इस देर की एक वजह बताई जा सकती है कि मेरे ख्याल में एक के बाद दूसरे संग्रहों का अंबार लगा देना अपने अंदर कोई कारनामा नहीं है.

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विश्व पुस्तक मेले में किताबों की बहार

पुस्तक प्रेमी विश्व पुस्तक मेले का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं. दिल्ली के प्रगति मैदान में बीती 25 फरवरी से 4 मार्च तक चले विश्व पुस्तक मेले का इस बार भी देश भर से आए पुस्तक प्रेमियों ने जमकर लुत्फ उठाया. किसी स्टॉल पर किताबों का लोकार्पण हो रहा था तो किसी स्टॉल पर लोग अपने प्रिय लेखक से गुफ्तगू कर रहे थे.

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कुछ तो है, जिसकी पर्दादारी है

हिंदी में साहित्यिक किताबों की बिक्री के आंकड़ों को लेकर अच्छा-खासा विवाद होता रहा है. लेखकों को लगता है कि प्रकाशक उन्हें उनकी कृतियों की बिक्री के सही आंकड़े नहीं देते हैं. दूसरी तऱफ प्रकाशकों का कहना है कि हिंदी में साहित्यिक कृतियों के पाठक लगातार कम होते जा रहे हैं. बहुधा हिंदी के लेखक प्रकाशकों पर रॉयल्टी में गड़बड़ी के आरोप भी जड़ते रहे हैं, लेकिन प्रकाशकों पर लगने वाले इस तरह के आरोप कभी सही साबित नहीं हुए.

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लेखको, मा़फी मांगो

पिछले दिनों लखनऊ में हिंदी के महान रचनाकारों में से एक श्रीलाल शुक्ल जी का निधन हो गया. मैं श्रीलाल जी से दो बार मिला. एक बार राजकमल प्रकाशन के लेखक से मिलिए कार्यक्रम में और दूसरी बार राजेंद्र यादव की जन्मदिन की पार्टी में.

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सपाट बयानी का संग्रह

बहुत ही दिलचस्प वाकया है. राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तकों की सूची उसकी वेबसाइट पर जाकर देख रहा था. कई किताबें पसंद आईं. यह सोचकर नाम लिखता गया कि उन पुस्तकों को मंगवा कर पढूंगा और अगर मन बना तो उन पर अपने स्तंभ में या अन्यत्र कुछ लिखूंगा भी. सूची बनाते-बनाते एक किताब दिखाई दी-मरजानी, लेखिका वर्तिका नंदा.

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