बड़ी कठिन है न्‍याय की डगर

सब मानते हैं कि देर से मिला इंसा़फ भी नाइंसा़फी के बराबर होता है. इसके बावजूद हमारे देश में म़ुकदमे कई पीढि़यों तक चलते हैं. हालत यह है कि लोग अपने दादा और परदादा के म़ुकदमे अब तक झेल रहे हैं. इंसान खत्म हो जाता है, लेकिन म़ुकदमा बरक़रार रहता है. इसकी वजह से बेगुनाह लोग अपनी ज़िंदगी जेल की सला़खों के पीछे गुज़ार देते हैं. कई बार पूरी ज़िंदगी क़ैद में बिताने या मौत के बाद फैसला आता है कि वह व्यक्ति बेक़सूर है.

Read more

इंसाफ़ की आवाज़ कहीं से नहीं आती

पाकिस्तान में दो साल पहले स्वतंत्रता के ऐतिहासिक संघर्ष के बाद सस्ते और तात्कालिक न्याय के लिए बड़े-बड़े दावों के साथ वजूद में आने वाली स्वतंत्र न्यायपालिका से तात्कालिक न्याय की उम्मीद आज भी एक सपना ही है. न्यायपालिका की बहाली के बावजूद पाकिस्तानी अदालतों में लंबित पड़े मुक़दमों की संख्या 13 लाख से अधिक हो चुकी है.

Read more

सियासत की फांस में फांसी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि फांसी की सज़ा दुर्लभ से दुर्लभ मामलों में ही दी जाए. ऐसे में जब किसी अपराधी को फांसी की सज़ा दी जाती है तो इसका सीधा मक़सद इंसानियत के दुश्मनों में भय पैदा करके उन्हें हतोत्साहित करना होता है, ताकि फिर से कोई किसी निर्दोष का ख़ून न बहा सके.

Read more