व्यक्तित्व विकास की पहली पाठशाला

पुस्तक लिखना महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि महत्वपूर्ण है कि लेखक ने अपनी पुस्तक के जरिये पाठकों को, समाज को आख़िर

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लाजवाब फनकार गुलज़ार

गीतकार, निर्देशक एवं पटकथा लेखक गुलज़ार को फिल्म जगत के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के अवॉर्ड-2013 के लिए चुना गया

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तसलीमा सुर्खियों में रहना चाहती हैं

बांग्लादेश की विवादास्पद और निर्वासन का दंश झेल रही लेखिका तसलीमा नसरीन ने एक बार फिर से नए विवाद को जन्म दे दे दिया है. तसलीमा ने बंग्ला के मूर्धन्य लेखक और साहित्य अकादमी के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय पर यौन शोषण का बेहद संगीन इल्ज़ाम जड़ा है. तसलीमा ने सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर लिखा- सुनील गंगोपाध्याय किताबों पर पाबंदी के पक्षधर रहे हैं.

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पूरे चांद की रात…

भारतीय साहित्य के प्रमुख स्तंभ यानी उर्दू के मशहूर अ़फसानानिग़ार कृष्ण चंदर का जन्म 23 नवंबर, 1914 को पाकिस्तान के गुजरांवाला ज़िले के वज़ीराबाद में हुआ. उनका बचपन जम्मू कश्मीर के पुंछ इलाक़े में बीता. उन्होंने तक़रीबन 20 उपन्यास लिखे और उनकी कहानियों के 30 संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. उनके प्रमुख उपन्यासों में एक गधे की आत्मकथा, एक वायलिन समुंदर के किनारे, एक गधा नेफ़ा में, तूफ़ान की कलियां, कॉर्निवाल, एक गधे की वापसी, ग़द्दार, सपनों का क़ैदी, स़फेद फूल, प्यास, यादों के चिनार, मिट्टी के सनम, रेत का महल, काग़ज़ की नाव, चांदी का घाव दिल, दौलत और दुनिया, प्यासी धरती प्यासे लोग, पराजय, जामुन का पेड़ और कहानियों में पूरे चांद की रात और पेशावर एक्सप्रेस शामिल है. 1932 में उनकी पहली उर्दू कहानी साधु प्रकाशित हुई. इसके बाद उन्होंने पीछे म़ुडकर नहीं देखा.

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पुस्तक मेले लेखकों का प्रचार मंच बन चुके हैं

विश्व में पुस्तक मेलों का एक लंबा इतिहास रहा है. पुस्तक मेलों का पाठकों की रुचि बढ़ाने से लेकर समाज में पुस्तक संस्कृति को बनाने और उसको विकसित करने में एक अहम योगदान रहा है. भारत में बड़े स्तर पर पुस्तक मेले सत्तर के दशक में लगने शुरू हुए. दिल्ली और कलकत्ता पुस्तक मेला शुरू हुआ. 1972 में भारत में पहले विश्व पुस्तक मेले का दिल्ली में आयोजन हुआ.

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प्रकृति से जु़डी है हमारी संस्कृति

इंसान ही नहीं दुनिया की कोई भी नस्ल जल, जंगल और ज़मीन के बिना ज़िंदा नहीं रह सकती. ये तीनों हमारे जीवन का आधार हैं. यह भारतीय संस्कृति की विशेषता है कि उसने प्रकृति को विशेष महत्व दिया है. पहले जंगल पूज्य थे, श्रद्धेय थे. इसलिए उनकी पवित्रता को बनाए रखने के लिए मंत्रों का सहारा लिया गया. मगर गुज़रते व़क्त के साथ जंगल से जु़डी भावनाएं और संवेदनाएं भी बदल गई हैं.

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धूप भी चांदनी-सी लगती है

आधुनिक उर्दू शायरी के क्रांतिकारी शायर अली सरदार जा़फरी ने अपनी क़लम के ज़रिये समाज को बदलने की कोशिश की. उनका कहना था कि शायर न तो कुल्हा़डी की तरह पे़ड काट सकता है और न इंसानी हाथों की तरह मिट्‌टी से प्याले बना सकता है. वह पत्थर से बुत नहीं तराशता, बल्कि जज़्बात और अहसासात की नई-नई तस्वीरें बनाता है.

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ये इल्म का सौदा, ये रिसाले, ये किताबें

बीसवीं सदी के मशहूर शायरों में जां निसार अख्तर को शुमार किया जाता है. उनका जन्म 14 फरवरी, 1914 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक सुन्नी मुस्लिम परिवार में हुआ. उनके पिता मुज़्तर खैराबादी मशहूर शायर थे. उनके दादा फज़ले-हक़ खैराबादी मशहूर इस्लामी विद्वान थे. जां निसार अख्तर ने ग्वालियर के विक्टोरिया हाई स्कूल से दसवीं पास की. इसके बाद आगे की प़ढाई के लिए वह अलीग़ढ चले गए, जहां उन्होंने अलीग़ढ मुस्लिम विश्वविद्यालय से एमए की डिग्री हासिल की.

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समकालीन गीतिकाव्य पर बेहतरीन शोध ग्रंथ

अनंग प्रकाशन द्वारा प्रकाशित समकालीन गीतिकाव्य : संवेदना और शिल्प में लेखक डॉ. रामस्नेही लाल शर्मा यायावर ने हिंदी काव्य में 70 के दशक के बाद हुए संवेदनात्मक और शैल्पिक परिवर्तनों की आहट को पहचानने की कोशिश की है. नवगीतकारों को हमेशा यह शिकायत रही है कि उन्हें उतने समर्थ आलोचक नहीं मिले, जितने कविता को मिले हैं. दरअसल, समकालीन आद्यावधि गीत पर काम करने का खतरा तो बहुत कम लोग उठाना चाहते हैं.

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सोनिया: कुछ कही, कुछ अनकही

किसी भी शख्स की जीवनी लिखना एक श्रमसाध्य काम है और अगर कोई लेखक किसी मशहूर हस्ती की जीवनी लिखना शुरू करता है तो उसका यह काम उस नट की तरह होता है, जो दो खंभों के बीच रस्सी पर एक डंडे के सहारे संतुलन बनाकर चलता है.

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मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग

फैज़ अहमद फैज़ अपनी क्रांतिकारी रचनाओं के लिए जाने जाते हैं. नोबेल पुरस्कार के लिए नामित फैज़ अहमद फैज़ पर साम्यवादी होने और इस्लाम के उसूलों के खिला़फ लिखने के भी आरोप लगते रहे. उनका जन्म 11 फरवरी, 1911 को पाकिस्तान के स्यालकोट शहर में हुआ था.

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साक्षात्‍कारः बड़े ढांचे में लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था का चलना मुश्किल

83 वर्षीय सच्चिदानंद सिन्हा एक समाजवादी कार्यकर्ता, चिंतक एवं लेखक हैं. उस दौर में जब समाजवादी विचारधारा महानगरों एवं चर्चाओं तक सीमित रह गई हो, तब सच्चिदानंद बाबू की न स़िर्फ लेखनी, बल्कि उनकी जीवनशैली भी समाजवादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करती नज़र आती है.

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गली-गली चोर है

बॉलीवुड में रूमी जा़फरी की पहचान एक लेखक के रूप में है. कई हिट फिल्मों की कहानी, स्क्रीन प्ले और संवाद उन्होंने लिखे हैं. डेविड धवन के लिए उन्होंने कई कॉमेडी फिल्मों में लेखन किया है. हीरो नं 1, घरवाली बाहरवाली, बड़े मियां छोटे मियां, दुल्हन हम ले जाएंगे, मैंने प्यार क्यों किया जैसी हिट फिल्मों से उनका नाम जुड़ा है.

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औरत की बोली

पिछले कई सालों से हिंदी में साहित्येतर विधाओं की किताबों के प्रकाशन में का़फी तेज़ी आई है. प्रकाशकों के अलावा लेखकों ने भी इस ओर गंभीरता से ध्यान दिया है. कई लेखकों ने कहानी, कविता, उपन्यास से इतर समाज के उन विषयों को छुआ है, परखा है, जो अब तक हिंदी समाज की नज़रों से ओझल थे.

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आलोचना की आलोचना क्यों

हिन्दी साहित्य के वर्तमान परिदृश्य में आज आलोचना और समीक्षा को लेकर ज़बरदस्त विमर्श चल रहा है. लेखकों और आलोचकों ने आलोचना और ख़ासकर समीक्षा और उसके स्तर पर ज़बरदस्त प्रहार किए हैं, चिंता भी जताई है.

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पांच दशक से समीक्षा कर्म में लगे हैं मधुरेश

प्रेमचंद की मशहूर कहानी पंच परमेश्वर में अलगू चौधरी और खाला के बीच एक संवाद है- क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे. यह बात उस प्रसंग में कही गई है जब खाला, जुम्मन से परेशान होकर पंचायत करवानी चाहती है.

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…किसी से हो नहीं सकता

हर साल 31 जुलाई हिंदी साहित्य के लिए एक बेहद ख़ास दिन होता है. इस दिन हिंदी के महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद का जन्मदिन होता है, लेकिन हिंदी पट्टी में अपने इस गौरव को लेकर कोई उत्साह देखने को मिलता हो, यह ज्ञात नहीं है. प्रेमचंद के गांव लमही में कुछ सरकारी किस्म के कार्यक्रम हो जाते हैं, जिनमें मंत्री वग़ैरह भाषण देकर रस्म अदायगी कर लेते हैं.

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जन्‍मदिवस 31 जुलाई पर विशेषः प्रेमचंद के सपनों का भारत

मुंशी प्रेमचंद के सपनों का भारत निश्चित ही गांधी के सपनों का भारत था. गांधी ने आज़ाद भारत का बड़ा तल्ख तजुर्बा किया. प्रेमचंद इस मायने में भाग्यशाली थे कि उन्होंने आज़ाद भारत का दु:ख और पराभव नहीं देखा. बेकल उत्साही के एक गीत का यह मुखड़ा प्रेमचंद के सपनों के भारत को सजीव करता है:

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निज भाषा पर अभिमान करो

हिंदी में प्रकाशित किसी भी कृति-उपन्यास या कहानी संग्रह या फिर कविता संग्रह को लेकर हिंदी जगत में उस तरह का उत्साह नहीं बन पाता है, जिस तरह अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में बनता है. क्या हम हिंदी वाले अपने लेखकों को या फिर उनकी कृतियों को लेकर उत्साहित नहीं हो पाते हैं. हिंदी में प्रकाशक पाठकों की कमी का रोना रोते हैं, जबकि पाठकों की शिकायत किताबों की उपलब्धता को लेकर रहती है.

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दिलचस्प अनुभवों की शाम

बात अस्सी के दशक के अंत और नब्बे के दशक के शुरुआती वर्षों की है. पुस्तकों को पढ़ते हुए बहुधा मन में विचार आता था कि उस पर कुछ लिखूं, लेकिन संकोचवश कुछ लिख नहीं पाता था. ज़्यादा पता भी नहीं था कि क्या और कैसे लिखूं और कहां भेजूं. मैं अपने इस स्तंभ में पहले भी चर्चा कर चुका हूं कि किताबों को पढ़ने के बाद चाचा भारत भारद्वाज को लंबे-लंबे पत्र लिखा करता था.

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बिहार में सांस्कृतिक क्रांति

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी मशहूर किताब संस्कृति के चार अध्याय में कहा है कि विद्रोह, क्रांति या बग़ावत कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसका विस्फोट अचानक होता है. घाव भी फूटने के पहले बहुत दिनों तक पकता रहता है. दिनकर जी की ये पंक्तियां उनके अपने गृहराज्य पर भी पूरी तरह से लागू होती हैं.

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साहित्यकार समाज सुधारक नहीं होता

नवोदित उपन्यासकार महुआ माजी का मानना है कि साहित्यकार समाज सुधारक नहीं होता. वह सिर्फ लिखता है, ताकि लोग उस विषय पर मंथन करें कि क्या सही है और क्या ग़लत. अपने उपन्यास मैं बोरिशाइल्ला के लिए वर्ष 2007 में अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान पाने वाली महुआ माजी रांची की रहने वाली हैं.

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