राम मंदिर विवाद कांग्रेस ने पैदा किया

यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि राम मंदिर विवाद सांप्रदायिक नहीं, राजनीतिक है. विभाजन की त्रासदी झेलने की बाद

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मुस्लिमों के सवाल

विभाजन कांग्रेस द्वारा भारत को लेकर देखे गए सपने पर एक गहरा धक्का था, फिर भी कांग्रेस के नेता विभाजन

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संविधान और जनता को धोखा

भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ. लेकिन आश्‍चर्य की बात तो यह है कि बिना जनता को

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पुराने शासन से प्रेम?

इस साल की शुरुआत में उत्तर प्रदेश विधानसभा की 125वीं वर्षगांठ मनाई गई. इस उत्सव के समय जो कुछ भी

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हिंद महासागर का सैन्यीकरण- तटवर्ती देशों को साथ आना होगा

हिंद महासागर की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी किसके पास होनी चाहिए? उन देशों के पास, जिनकी सीमाएं इससे जुड़ी हुई हैं

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भारत-म्यांमार : रिश्तों को बेहतर बनाने की ज़रूरत

म्यांमार में लोकतंत्र की बहाली के प्रयास शुरू होने के साथ ही अमेरिका-यूरोप ने उसके संबंध में अपनी नीतियों पर पुनर्विचार शुरू कर दिया है. अमेरिका की ओर से उस पर आर्थिक प्रतिबंधों में ढिलाई देने का बयान आने लगा है. हिलेरी क्लिंटन ने म्यांमार यात्रा के दौरान इसका संकेत भी दे दिया है.

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साक्षात्‍कारः बड़े ढांचे में लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था का चलना मुश्किल

83 वर्षीय सच्चिदानंद सिन्हा एक समाजवादी कार्यकर्ता, चिंतक एवं लेखक हैं. उस दौर में जब समाजवादी विचारधारा महानगरों एवं चर्चाओं तक सीमित रह गई हो, तब सच्चिदानंद बाबू की न स़िर्फ लेखनी, बल्कि उनकी जीवनशैली भी समाजवादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करती नज़र आती है.

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रूस : पुतिन की वापसी

रूस की जनता ने ब्लादिमीर पुतिन को अपना राष्ट्रपति चुना है. विगत चार मार्च को रूस में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव कराए गए, जिसमें पुतिन को लगभग 64 फीसदी मत मिले. उनके विरोधियों में से किसी ने बीस प्रतिशत मत नहीं पाए. कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार गेन्नादी ज्युगानोव को लगभग 18 फीसदी मत मिले, जबकि अन्य उम्मीदवार दहाई के अंक तक नहीं पहुंच सके. रूस के एक बड़े उद्योगपति मिखाइल प्रोखोरोव को लगभग 7.9 फीसदी मत मिले.

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लोकतंत्र राजनेताओं के बिना नहीं चल सकता

किसी भी देश को चलाने के लिए लोकतंत्र सबसे अच्छी शासन प्रणाली है. यह सही है कि इस प्रणाली में भी कई ख़ामियां हैं, लेकिन यह सभी देशों में अलग-अलग तरह से उजागर होती है. दुर्भाग्यवश पिछले साठ सालों में हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का जितना विकास होना चाहिए था, उतना हुआ नहीं, बल्कि इसकी ख़ामियां ही ज़्यादा उजागर हुई हैं.

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चीन की सरकार डर गई है

वर्ष 2010-11 दुनिया के विभिन्न देशों में लोकतांत्रिक प्रणाली की समृद्धि के लिए हुई क्रांतियों का गवाह रहा है. इस दरम्यान न सिर्फ आंदोलनकारी चर्चा में रहे, बल्कि कथित तानाशाह शासक भी. चीन में भी लोकतंत्र की बहाली के लिए जमीन तैयार की जा रही है.

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आरटीआई से जुडी़ कुछ ज़रुरी बातें

भारत एक लोकतांत्रिक देश है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम आदमी ही देश का असली मालिक होता है. इसलिए मालिक होने के नाते जनता को यह जानने का हक़ है कि जो सरकार उसकी सेवा के लिए बनाई गई है

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वामपंथियों का लोकतांत्रिक स्टालिनवाद

इस बात पर कोई बाजी नहीं लगाई गई कि पश्चिम बंगाल में मिली बुरी हार के बाद सीपीएम के कितने नेता इसकी ज़िम्मेदारी लेंगे और इस्ती़फा देंगे. ज़ाहिर है, कम्युनिस्ट पार्टी इस तरीक़े से काम भी नहीं करती. भारत में कम्युनिस्ट पार्टी का अस्तित्व थोड़ा दूसरे ढंग का है. यहां के कम्युनिस्टों ने लोकतांत्रिक पद्धति को स्वीकारा, जबकि दुनिया में कहीं भी कम्युनिस्टों ने इस प्रक्रिया को नहीं स्वीकारा, लेकिन जब बात पार्टी के आंतरिक संगठन की आती है तो वहां स्टालिनवाद का ही शासन दिखता है.

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नेपालः हर घर में राजशाही की चर्चा

एकीकृत नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के अध्यक्ष पुष्प दहल प्रचंड के साथ एक गोपनीय समझौते के फलस्वरूप नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी एकीकृत मॉर्क्सवाद-लेनिनवाद (माले) के अध्यक्ष झालानाथ खनाल प्रधानमंत्री तो बन गए, लेकिन देश का संविधान बनाने की दिशा में आज तक कोई सार्थक पहल नहीं हो सकी है.

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टोनी ब्‍लेयर की जर्नी

टोनी ब्लेयर ब्रिटेन के पहले ऐसे राजनेता थे, जो बग़ैर किसी सरकारी अनुभव के सीधे प्रधानमंत्री के पद पर आसीन हुए थे. वह ब्रिटेन के लंबे लोकतांत्रिक इतिहास के दूसरे प्रधानमंत्री थे, जिनके नेतृत्व में पार्टी ने आम चुनाव में लगातार तीसरी बार जीत हासिल की थी. इसके पहले यह गौरव स़िर्फ मारग्रेट थैचर को मिला था. विश्व युद्ध के बाद लेबर पार्टी के नौ नेताओं में स़िर्फ तीन ने आम चुनाव में जीत हासिल की, उनमें से भी टोनी ब्लेयर एक हैं.

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बीटी बैगन पर रोक के वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक पहलू

बीटी बैगन के इस्तेमाल पर पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने फिलहाल रोक की घोषणा की तो मीडिया में उसके ख़िला़फ आलोचनाओं का अंबार लग गया. कई लोगों ने तर्क दिए कि ऐसे फैसले वैज्ञानिकों के लिए छोड़ दिए जाने चाहिए. लेकिन यह मामला विज्ञान और विज्ञान विरोध का नहीं है.

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जनसंघर्ष मोर्चा देगा राजनीतिक विकल्प

जनसंघर्ष मोर्चा देश की लोकतांत्रिक और बदलाव चाहने वाली ताक़तों का राष्ट्रीय मंच है. इसमें समाजवादी, दलित, आदिवासी-वनवासी और वामपंथी आंदोलन से जुड़ी ताक़तें शामिल हैं. इसका सबसे प्रमुख आंदोलन है, दाम बांधो-काम दो अभियान.

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