Editor’s Take संतोष भारतीय के साथ, मोदी सरकार को क्यों लग रहा है लोकपाल से डर

नई दिल्ली (ब्यूरो, चौथी दुनिया)।  लोकपाल बिल पास हुए लंबा समय बीत चुका है. लेकिन मोदी सरकार लोकपाल नियुक्त करने

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मनीष सिसोदिया ने अन्ना हजारे को बताया बीजेपी का एजेंट !

नई दिल्ली (ब्यूरो, चौथी दुनिया)। दिल्ली नगर निगम में मिली हार के बाद आम आदमी पार्टी में भारी मतभेद दिखाई

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पारदर्शिता की पक्षधर नहीं है सरकार

सूचना का अधिकार क़ानून 2005 में लागू हुआ. इस क़ानून ने पिछले 8 सालों से लोगों में एक नई आशा, एक नई उम्मीद जगाने का

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यह सरकार भ्रष्ट है

समाजसेवी अन्ना अपनी जनतंत्र यात्रा के क्रम में 13 जुलाई को शाहग़ढ और धुबरा पहुंचे. भारी संख्या में लोग गांधीवादी

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भ्रष्टाचार का समूल नाश ज़रूरी

देश में नीचे से लेकर ऊपर तक व्याप्त भ्रष्टाचार के चलते आम जनता परेशान है. ऐसा क्यों है और इसे

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देश को विजेता का इंतजार है

अगस्त का महीना भारतीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण रहा. सरकार, विपक्ष, अन्ना हजारे और बाबा रामदेव इस महीने के मुख्य पात्र थे. एक पांचवां पात्र भी था, जिसका ज़िक्र हम बाद में करेंगे. इन चार पात्रों ने अपनी भूमिका ब़खूबी निभाई. सरकार और विपक्ष ने अपनी पीठ ठोंकी, दूसरी ओर अन्ना और रामदेव ने अपने आंदोलन को सफल कहा. हक़ीक़त यह है कि ये चारों ही न हारे हैं, न जीते हैं, बल्कि एक अंधेरी भूलभुलैया में घुस गए हैं.

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अन्‍ना की हार या जीत

अन्ना हजारे ने जैसे ही अनशन समाप्त करने की घोषणा की, वैसे ही लगा कि बहुत सारे लोगों की एक अतृप्त इच्छा पूरी नहीं हुई. इसकी वजह से मीडिया के एक बहुत बड़े हिस्से और राजनीतिक दलों में एक भूचाल सा आ गया. मीडिया में कहा जाने लगा, एक आंदोलन की मौत. सोलह महीने का आंदोलन, जो राजनीति में बदल गया. हम क्रांति चाहते थे, राजनीति नहीं जैसी बातें देश के सामने मज़बूती के साथ लाई जाने लगीं.

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टीम अन्ना का अनशन : मुद्दे से भटकाव है या मार्ग से

टीम अन्ना एक बार फिर अनशन करने जा रही है. खास बात यह कि इस बार अन्ना हजारे अनशन नहीं करेंगे, बल्कि उनकी जगह अरविंद केजरीवाल 25 जुलाई से जंतर-मंतर पर अनशन करेंगे. लेकिन इस बार मुद्दा मज़बूत लोकपाल की मांग की जगह केंद्र सरकार में शामिल एक दर्जन से ज़्यादा भ्रष्ट मंत्रियों के खिला़फ कार्रवाई की मांग है. टीम अन्ना के मुताबिक़, इन भ्रष्ट मंत्रियों के खिला़फ जल्द से जल्द जांच होनी चाहिए और इसके लिए एक विशेष जांच दल का गठन किया जाना चाहिए.

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फैसले न लेने की कीमत

मनमोहन सिंह की बुनियादी समस्या यह है कि वह खुद फैसले नहीं लेना चाहते, लेकिन प्रधानमंत्री हैं तो फैसले तो लेने ही थे. जब उनके पास फाइलें जाने लगीं तो उन्होंने सोचा कि वह क्यों फैसले लें, इसलिए उन्होंने मंत्रियों का समूह बनाना शुरू किया, जिसे जीओएम (मंत्री समूह) कहा गया. सरकार ने जितने जीओएम बनाए, उनमें दो तिहाई से ज़्यादा के अध्यक्ष उन्होंने प्रणब मुखर्जी को बनाया.

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आंदोलन जारी है…

कभी पास, कभी दूर. टीम अन्ना और रामदेव के बीच का रिश्ता कुछ ऐसा ही है. टीम अन्ना बार-बार रामदेव के साथ मिलकर आंदोलन चलाने की बात से इंकार करती रही है, लेकिन इस बार जब अन्ना हजारे ने यह घोषणा कर दी कि वह 3 जून को दिल्ली में बाबा रामदेव के साथ होंगे तो चाहकर भी टीम अन्ना के सदस्य इसका विरोध नहीं कर पाए.

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सेना के आंतरिक कार्यक्षेत्र में अनाधिकृत हस्‍तक्षेप

जिस तरह सेना के नेतृत्व में भ्रष्ट बैंकों, वित्तीय संस्थानों और उद्योगों की साझेदारी से ऊर्जा और अन्य कंपनियों के हितों के लिए अमेरिकी मीडिया व्यवसायिक घरानों का मुखपत्र बन गई थी, उसी तरह भारत में भी व्यवसायिक समूहों के स्वामित्व वाले टीवी चैनलों में नीरा राडिया टेप के केस के दौरान टीवी एंकर कॉर्पोरेट घरानों का रु़ख लोगों के सामने रख रहे थे.

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इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शनः अन्‍ना चर्चा समूह, सवाल देश की सुरक्षा का है, फिर भी चुप रहेंगे? अन्‍ना हजारे ने प्रधानमंत्री से मांगा जवाब…

आदरणीय डॉ. मनमोहन सिंह जी,

पिछले कुछ महीनों की घटनाओं ने भारत की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर देश की जनता को का़फी चिंतित किया है. लेकिन अधिक चिंता का विषय यह है कि क्या इतनी चिंताजनक घटनाएं हो जाने के बावजूद कुछ सुधार होगा? अभी तक की भारत सरकार की कार्रवाई से ऐसा लगता नहीं कि कुछ सुधरेगा.

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इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शन : अन्ना चर्चा समूह, सरकार के दस धोखे

पिछले एक साल से अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के ख़िला़फ आंदोलन चल रहा है. जिस संख्या में अगस्त महीने में लोग सड़कों पर उतरे और सरकार ने बार-बार आश्वासन दिया कि शीत सत्र में हम एक सख्त लोकपाल क़ानून संसद में लाएंगे, उससे पूरी उम्मीद थी कि सरकार एक सख्त क़ानून संसद में ज़रूर पेश करेगी. हमें उम्मीद थी कि सरकार हमारी 100 प्रतिशत बातें न मानें, लेकिन कम से कम 50 प्रतिशत बातें तो मान ही लेगी, लेकिन सरकार ने जो क़ानून संसद में रखा है, वह इतना ख़तरनाक है कि 50 प्रतिशत बातें मानना तो दूर, वह आज की एंटी करप्शन व्यवस्था को भी ख़त्म कर देता है. ऐसा लगता है कि अब लड़ाई बहुत लंबी है. शायद सरकार जल्दी यह क़ानून पारित नहीं करेगी.

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इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शनः अन्ना चर्चा समूह सरकारी लोकपाल कैसे धोखा है

सरकार ने जान बूझ कर लोगों में यह ग़लत़फहमी पैदा की है. पहली बात तो यह है कि लोकपाल बिल अभी संसद में पारित नहीं हुआ है. अभी केवल लोकसभा में पारित हुआ है, राज्य सभा में अभी भी विचाराधीन है.

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अन्ना आंदोलन का अगला चरण

अन्ना के नेतृत्व में पूरा देश भ्रष्टाचार के ख़िला़फ सड़क पर उतरा. एक ही मांग थी, जन लोकपाल बिल भ्रष्टाचार के खिला़फ एक सख्त क़ानून बने, ताकि भ्रष्टाचार करने वालों को सज़ा मिले, उनके मन में डर पैदा हो. क्या जनता की मांग नाजायज़ थी?

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पत्रकार की नज़र में आंदोलन

काफी लंबे समय के बाद भारतीय समाज में एक ऐसा आंदोलन देखने को मिला, जिसके समर्थन में जनता स्वत:स्फूर्त तरीक़े से सामने आई. जनता के समर्थन से होने वाले इस आंदोलन ने सरकार की नींद उड़ा दी. अगर हम भारतीय राजनीतिक परिदृश्य पर नज़र डालते हैं तो जय प्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति के आंदोलन के बाद यह पहला बड़ा आंदोलन था, जिसे देशव्यापी जनसमर्थन मिला.

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लोक स्‍वराजः टीम अन्‍ना का नया आंदोलन

समय सीमा 2014. इससे पहले टीम अन्ना एक नया आंदोलन शुरू करेगी, नाम होगा लोक स्वराज. काग़ज़ी तैयारी हो चुकी है, ज़मीनी तैयारी भी लगभग शुरू हो गई है. इंतज़ार है तो स़िर्फ विधानसभा चुनाव ख़त्म होने का. इसके बाद फिर एक बिल आएगा. फिर से आंदोलन होगा. फिर से एक मांग होगी. आख़िर क्या है नया मुद्दा, कैसे शुरू होगा नया आंदोलन और क्या है एजेंडा? पेश है चौथी दुनिया की यह ख़ास रिपोर्ट…

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दो खुदकुशी और एक क़त्ल

नए साल की समाप्ति का रास्ता क्या है. हम शुरू करते हैं अन्ना हजारे के अनशन और जेल भरो आंदोलन की धमकी से, जिसके बारे में 27 दिसंबर की दोपहर के बाद पता चल गया था कि उनका यह आंदोलन मुंबई में असफल रहा. दिल्ली की बात कुछ और है. यह ऐसा शहर है, जहां राजनीति का प्रभाव है, शक्ति का केंद्र है, लेकिन मुंबई में ऐसा नहीं है.

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सरकारी लोकपाल बिल : यह अंधा क़ानून है

पांच जून, 1975 को पटना के गांधी मैदान में लालू प्रसाद यादव ने कहा था कि इस संसद को आग लगा दो. अगले दिन अ़खबारों ने उनके इसी वाक्य को इस समाचार का शीर्षक बनाया. लालू यादव उस व़क्त छात्रनेता थे, युवा थे और जयप्रकाश जी के आंदोलन के महत्वपूर्ण आंदोलनकारी थे. 29 दिसंबर, 2011 को लालू यादव सचमुच संसद को आग लगाने का काम कर रहे थे.

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ख़त्म होता नक्सलियों का ख़ौ़फ

जन लोकपाल बिल पर सरकार और टीम अन्ना के बीच जारी बवाल, रिटेल में विदेशी निवेश पर सरकार, उसके सहयोगी दलों एवं विपक्ष के बीच मचे घमासान और गृहमंत्री चिदंबरम पर एक के बाद एक लग रहे आरोपों के बीच देश में कई अहम खबरें गुम सी हो गईं.

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लोकपाल के नाम पर धोखाः कहां गया संसद का सेंस ऑफ हाउस

इस बार दिल्ली की जगह मुंबई में अन्ना का अनशन होगा. जंतर-मंतर और रामलीला मैदान से गिरफ्तारियां दी जाएंगी. इसकी घोषणा टीम अन्ना ने कर दी है. आख़िरकार, वही हुआ, जिसकी आशंका चौथी दुनिया लगातार ज़ाहिर कर रहा था. अगस्त का अनशन ख़त्म होते ही चौथी दुनिया ने बताया था कि देश की जनता के साथ धोखा हुआ है.

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यूआईडीः नागरिकों के मूल अधिकारों के साथ खिलवाड़

जब लोकपाल बिल को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर अन्ना हज़ारे का एक दिवसीय अनशन शुरू हुआ तो उन्होंने सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को जनलोकपाल बिल पर बहस करने की दावत दी, लेकिन सांसदों ने यह कहकर हंगामा खड़ा कर दिया कि इस बिल पर चर्चा करने का अधिकार केवल संसद को है, सड़क पर चर्चा नहीं होनी चाहिए. क्या सरकार और हमारे नेता इस बात का जवाब दे सकते हैं कि जब संसद की स्टैंडिंग कमेटी ने यूआईडीएआई के चेयरमैन नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में जारी आधार स्कीम पर सवालिया निशान लगाते हुए उसे ख़ारिज करके सरकार से उस पर दोबारा ग़ौर करने के लिए कहा है तो फिर क्यों अभी तक यह कार्ड बनने का सिलसिला जारी है.

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नई संसद लोकपाल बिल पास करे

एक बार फिर लोकपाल विधेयक को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं. मानों यह एक पहेली बन गया हो. पहले सरकार को खुदरा बाज़ार में एफडीआई पर पीछे लौटना पड़ा और अब लगता है कि उसे पेंशन और कंपनी बिल के मामलों में भी ऐसा ही करना पड़ेगा. ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ख़ुद अपने ही निर्णय में उलझ गई हो, कैद हो गई हो.

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व़क्त की नज़ाकत को समझने की ज़रूरत

अक्सर यह माना जाता है कि नियम बनाए जाते हैं और बनाते समय ही उसे तोड़ने के रास्ते भी बन जाते हैं. क़ानून बनाए जाते हैं और उनसे बचने का रास्ता भी उन्हीं में छोड़ दिया जाता है तथा इसी का सहारा लेकर अदालतों में वकील अपने मुल्जिम को छुड़ा ले जाते हैं. शायद इसीलिए बहुत सारे मामलों में देखा गया है कि अपराधी बाहर घूमते हैं, जबकि बेगुनाह अंदर होते हैं.

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टीम अन्ना : अब वालंटियर्स सरकार के निशाने पर हैं

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. अन्ना हजारे ने कहा है कि वह इन पांच राज्यों का दौरा करेंगे और मज़बूत लोकपाल बिल नहीं आया तो कांग्रेस के ख़िला़फ प्रचार भी करेंगे.

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अन्ना का तीसरा अनशन : कांग्रेस की रणनीति का जवाब है

अन्ना का आंदोलन अब अपने आख़िरी पड़ाव पर आता दिख रहा है. दो स्थितियां बनती हैं. पहली यह कि सरकार अगर एक मज़बूत जन लोकपाल क़ानून लेकर आती है तो अन्ना का आंदोलन फिजल आउट कर जाएगा.

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एक आदर्श लोकपाल बिल चाहिए

कई महीनों से भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए कड़े क़दम उठाने की आवश्यकता बड़ी शिद्दत से महसूस की जा रही है. यूं तो भ्रष्टाचार कोई नई घटना नहीं है, लेकिन 1991 के बाद जबसे नई आर्थिक नीति लागू हुई है, भ्रष्टाचार का स्तर का़फी बढ़ गया है, जिसे बर्दाश्त करना मुश्किल हो रहा है.

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टीम अन्ना में आंतरिक लोकतंत्र नहीं है

टीम अन्ना हमेशा कहती रही है कि वह जन लोकपाल की राजनीति कर रही है और राजनीतिक दल चुनावी राजनीति कर रहे हैं. अब जबकि राजनीति हो रही है, भले ही जन लोकपाल के लिए, तब इस बात की ज़रूरत बढ़ जाती है कि टीम अन्ना उस तर्ज पर राजनीति न करे

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राहुल जी, यह वक्‍त बहुत महत्‍वपूर्ण है

अन्ना हजारे का आंदोलन सारे देश की चेतना को उभार रहा था. गली-गली, मैदान-मैदान, हर जगह आंदोलन हो रहे थे. ऐसे समय में संसद के ऊपर ज़िम्मेदारी थी कि वह कोई हल निकाले, लेकिन संसद अन्ना हजारे के आंदोलन के खिला़फ खड़ी नज़र आई. उस समय यह ज़रूर लग रहा था कि अगर सोनिया गांधी यहां होतीं तो वह शायद कोई हल निकालने में पहल कर पातीं.

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हाथी, चूहा और कांग्रेस

हाथी जंगल का राजा था. उसका वजन एक टन और लंबाई 15 फीट थी. जंगल के अन्य जानवरों को उसकी बात माननी पड़ती थी. वह जंगल में उपद्रव करता और जो दिखाई पड़ता, उसे नष्ट कर देता था. वह एक चूहे के सामने आया.

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