तकसीम चौक प्रदर्शन : तुर्की को कमज़ोर करने का षड्यंत्र

तकसीम चौक का विरोध प्रदर्शन पश्‍चिमी मीडिया की नज़र में भले ही मिस्र, लीबिया एवं ट्यूनीशिया की क्रांति जैसा रहा

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लीबिया : अभी और बिगड़ेंगे हालात

कर्नल मोअम्मर अली गद्दाफ़ी ने 42 सालों तक लीबिया पर शासन किया. उनके मारे जाने के बाद दुनिया भर से जो प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, उनमें यही कहा जा रहा है कि अब लीबिया के लोगों को शांति मिलेगी यानी कर्नल गद्दा़फी का मारा जाना अच्छी ख़बर है, किंतु आशंका इस बात की है कि वहां हालात अभी और बिगड़ेंगे.

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क्रांति की राह पर यमन

लीबिया, ट्यूनीशिया और मिस्र में सत्ता के विरुद्ध जनता का आंदोलन सफल रहा. तीनों देशों के तानाशाहों को पराजित होना पड़ा, लेकिन आंदोलन अभी थमा नहीं है. अगली बारी यमन की है. यमन में भी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष हो रहा है. राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह को सत्ता से बेदखल करने के लिए खूनी जंग चल रही है. सऊदी अरब से इलाज कराकर अब्दुल्ला सालेह की वापसी के बाद हिंसा-प्रतिहिंसा का दौर फिर शुरू हो गया है.

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प्रजातंत्र की लडा़ई में विदेशी ताकतें

लीबिया के हालात अभी भी गंभीर बने हुए हैं. न तो देश की जनता का विश्वास खो देने वाले मुअम्मर ग़द्दा़फी पीछे हटने को तैयार हैं और न जनता की तऱफ से सत्ता परिवर्तन के लिए लड़ रहे लड़ाके. इस बीच संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव से लैस नाटो की सेनाएं भी लड़ाकों के साथ मिलकर गद्दा़फी की सत्ता पलटने में जुट गई हैं. यह परिस्थिति अपने आप में विस्मयकारी है.

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लीबिया पर हमलाः असली मंसूबे कुछ और हैं

अमेरिका, फ्रांस एवं इंग्लैंड ने लीबिया को हवाई उड़ान प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित करने संबंधी संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव को लागू करने में जो तत्परता दिखाई, वह इन देशों के साम्राज्यवादी लक्ष्यों के अनुरूप है. इन्हीं तीनों देशों ने 19वीं एवं 20वीं सदी में लगभग आधी दुनिया को अपना ग़ुलाम बनाया था. इंग्लैंड एवं फ्रांस ने यह काम प्रत्यक्ष ढंग से किया था और अमेरिका ने अप्रत्यक्ष ढंग से.

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सेना मुग्ध, जनता क्षुब्ध

पहले ट्यूनीशिया, फिर मिस्र के बाद लीबिया में मोअम्मर गद्दा़फी के तानाशाही शासन के विरुद्ध जन विद्रोह भड़का तो लगा कि अब गद्दा़फी का हश्र भी ट्यूनीशिया और मिस्र के शासकों की तरह होगा, लेकिन यहां की कहानी लगातार बदलती जा रही है.

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मोसाद का ख़ौ़फनाक क़हर

पूरी दुनिया के चप्पे-चप्पे में मौजूद मोसाद को इसके लिए भी ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा. आख़िरकार, उसके शातिर और क़ाबिल ख़ुफ़िया एजेंटों ने उनका पता लगा ही लिया. जिसकी तलाश में मोसाद मोरक्को भटक रहा था, ब्लैक सेप्टेंबर का वह ख़तरनाक सदस्य अली हसन सालमेह बेरूत में मौजूद था. एक बार फिर मोसाद ने उसे घेरने का पूरा प्लान तैयार कर लिया और साथ में मौक़े पर ही उसे ख़त्म करने का पूरा साज़ो-सामान भी. अपने इस गुप्त मिशन को मोसाद ने कुछ इस तरह अंजाम दिया कि ख़ुद अली हसन को भी पता नहीं चल पाया कि जिस गाड़ी में वह सवार है, वह गाड़ी नहीं बल्कि चलता-फिरता मौत का सामान है.

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