शिक्षा और रोज़गार की बदहाली के खिलाफ यूपी में जन-अभियान, ताकि लोग जागें तो सत्ता सुधरे…

प्रदेश में सरकारें आती-जाती रही हैं, लेकिन आबादी के अनुपात में रोज़गार के अवसर बढ़ने के बजाय कम होते जा

Read more

खीरी में ख़राब स्वास्थ्य सेवाएं, झूठ के आसरे सीएमओ

चुनावी बिगुल बज चुका है, लेकिन सच मानिए, पूरे प्रदेश की जनता विभिन्न मुद्दों जैसे बिजली, पानी, कानून, रोजगार, शिक्षा

Read more

देश को जनाभिमुख अर्थव्यवस्था की ज़रूरत

क्या सचमुच देश में एक बदलाव आते-आते भटक गया, रुक गया या समाप्त हो गया? प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी

Read more

फर्रु़खाबाद को अब धोखा बर्दाश्त नहीं

अरविंद केजरीवाल फर्रु़खाबाद गए भी और दिल्ली लौट भी आए. सलमान खुर्शीद को सद्बुद्धि आ गई और उन्होंने अपनी उस धमकी को क्रियान्वित नहीं किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि केजरीवाल फर्रु़खाबाद पहुंच तो जाएंगे, लेकिन वापस कैसे लौटेंगे. इसका मतलब या तो अरविंद केजरीवाल के ऊपर पत्थर चलते या फिर गोलियां चलतीं, दोनों ही काम नहीं हुए.

Read more

अपनी माटी से जुड़ते बिहारी कारोबारी

कुछ साल पहले देश में यह धारणा बन चुकी थी कि बिहार में उद्योग-धंधे लगाना किसी भी क़ीमत पर संभव नहीं है. ऐसा मानने वालों का तर्क था कि राज्य में कोई औद्योगिक माहौल ही नहीं है, क्योंकि वहां बुनियादी सुविधाओं से लेकर आधारभूत संरचनाओं की घोर कमी है.

Read more

सामाजिक विशमता मानव नस्ल का

आप पूछ सकते हैं कि भाई, जिन आदमियों के पास खाने को पर्याप्त रोटी नहीं है, पहनने के लिए कपड़ा नहीं है, उन सबको समान बंटवारा कर देने से क्या सब ठीक हो जाएगा? क्या आप मानते हैं कि वे उस प्राप्त धन का दुरुपयोग नहीं करेंगे? क्या उन्हें प्राथमिकता का ज्ञान या ध्यान रहेगा? वे लोग मिली हुई धनराशि जुए या अन्य किसी दुर्व्यसन में खर्च करके फिर उसी तरह रोटी-कप़डे के मोहताज नहीं बन जाएंगे?

Read more

बीडी मजदूर : जीवन में खुशहाली कब आएगी

किसी भी देश की आर्थिक उन्नति उसके औद्योगिक विकास पर निर्भर करती है. अगर वह किसी विकासशील देश की बात हो तो वहां के लघु उद्योग ही उसके आर्थिक विकास की रीढ़ होते हैं. भारत भी एक विकासशील देश है. ज़ाहिर है, भारत के विकास की कहानी के पीछे भी इन्हीं उद्योगों का योगदान है, लेकिन अब भारत धीरे-धीरे विकासशील देशों की कतार में का़फी आगे आ चुका है.

Read more

विकास दर धीरे-धीरे गिरने लगी है

वेन जियाबाओ पिछले दिनों लंदन गएऔर वहां उन्होंने ब्रिटिश प्रधानमंत्री को इस बात के लिए फटकारा कि उन्हें अपने अतिथि के सामने मानवाधिकार पर भाषण नहीं देना चाहिए, लेकिन तब ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के पास जियाबाओ की बात सुनने के अलावा कोई विशेष चारा नहीं था, क्योंकि वह चीन से व्यापार और निवेश को इच्छुक थे.

Read more

भूखों को रोटी देने की कवायद

देश में खाद्य सुरक्षा विधेयक को मंज़ूरी मिलने से भुखमरी से होने वाली मौतों में कुछ हद तक कमी आएगी, ऐसी उम्मीद की जा सकती है. हाल में प्रगतिशील जनतांत्रिक गठबंधन (यूपीए) की अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 को मंज़ूरी दी है.

Read more

दलित उद्यमिता का संकल्‍प

सांगली से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर कावधे महान्का ताल्लुका में देवानंद लोंधे का हिंगन गांव है. वह लंबे समय तक अपने गांव से बाहर रहे. कई वर्षों तक देश से भी बाहर रहे. अच्छी नौकरी थी, लेकिन उसके बावजूद दिल में तड़प हमेशा अपने गांव लौटने की बनी रही.

Read more

प्रजातंत्र के नाम पर चीरहरण

भारत ने पिछले दो दशकों में जिस ऊर्जा के साथ विकास किया है, सराहनीय है. लेकिन इस विकास का एक काला पक्ष भी है, जिसे न तो मीडिया देखना चाहता है और न ही देश का मध्यम वर्ग. इस विकास यात्रा के दौरान ग़रीबों की संख्या बढ़ती चली गई. भारत में विश्व के 25 फीसदी ग़रीब लोग थे और आज यह प्रतिशत 39 हो गया है.

Read more

क्‍या यही ग्राम स्‍वराज है?

मैं घूमने के लिए कई बार यहां-वहां जाती रहती हूं. कभी बड़े शहरों में तो कभी छोटे शहरों में और कई बार उत्तराखंड के पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों में भी. वैसे तो गांवों में भी अब बदलाव आने लगे हैं, पर कहने में संकोच नहीं होता कि ज़्यादातर बदलावों का परिणाम उल्टा ही हुआ है.

Read more

कुलपति और बदहाल उच्‍च शिक्षा

जदयू सांसद शिवानंद तिवारी की हाल ही में की गई टिप्पणी, जिसमें वह कहते हैं कि बिहार में कुलपतियों की नियुक्तियां संदेह के घेरे में रही हैं. इसलिए विश्वविद्यालय के शैक्षणिक माहौल को सुधारने के लिए कुलपतियों की चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता आवश्यक है, बताती है कि उच्च शिक्षा की वर्तमान हालत क्या है.

Read more

ग्राम स्‍वराज की ओर बढ़ते कदम

कहते हैं कि जब सरकारी तंत्र पूरी तरह से सड़ने लगे और लोकतंत्र स़िर्फ नाम का ही रह जाए तो ऐसे में विकास का रास्ता ज़डों की ओर लौटने से ही मिलता है. किसी भी देश के विकास की इमारत में उस देश के गांव और किसान नींव का काम करते हैं.

Read more

पानी कब बनेगा चुनावी मुद्दा?

देश भर में रोज़गार मुहैया कराने वाली अति महत्वाकांक्षी परियोजना मनरेगा की सफलता प्रचार माध्यमों द्वारा गाए जाने के बावजूद गांवों से पलायन थमा नहीं है. पेयजल मिशन का यशोगान इस चुनावी माहौल में पवित्र ॠचाओं से कम सात्विक नहीं लगा, मगर इस साल भी गांव-शहर पानी की कमी से आतंकित ज़रूर रहे.

Read more

मनरेगा का काला सच

बीते तीन सालों से तमाम आशंकाओं और अटकलों के बीच देश में ठीक-ठाक बारिश होती रही है. औसत बारिश का 78 प्रतिशत, जैसा कि विशेषज्ञ बताते हैं. दैनिक ज़रूरतों और दूसरे कामों के लिए हमें जितना पानी चाहिए, उससे दोगुनी मात्रा में पानी बरस कर जल- संकायों एवं धरती के गर्भ में जमा हो रहा है.

Read more

कोहरे में लिपटी परदेसियों की उम्‍मीद

वतन से दूर, बीवी बच्चों से अलग, मां बहनों की नज़रों से ओझल एक परदेसी के लिए अपनी मिट्टी पर त्यौहार मनाने की ख़ुशी कुछ और ही होती है. वह भी ऐसे समय पर जब लोकतंत्र का महान पर्व यानी चुनाव साथ-साथ हो. नवंबर का महीना आख़िरी पड़ाव पर है.

Read more

पूरब न जइयो सइयां, चाकरी नहीं हैः औद्योगिक बदहाली से प्रवासियों का बुरा हाल

यह दौर था 30-40 साल पहले का, जब बिहार-उत्तर प्रदेश में महेंद्र मिश्र की यह पूरबी ख़ूब गाई जाती थी. नाच या नौटंकी में इस तरह के गाने चलते थे. उस जमाने में कमाई के लिए पूरब का क्रेज़ था और प्रवासी श्रमिक सतुआ-भूजा की गठरी लेकर निकल पड़ते थे श्रमसंधान के लिए. उनका रुख़ पूरब की ओर यानी असम व पश्चिम बंगाल की ओर होता था.

Read more

भारत में मुसलमानों की रोज़गार समस्या

सच्चर कमेटी ने देश में मुसलमान समुदाय के विभिन्न पक्षों का विस्तृत विश्लेषण किया और सारी बातें कमेटी की रिपोर्ट में उल्लिखित हैं. मुसलमानों की पहचान ही उनके विकास की सबसे बड़ी बाधा है, यह बात भी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कही गई है. साथ ही यह भी स्पष्ट है कि इससे ही कई और बाधाएं भी पैदा हो जाती हैं.

Read more

गरीब रिक्‍शेवाले कहां जाएंगे

मानव श्रम के दोहन के सबसे स्पष्ट उदाहरणों में से एक है सड़कों पर चलने वाला रिक्शा. और यह रोजी-रोटी कमाने के सबसे पुराने तरीक़ों में से भी एक है. न जाने कब से इस सवारी के घूमते तीन चक्कों के साथ न जाने कितनी ज़िंदगियों की क़िस्मत घूमती रही है. अशिक्षा और भूमिहीनता के चलते भुखमरी झेलने को अभिशप्त समाज के सबसे निचले और कमज़ोर तबके के लिए रिक्शा पेट पालने का अभिन्न और अक्सर एकमात्र साधन रहा है.

Read more

अंडमान में खाद्य प्रसंस्‍करण की पहल

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में पर्यावरणीय संतुलन क़ायम रखने के लिए कुछ समय पूर्व न्यायालय ने वनों की कटाई पर रोक लगा दी थी. लंबे समय तक काष्ठ उत्पादों के निर्माण से जुड़े लोगों के सामने ऐसे में रोजी-रोटी का संकट आ खड़ा हुआ.

Read more

पूर्ण स्वच्छता अभियान और मनरेगा

मनरेगा की उपयोगिता और इसके उद्देश्यों को लेकर कोई संदेह नहीं. यह भी सच्चाई है कि इसमें ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने की संभावनाएं मौजूद हैं, लेकिन अब तक का अनुभव यही बताता है कि इसके क्रियान्वयन में सुधार की ज़रूरत है. यदि इसे पूर्ण स्वच्छता अभियान जैसी व्यक्तिगत लाभ योजनाओं से जोड़ दिया जाए तो दोनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है.

Read more

मनरेगा : का़फी गुंजाइश है सुधार की

मनरेगा के तहत काम के दौरान मज़दूरों को मिलने वाली सुविधाएं संदेह के घेरे में हैं. योजना में इन सुविधाओं से संबंधित स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए गए हैं, लेकिन इनका कहां तक पालन किया जाता है, यह संदेहास्पद है. योजना के अंतर्गत कराए जा रहे कार्यस्थलों पर न तो प्राथमिक चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध होती और न ही पीने का साफ पानी.

Read more

मनरेगा : भ्रष्टाचार रोकने के उपाय नाका़फी

नरेगा के अंतर्गत भ्रष्टाचार और सरकारी धन के अपव्यय को रोकने के लिए विशेष व्यवस्था की गई है. इस योजना की संरचना में पर्यवेक्षण और निरीक्षण का खास ध्यान रखा गया है. इसके लिए फील्ड में जाकर ज़मीनी हक़ीक़त की जांच-पड़ताल, मस्टररोल का सार्वजनिक निरीक्षण, योजना के अंतर्गत पूरे किए जा चुके एवं चल रहे कामों को सूचनापट्ट पर प्रदर्शित एवं प्रचारित करने और सामाजिक अंकेक्षण पर विशेष ज़ोर दिया गया है.

Read more

मनरेगा : अनुभव से सीखने की ज़रूरत

महात्मा गांधी नेशनल रूरल इंप्लायमेंट गारंटी प्रोग्राम (मनरेगा) की शुरुआत हुए चार साल से ज़्यादा व़क्त बीत चुका है और अब यह देश के हर ज़िले में लागू है. अपनी सफलता से तमाम तरह की उम्मीदें पैदा करने वाले मनरेगा को सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी एवं आकर्षक योजनाओं में गिना जा रहा है.

Read more

खाद्य प्रसंस्‍करण उद्योग और ग्रामीण आत्‍मनिर्भरता

भारत गांवों का देश है, जिसकी अर्थव्यवस्था का मूल आधार कृषि को माना जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि एक ओर जहां किसानों को बेहतर उत्पादन होने पर भी फसल की कम क़ीमत मिलती है, वहीं दूसरी तऱफ कम उत्पादन होने पर भी उन्हें घाटे का सामना करना पड़ता है.

Read more

मनरेगा, जो मन में आए करो!

उत्तर प्रदेश में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोज़गार योजना (मनरेगा) ग़रीबों के लिए केंद्र सरकार की खास योजना है. लेकिन अधिकारियों ने इसे अपनी तरह से चलाने की मनमानी शुरू कर दी है. इस समय प्रदेश के अधिकारियों और कर्मचारियों के मन में जो आ रहा है वही, इस योजना के लिए भेजे गए फंड के साथ किया जा रहा है.

Read more