भारतीय साहित्य के प्रमुख स्तंभ यानी उर्दू के मशहूर अ़फसानानिग़ार कृष्ण चंदर का जन्म 23 नवंबर, 1914 को पाकिस्तान के गुजरांवाला ज़िले के वज़ीराबाद में हुआ. उनका बचपन जम्मू कश्मीर के पुंछ इलाक़े में बीता. उन्होंने तक़रीबन 20 उपन्यास लिखे और उनकी कहानियों के 30 संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. उनके प्रमुख उपन्यासों में एक गधे की आत्मकथा, एक वायलिन समुंदर के किनारे, एक गधा नेफ़ा में, तूफ़ान की कलियां, कॉर्निवाल, एक गधे की वापसी, ग़द्दार, सपनों का क़ैदी, स़फेद फूल, प्यास, यादों के चिनार, मिट्टी के सनम, रेत का महल, काग़ज़ की नाव, चांदी का घाव दिल, दौलत और दुनिया, प्यासी धरती प्यासे लोग, पराजय, जामुन का पेड़ और कहानियों में पूरे चांद की रात और पेशावर एक्सप्रेस शामिल है. 1932 में उनकी पहली उर्दू कहानी साधु प्रकाशित हुई. इसके बाद उन्होंने पीछे म़ुडकर नहीं देखा.
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विश्व में पुस्तक मेलों का एक लंबा इतिहास रहा है. पुस्तक मेलों का पाठकों की रुचि बढ़ाने से लेकर समाज में पुस्तक संस्कृति को बनाने और उसको विकसित करने में एक अहम योगदान रहा है. भारत में बड़े स्तर पर पुस्तक मेले सत्तर के दशक में लगने शुरू हुए. दिल्ली और कलकत्ता पुस्तक मेला शुरू हुआ. 1972 में भारत में पहले विश्व पुस्तक मेले का दिल्ली में आयोजन हुआ.
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जब से इंसान ने एक दूसरे को समझना शुरू किया होगा, तभी से उसने भाषा के महत्व को भी समझा और जाना होगा. भाषा सभ्यता की पहली निशानी है. किसी भी समाज की संस्कृति और सभ्यता की जान उसकी भाषा में ही बसी होती है. किसी भाषा का खत्म होना, उस समाज का वजूद मिट जाना है, उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का इतिहास के पन्नों में सिमट जाना है. इंसान के आधुनिक होने में उसकी भाषा का सबसे ब़डा योगदान रहा होगा, क्योंकि इसके ज़रिये ही उसने अपनी बात दूसरों तक पहुंचाई होगी.
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आधुनिक उर्दू शायरी के क्रांतिकारी शायर अली सरदार जा़फरी ने अपनी क़लम के ज़रिये समाज को बदलने की कोशिश की. उनका कहना था कि शायर न तो कुल्हा़डी की तरह पे़ड काट सकता है और न इंसानी हाथों की तरह मिट्टी से प्याले बना सकता है. वह पत्थर से बुत नहीं तराशता, बल्कि जज़्बात और अहसासात की नई-नई तस्वीरें बनाता है.
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नई पीढ़ी के पत्रकारों और पाठकों के लिए उदयन शर्मा को जानना ज़रूरी है, क्योंकि ये दोनों वर्ग आज पत्रकारिता के उस स्वरूप से रूबरू हो रहे हैं, जहां स्थापित मूल्यों में क्षरण देखने को मिल रहा है. उद्देश्य में भटकाव और विचलन की स्थिति है. युवा वर्ग के साथ ही वह पीढ़ी भी, जिसने कभी रविवार और उदयन शर्मा के धारदार लेखन को पढ़ा, देखा या उसके बारे में जाना है, पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति से संतुष्ट नज़र नहीं आ रही है.
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प्रभाष जोशी हमारे समय के बड़े पत्रकार थे. उनके सामाजिक सरोकार भी उतने ही बड़े थे. समाज और पत्रकारिता को लेकर उनकी चिंता का दायरा भी बेहद विस्तृत था. हिंदी पट्टी और हिंदी समाज में प्रभाष जी की का़फी इज़्ज़त भी थी. उनके निधन के बाद हिंदी पत्रकारिता में एक खालीपन आ गया है.
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विमल कुमार हिंदी के पाठकों के बीच एक जाना-पहचाना नाम हैं. लिक्खाड़ पत्रकार हैं, तमाम पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य और साहित्येतर विषयों पर उनके लेख और टिप्पणियां प्रकाशित होती रहती हैं. अच्छे कवि भी हैं और कविता के लिए 1987 में ही भारत भूषण पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं.
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रामचंद्र गुहा आज़ाद भारत के ऐसे इतिहासकार हैं, जिन्होंने इतिहास लेखन को मार्क्सवादी ढर्रे से मुक्त कराकर उसे लोकप्रिय बनाया. उनकी शैली शास्त्रीय इतिहास लेखन से बिल्कुल अलग हटकर है, जिसे इतिहास के विद्यार्थियों के अलावा आम पाठकों ने भी सराहा है.
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जनता एक ज़िम्मेदार संसद का निर्माण करे |
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