हाफिज सईद की पार्टी को पाक में नहीं मिली मंजूरी, फोटो लगाने पर भी मनाही

नई दिल्ली। आतंकी हाफिज सईद के मंसूबों पर पानी उस वक्त फिर गया जब पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने उस

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बाज़ारवादी पत्रकारिता के निशाने पर वैदिक

पत्रकारिता के बारे में आम तौर पर धारणा है कि पत्रकार निष्पक्ष तो होता ही है, क्योंकि उसे जज या

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संविधान में राजनीतिक दल का जिक्र नहीं है : राजनीतिक दलों की राय का औचित्य

भाग-3 मैं संविधान पर किसी भी आलोचना को चुनौती देता हूं कि दुनिया की कोई भी संविधान सभा इस बात

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संविधान में राजनीतिक दल का जिक्र नहीं है : संविधान बनाने में किसने कितनी मेहनत की

संविधान निर्माण में किन-किन लोगों ने कैसे योगदान किया. उनके कार्यों का क्या महत्व था और अगर वे न होते,

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सत्ता के पूर्ण विकेंद्रीकरण से संभव है : पार्टीविहीन लोकतंत्र

गांधी और जेपी की सोच पार्टीविहीन लोकतंत्र को कभी उभरने नहीं दिया गया, क्योंकि अगर ऐसा होता, तो आज जो

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व्यवस्था संविधान को धोखा देकर बनी है

कर्नाटक में कांग्रेस भारी बहुमत से जीत गई और भारतीय जनता पार्टी हार गई. क्या इसका मतलब हम यह निकालें

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राजनीतिज्ञों के लिए ख़तरा हैं अन्ना हज़ारे

मैं पिछले दिनों अन्ना हज़ारे की यात्रा में उनके साथ था. मुझे ऐसा लगा कि वे शायद दोबारा इतिहास रचने

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देश के लिए कब सोचेंगे राजनीतिक दल

कांग्रेस की चुनावी तैयारियां शुरू हो चुकी हैं. कांग्रेस पूरे भरोसे के साथ यह मानकर बैठी है कि वह तीन

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हमारा लोकतंत्र भ्रष्टाचार बनाए रखने का हथियार है

काम तो सचमुच कमाल के हो रहे हैं. सीबीआई सुप्रीम कोर्ट को स्टेटस रिपोर्ट सौंपती है, जिसका रिश्ता 26 लाख

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ईमानदार पत्रकार, दलाल पत्रकार

पत्रकारिता प्रतिस्पर्धा का पेशा है. प्रतिस्पर्धा रिपोर्ट, स्टोरी और स्कूप के क्षेत्र में होती है. प्रतिस्पर्धा निर्भीकता में होती है,

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राजनीति की बिसात पर सोनभद्र

उत्तर प्रदेश की राजनीतिक बिसात में सोनभद्र एक ऐसा मोहरा है जिसे खिलाड़ी (नेता) इस्तेमाल तो वजीर की तरह करते हैं लेकिन उसकी असल हैसियत प्यादे से भी नीचे है. सरकार के खजाने में सर्वाधिक राजस्व जमा करने का श्रेय सोनभद्र को जाता है. नेता और नौकरशाह अपनी तिजोरी भरने का काम भी इसी के जरिए करते हैं. इन सबके बीच अगर किसी का हक़ मारा जा रहा है तो वह यहां का आम आदमी है. इनमें आदिवासियों की स्थिति सर्वाधिक बदतर है. इन आदिवासियों का इस्तेमाल राजनीतिक दल अपने स्वार्थ के लिए करते हैं लेकिन जब हक़ देने की बारी आती है तो सबकुछ खुद डकार जाते हैं. मसलन क्षेत्र में स्थापित वैध और अवैध सभी क्रशरों में से अधिकांश राजनीतिक दलों के नेताओं और उनके परिजनों के हैं. खनन के पट्‌टे पर भी नेता, नौकरशाह और खनन मा़फिया सांप की तरह कुंडली मारकर बैठे है. यही वजह है कि सोनभद्र में अवैध खनन के मसले पर सब चुप्पी साधे रहते हैं. तू भी खा मैं भी खाऊं की नीति लागू है.

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भ्रष्टाचार : देश का सरकारी तंत्र स़डने लगा है

आम बड़ा स्वादिष्ट फल है. यह जब कच्चा होता है तो हम इसे नमक के साथ बड़े चाव से खाते हैं और जब पक जाता है तो यह मीठा हो जाता है, तो और भी खाने लायक हो जाता है. कहने का मतलब यह है कि आम प्राकृतिक तरीक़े से बढ़ता है. अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम इसे कच्चा खाएं, अचार बनाएं या फिर पकने का इंतज़ार करें. आम हर हाल में स्वादिष्ट होता है. अगर इसी आम को हम छोड़ दें तो यह सड़ने लग जाएगा. इसका स्वाद ख़त्म हो जाएगा. बीमारी फैलाने वाला फल बन जाएगा. कोई भी तंत्र इसी थ्योरी पर चलता है. किसी तंत्र के सड़ने का मतलब है आंतरिक विरोधाभास पैदा होना. देश में फैले भ्रष्टाचार के साम्राज्य में अंतर्विरोध पैदा होने लगा है. अब यह पूरा तंत्र सड़ने लगा है, इसलिए यह टूटने और बिखरने लगा है. जो लोग पहले मिल-जुलकर देश को लूट रहे थे, आज आपस में लड़ रहे हैं. यही वजह है कि एक अदालत दूसरी अदालत को भ्रष्ट बता रही है, एक राजनीतिक दल दूसरे को घोटालेबाज़ बता रहा है, उद्योगपति एक-दूसरे को जालसाज बता रहे हैं, एक अधिकारी दूसरे अधिकारी के बारे में ख़ुलासा कर रहा है. मीडिया भी इस सड़न से बदबूदार हो रहा है. राजनीतिक दल, सरकारें, अदालतें, ब्यूरोक्रेसी, मीडिया, उद्योगजगत या फिर फिल्मी सितारे सब सड़ चुके हैं. आम का रसास्वादन करने वाले, सरकारी तंत्र से नाजायज फायदा उठाने वाले अब एक-दूसरे पर वार कर रहे हैं. हर तरफ चाकू निकल रहे हैं. यही वजह है कि पिछले पांच महीने में एक के बाद एक घोटाले सामने आ रहे हैं.

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