कई देशों में सत्ता परिवर्तन कर चुका है सीआईए

भारत में फोर्ड फाउंडेशन द्वारा पोषित और संचालित  संगठनों और उससे जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं को बड़ी इज्जत दी जाती है.

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ज़बानी जमा-खर्च पर लड़े जा रहे चुनाव

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव संपन्न हो चुके हैं. कहने को इन चुनावों में हर पार्टी ने अपना घोषणा-पत्र जारी

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इस बदहाली के लिए ज़िम्मेदार कौन है

आप जब इन लाइनों को पढ़ रहे होंगे तो मैं नहीं कह सकता कि रुपये की अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में या डॉलर के मुक़ाबले क़ीमत क्या होगी. रुपया लगातार गिरता जा रहा है. अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों ने न केवल बैंकों की, बल्कि सभी वित्तीय संस्थाओं की रेटिंग घटा दी है. कुछ एजेंसियों ने तो हमारे देश की ही रेटिंग घटा दी है.

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राहुल को हार का डर सताने लगा है

उत्तर प्रदेश में मिली हार के बाद राहुल ने अपना दायरा सीमित कर लिया है. राहुल गांधी बात भले ही पूरे प्रदेश की करते दिखते हों, लेकिन सच्चाई यही है कि उनका सारा ध्यान अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी पर लगा है. उन्हें अब इस बात का डर सता रहा है कि अगर हालात नहीं बदले तो 2014 के लोकसभा चुनाव में उनके लिए अपनी सीट बचाना भी मुश्किल हो जाएगा.

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बांस बना रोजगार का साधन

पिछले दिनों केंद्र सरकार ने सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों को एक पत्र लिखकर यह सा़फ कर दिया कि बांस पेड़ नहीं, बल्कि घास की श्रेणी में आते हैं. अत: इन्हें काटने के लिए वन विभाग से विशेष अनुमति लेने की ज़रूरत नहीं होगी. सरकार की इस पहल से उन लोगों को राहत पहुंची है, जो बांस उत्पाद के माध्यम से रोज़गार हासिल कर रहे हैं.

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राहुल जी, गांव में आपने क्या सीखा

बापू जब मोहनदास करमचंद गांधी थे, नौजवान वकील थे और दक्षिण अफ्रीका में वकालत करने गए तो उनके साथ एक हादसा हुआ. गोरों ने उन्हें प्रथम श्रेणी में बैठने के लायक़ नहीं समझा और ज़बरदस्ती गाड़ी से धक्का देकर बाहर फेंक दिया. जब वह हिंदुस्तान वापस आए, उनके मन में हिंदुस्तान में कुछ काम करने की इच्छा जागी.

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सिर्फ छह महीने में पता चल जाएगाः ममता सफल होंगी या असफल मुख्यमंत्री

जनता ने तो सत्ता का पोरिवर्तन कर दिया है, अब पोरिवर्तन करने की बारी ममता बनर्जी की है. अकेले दम पर लगभग दो तिहाई सीटें बटोरने के बाद भी अगर ममता बनर्जी कांग्रेस को सरकार में शामिल होने का न्योता देती हैं तो इसे सिर्फ उनकी भलमनसाहत या कहें कि गठबंधन धर्म निभाने की बात नहीं माना जाना चाहिए.

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रोजगार की तलाश में पलायन जारी

ग्रामीणों को 100 दिन रोज़गार उपलब्ध कराने के दावों और वादों के साथ चलाई जा रही महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना को लागू हुए चार वर्ष हो गए हैं, किंतु पलायन रुकने का नाम नहीं ले रहा है. ग्रामीणों को रोज़गार उपलब्ध कराने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की ओर से पैसा तो मिल रहा है, बावजूद इसके छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों से रोज़गार की तलाश में लोगों का पलायन जारी है.

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सहरसा में चल रही है लूट की योजना

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना यानि मनरेगा की तस्वीर सहरसा, सुपौल व मधेपुरा जिलों में काफी धुंधली नजर आ रही है. पलायन रोककर स्थायी परिसंपत्ति निर्माण कराए जाने की सरकार की गरीब हितकारी योजना मनरेगा को इसमें जारी लूट-खसोट ने पूरी तरह विकृत कर रख दिया है.

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प्रधानमंत्री नहीं जानते, देश में कितने बेरोजगार!

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार रोजगार के नाम पर देश के नौजवानों के साथ धोखा कर रही है. रोजगार के नाम पर नई-नई योजनाओं का मजमा लगाए बैठी यूपीए सरकार को यह पता ही नहीं कि देश में बेरोजगारों की संख्या कितनी है. महंगाई रोक पाने में बुरी तरह विफल सरकार नहीं चाहती कि देश के युवाओं को रोजगार मिले, देश से बेरोज़गारी की महामारी खत्म हो.

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मनरेगा रोजगार नहीं, धोखा है

मध्य प्रदेश में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना को लेकर सरकार भले ही बड़े-बड़े दावे करती हो, लेकिन हक़ीक़त यही है कि राज्य में कहीं भी ग्रामीण श्रमिकों को औसतन 60 दिन का काम भी नहीं मिल रहा है. जबकि क़ानूनी तौर पर श्रमिकों को कम से कम 100 दिन का रोज़गार मिलना चाहिए.

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सर्विस इकोनोमी या सर्वेंट इकोनोमी

कुछ दिन पहले प्रकाशित एक किताब के मुताबिक़ आज से सौ साल पहले इंग्लैंड में घरेलू नौकर रोजगार का सबसे बड़ा स्त्रोत था. साधारण सा दिखने वाला यह तथ्य एक वर्ग-आधारित समाज में व्याप्त असमानता का सटीक चित्रण करता है और विक्टोरियन एवं उसके बाद के समाज में धन और सत्ता के बीच नजदीकी रिश्तों के बारे में भी बताता है.

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आओ बनाएं अपना मध्‍यप्रदेश बढ़ती बेरोजगारी घटते रोजगार

गरीबी और पिछड़ेपन की समस्याओं से त्रस्त मध्य प्रदेश को खुशहाल और संपन्न राज्य बनाने का सुनहरा सपना दिखाने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेक इरादों की सराहना की जानी चाहिए, लेकिन नेक इरादों के बावजूद उनमें और उनकी सरकार में संकल्प शक्ति नहीं दिखती है, इसीलिए राज्य के विकास और जनकल्याण की तमाम योजनाएं भारी भरकम खर्च के बावजूद प्रभावशून्य और परिणामशून्य ही नज़र आती हैं.

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कचरे के चलते रोजी-रोटी का संकट

नई परियोजनाओं पर आठ महीने के लिए रोक लगना धनबाद में गर्त में जाते उद्योग जगत के लिए एक और चुनौती है. खासकर रोजगार के दृष्टिकोण से यह निर्णय विकट स्थिति पैदा करने के लिए का़फी है. धनबाद ज़िला प्रशासन, कोल कंपनियों के प्रबंधन और राज्य सरकार की अदूरदर्शी सोच के कारण यह विकट स्थिति उत्पन्न हुई है. अगर तीनों में से किसी ने भी सकारात्मक भूमिका निभाई होती तो आज इस स्थिति का सामना न करना पड़ता. इतना ही नहीं, अगर अगले आठ महीनों में भी कोई परिवर्तन न हुआ तो निश्चित रूप से लोगों के सामने और भी विकट स्थिति उत्पन्न हो जाएगी.

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