बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगा विशेष राज्य का दर्जा

रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा ने भी बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने का पुरजोर समर्थन किया है. श्री

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तेज प्रताप यादव की शादी में शामिल होने ये दिग्गज नेता

आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव की शादी की तैयारियां एजी से चल रही हैं.

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अस्पताल में भर्ती कराये गये राम विलास पासवान, सांस लेने में हो रही थी दिक्कत

नई दिल्ली, (विनीत सिंह) : सांस लेने में दिक्कत होने के बाद बीते गुरूवार को केंद्रीय मंत्री एवं लोजपा प्रमुख

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बिहार नये समीकरण की ओर बढ रहा है

बिहार में एक नया राजनीतिक समीकरण बन रहा है. पिछले कई सालों से रामविलास पासवान और लालू यादव की पार्टी

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बिहार की राजनीति में वंशवाद का ज़हर

लालू  यादव और रामविलास पासवान बिहार की राजनीति में वंशवाद का जहर मिलाने पर अ़डे हैं. पासवान के बेटे चिराग

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बिहार की राजनीति में वंशवाद की बेल

                बिहार की राजनीति में वंशवादी परंपरा उतनी ही पुरानी है, जितना पुराना

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जब तोप मुकाबिल हो : प्रार्थना कीजिए, सब कुछ अच्छा हो

कांग्रेस सबसे अच्छी स्थिति में है. भारतीय जनता पार्टी की अंतर्कलह ने उसे नया जीवनदान दे दिया है. महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी एवं

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चुनावी सर्वे के खेल में : मोदी और राहुल साथ-साथ है

देश में होने वाले चुनावी सर्वे न स़िर्फ भ्रामक हैं, बल्कि उन्हें राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा

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बिहार की राजनीति का असली चेहरा

पिछले दिनों राजधानी दिल्ली के तीन मूर्ति भवन में एबीपी न्यूज़ के एग्जीक्यूटिव एडिटर, डॉ. अनिल सिंह की पुस्तक बिहारः

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अन्ना और रामदेव की वजह से आशाएं जगी हैं

अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसे लोगों को सावधान हो जाना चाहिए. इतने दिनों के बाद भी उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा है कि कौन-सा सवाल उठाना चाहिए और कौन-सा नहीं. एक वक़्त आता है, जिसे अंग्रेजी में सेचुरेशन प्वाइंट कहते हैं. शायद जो नहीं होना चाहिए, वह हो रहा है, यानी लोकतंत्र सेचुरेशन प्वाइंट की तऱफ ब़ढ रहा है.

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मुस्लिम समाज का दर्द

बिहार में आश्चर्यजनक चीजें होती हैं. मुसलमानों की समस्याओं पर सेमिनार हो, वक्ता राजनीतिक दलों के नेता और सामाजिक कार्यकर्ता हों और कोई आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद की बात न करे, अगर कोई संघ परिवार और बजरंग दल को दोषी और अपराधी न बताए, अगर बाबरी मस्जिद का मुद्दा न उठे, अगर कोई भावनात्मक भाषण न दे, अगर मौलाना और मौलवी इस्लाम पर आने वाले खतरे को छोड़, शिक्षा और नौकरी की बातें करने लगें, तो हैरानी होती है.

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कांग्रेस मीठा जहर है

किताब लिखना बड़े-बड़े राजनेताओं और नौकरशाहों का नया शौक बन गया है. जब इन दोनों में से कोई किताब लिखता है तो बड़ा विवाद खड़ा हो जाता है. नौकरशाह कई राज़ खोलते हैं. सेवा में रहते हुए जिन बातों को वे नहीं बोल पाते, रिटायर होने के बाद किताबों में लिखते हैं.

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पारस की बंध गई पोटली

खगड़िया ज़िले के बेहद पिछड़े विधानसभा क्षेत्र अलौली में अंतत: 33 वर्षों के बाद लोजपा प्रदेश अध्यक्ष पशुपति कुमार पारस की पोटली बंध ही गई. लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान के अनुज पारस ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि जनता उन्हें सिर आंखों पर बिठाने के बजाए ज़मीन पर पटक देगी. दरअसल हार से बचने के लिए उन्होंने अपने चहेते रामचंद्रा सदा को जदयू का टिकट यह सोचकर दिलवाया था कि उन्हें मुसहर समाज के तीन-तीन प्रत्याशियों के खड़े रहने से जीतने में मदद मिलेगी. हुआ उल्टा. महादलित समाज के लोगों ने एकजुट होकर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया.

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राहुल को घेरेंगे तेजस्‍वी और चिराग

बिहार विधानसभा के चुनाव में राहुल फैक्टर की बात तो पहले से हो रही थी, पर चुनावी शंखनाद के बाद इसके तेज होते असर ने नीतीश, लालू एवं पासवान जैसे दिग्गजों की नींद उड़ा दी है. राहुल गांधी युवाओं से बार-बार अपील कर रहे हैं कि चुनिए उन्हें, जिन्हें देश ने चुना है. राहुल की सभाओं में युवाओं की बढ़ती भागीदारी यह महसूस करा रही है कि सूबे के युवा वोटरों के मन में क्या चल रहा है.

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बिहार चुनावः नीतीश, लालू और राहुल की अग्निपरीक्षा

बिहार के चुनाव पर पूरे देश की नज़र है. क्या नीतीश कुमार फिर से मुख्यमंत्री बन जाएंगे, क्या लालू यादव अपनी खोई हुई लोकप्रियता वापस पाने में कामयाब हो जाएंगे, क्या रामविलास पासवान के पास सरकार बनाने की चाबी आ जाएगी, क्या मुसलमान इस बार भाजपा-जदयू गठबंधन के साथ चले जाएंगे, क्या बिहार के चुनाव में लोग विकास के मुद्दे पर वोट देंगे या फिर जातिवाद का बोलबाला रहेगा, क्या भारतीय जनता पार्टी बिहार में हिंदुत्व के एजेंडे को छोड़ देगी आदि जैसे कई सवाल हैं, जिन पर बिहार ही नहीं, पूरे देश की जनता विचार कर रही है.

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बिहार विधानसभा चुनावः सज गई सेना

बिहार में चुनावी महासंग्राम के लिए अपनी-अपनी सेनाओं को सजाने और उसे चमकाने का काम सभी दिग्गजों ने लगभग पूरा कर लिया है. चुनावी हथियारों से लैस करके सेना को मैदान-ए-जंग में कूदने की हरी झंडी चरणबद्ध तरीके से दिखाई जा रही है. जहां पेच फंस रहा है, उसे रतजगा करके सुलझाया जा रहा है, ताकि एक-एक पल का फायदा उठाया जा सके.

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यह लालू, नीतीश और राहुल की अग्निपरीक्षा है

बिहार चुनाव राजनीति की महत्वपूर्ण प्रयोगशाला बन गया है. अगर इसे पुराने बिहार के पैमाने पर देखें तो और मज़ा आएगा. पहले झारखंड के संकेत देखिए. अर्जुन मुंडा ने आडवाणी जी की अनदेखी की. आडवाणी सहित मुरली मनोहर जोशी और सुषमा स्वराज सरकार बनाना नहीं, चुनाव चाहते थे.

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कांग्रेस के हाथ लगेगी सत्ता की चाबी

पांच साल पहले रामविलास पासवान सत्ता की चाबी लेकर घूम रहे थे. बहुमत न मिलने के कारण नीतीश और लालू उन्हें मनाते रहे, लेकिन उन्होंने सत्ता की चाबी किसी को नहीं सौंपी. नतीजा यह हुआ कि किसी की सरकार नहीं बनी और सूबे में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा. आज हालात बदल गए हैं.

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नीतीश के नहले पर लालू का दहला

मैदान चाहे राजनीति का हो या युद्ध का, एक नियम दोनों ही लड़ाई में लागू होता है कि अगर सवाल जीवन-मरण का हो तो राजा को खुद आगे बढ़कर सेना की कमान संभालनी चाहिए. यह ऐसी चाल है, जो थकी-हारी सेना में जीत का जोश भरने के अलावा राजा को यह एहसास दिलाती है कि अगर इस बार चूके तो किस्सा खत्म.

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ललन की खिचड़ी में पासवान का तड़का

किसी जासूसी फिल्म की तरह बिहार की चुनावी पटकथा भी रोमांच और अटकलों से सराबोर नज़र आने लगी है. हाल यह है कि आज की तस्वीर कल से जुदा दिखती है. दोस्त और दुश्मन हमशक्ल लग रहे हैं. दिन में एक दूसरे से गले मिलते नेता देर रात में उसकी चुनावी क़ब्र खोदने की रणनीति बनाने में मशगूल दिखते हैं.

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लालू और पासवान भी दौड़ में

चुनाव लड़ने और जीतने की रणनीति पर तो इन दिनों दिन-रात काम चल ही रहा है, पर चुनाव बाद की संभावित परिस्थितियों पर भी सभी दलों के महारथी माथा खपा रहे हैं. वजह, सभी दलों का यह प्रारंभिक आकलन है कि किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने वाला.

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बारिश से बेहाल नेता

चुनावी मानसून पता नहीं किस नेता के लिए कामयाबी की फुहारें लाए और किस नेता को वृष्टि छाया क्षेत्र में सूखा छोड़ दे, यह तो समय बताएगा, लेकिन प्राकृतिक बारिश की ठंडी फुहारों के बावजूद कुछ नेताओं के माथे से पसीने का गिरना थम ही नहीं रहा. बारिश से प्रदेश की जनता तो राहत महसूस कर रही है पर नेता आहत.

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कर्पूरी स्‍मृति भवन को कर्पूरी की प्रतिमा का इंतजार

समाजवादी चिंतक, ग़रीबों के मसीहा, गुदड़ी के लाल एवं बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जननायक कर्पूरी ठाकुर की जन्मस्थली कर्पूरी ग्राम में आज भी लोग पेयजल की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं. इंदिरा आवास, सामाजिक सुरक्षा पेंशन, कन्या विवाह योजना समेत विभिन्न सरकारी योजनाओं का सही से क्रियान्वयन नहीं हुआ है.

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नीतीश ने बिहारियों को धोखा दिया : पासवान

रामविलास पासवान हाजीपुर से भले ही लोकसभा का चुनाव हार गए हों, लेकिन शायद ही कोई ऐसा दिन गुज़रता है जब उनके पटना स्थित आवास पर वहां के लोगों की भीड़ न देखी जाए. बात करने पर पता चला कि हाजीपुर से उनका रिश्ता चुनावी जीत-हार तक ही सीमित नहीं है, बल्कि रामविलास का क्षेत्र के लोगों के साथ भरोसे और विश्वास का मजबूत बंधन है.

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बिहार में मुसलमान

चुनावी साल में बिहार के दिग्गज नेताओं को एक बार फिर सूबे के डेढ़ करोड़ मुसलमानों का दर्द सताने लगा है. मुसलमानों की ग़रीबी, उनके बच्चों के न पढ़ पाने का दर्द और सत्ता में उनकी कम भागीदारी अचानक नेताओं के एजेंडे में ऊपर आ गई है. जगह-जगह रैलियों एवं सभाओं में मुसलमानों के सम्मान और कल्याण के लिए वादों की बौछार शुरू है. इन नेताओं की आंखों में अपना दर्द निहारने वाले मुसलमानों के हिस्से में क्या आएगा, यह तो समय बताएगा पर वोट की राजनीति करने वाले नेता यह गुना-भाग करने में मशगूल हैं कि उनकी पार्टी के हिस्से में मुसलमानों का ज़्यादा से ज़्यादा वोट कैसे आएगा.

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महिला बिल और नीतीश

महिला आरक्षण विधेयक ने भारतीय राजनीति में कुछ सफाई तो की है. इसमें पहली यह कि विधेयक बनाने वाला शख्स सबसे महत्वपूर्ण होता है उसे पढ़ने वाला नहीं, क्योंकि कोई उसे पढ़ता ही नहीं है. महिला सीटें आरक्षित होंगी लेकिन फ्लोटिंग होंगी. इसका मतलब किसी भी चुनाव में जीती महिला सांसद अपनी जनता के प्रति जवाबदेह होगी ही नहीं, क्योंकि उसे पता है कि उसे वहां से दोबारा लड़ना ही नहीं है. कैबिनेट ने इसे पढ़ा या नहीं, और अगर पढ़ा तो इसे कैबिनेट की समझ की बलिहारी माननी चाहिए.

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रण में उतरे राहुल

चुनावी साल में आखिरकार कांग्रेस ने अपने सबसे बड़े योद्घा राहुल गांधी को बिहार के रणक्षेत्र में उतार ही दिया. लंबे इंतजार के बाद पूरे तामझाम के साथ आए राहुल गांधी दो दिनों तक पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं का हौसला बढ़ाने के साथ-साथ अपने राजनीतिक विरोधियों को ललकारते रहे.

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मुलायम-अमर अलग क्‍यों हुए

मुलायम सिंह और अमर सिंह के अलगाव की कहानी में कई तत्व हैं. अविश्वास है, ग़लतफहमी है, जलन है, आकांक्षा है, महत्वाकांक्षा है, षड्‌यंत्र हैं, दु:ख है, दर्द है और बेबसी है. मुलायम सिंह और अमर सिंह के अलावा इस कहानी के मुख्य पात्र हैं मोहन सिंह, आज़म खान और राम गोपाल यादव. बाद में तो जैसे पूरी समाजवादी पार्टी ही इस कहानी के प्रमुख किरदार में बदल गई.

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सियासत की बिसात

सियासतदानों की कलई उतरने लगी है. रंगनाथ मिश्र कमीशन की अनुशंसाओं के बहाने सियासी पार्टियां अपनी-अपनी गोटी फिट करने की जुगत में हैं. इस कोशिश में दलित ईसाई और मुसलमानों की कोई फिक्र नहीं है. अगर कुछ है तो वह है ख़ुद का फायदा कराने का तिकड़म. हर पार्टी इन दिनों रंगनाथ मिश्र कमीशन की अनुशंसाओं का गहन अध्ययन कर रही है. पार्टियों को उन मुद्दों की तलाश है, जिनकी बिना पर वह आम अवाम की नज़रों में वीर्यवान नायक बन सकें.

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सडक से सियासत

बड़ी ही आत्मीय मुस्कान उभरती है रामविलास पासवान के चेहरे पर. बे़फिक़्री ज़ाहिर करते हुए फरमाते हैं कि हमारी कभी ये ख्वाहिश नहीं थी कि हम सांसद बनें, केंद्रीय मंत्री बनें या देश पर राज करें. ये तो बिहार की जनता का भरोसा था हममें. कारवां बनता गया.

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