अपनी-अपनी ताक़त दिखाने में लगे रालोसपा के दोनों गुट

बदले राजनीतिक परिदृश्य में बिहार के सभी दलों और नेताओं की राजनीति-रणनीति बदल गई है. 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव

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बिहार की राजनीति में वंशवाद का ज़हर

लालू  यादव और रामविलास पासवान बिहार की राजनीति में वंशवाद का जहर मिलाने पर अ़डे हैं. पासवान के बेटे चिराग

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बिहार : युवाओं की सेना सज गई

राजनीतिक प्रयोग की धरती बिहार में पिछले दिनों एक नया प्रयोग हुआ. भले ही इस प्रयोग को अभी ज़मीनी चुनौतियों से गुज़रना है, पर इस अनूठी पहल ने यह सा़फ कर दिया कि सूबे का युवा नेतृत्व अब आर-पार की लड़ाई के मूड में आ चुका है और वह युवाओं को उनका हक़ दिलाने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता है.

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पूर्णिया उपचुनावः विपक्ष का गुरूर चकनाचूर

पूर्णिया उपचुनाव में विपक्ष के नेताओं ने यह साबित कर दिया कि वे सुधरने वाले नहीं हैं. विधानसभा चुनाव में पस्त हो चुके लालू प्रसाद एवं राम विलास पासवान का अहंकार उन्हें अगर आने वाले समय में राजनीतिक हाशिए पर डाल दे तो कोई हैरानगी की बात नहीं होगी, क्योंकि लगता है, उन्होंने आपस में ही लड़ने की कसम खा ली है.

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शांति और विकास की चाहत ने जीत दिलाई

गया ज़िले के दस विधानसभा क्षेत्रों के परिणामों ने सभी को दंग कर दिया. ज़िले में राजद-लोजपा गठबंधन और कांगे्रस की हालत इतनी खराब होगी, इसका अंदाज़ा किसी को नहीं था. अमन और विकास की हवा ऐसी चली कि जदयू-भाजपा को दस में से नौ सीटें मिल गईं. अब तो यही कहा जा सकता है कि नक्सलवाद से त्रस्त और विकास से मरहूम लोगों ने विकास की आस में जनादेश दिया है.

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पारस की बंध गई पोटली

खगड़िया ज़िले के बेहद पिछड़े विधानसभा क्षेत्र अलौली में अंतत: 33 वर्षों के बाद लोजपा प्रदेश अध्यक्ष पशुपति कुमार पारस की पोटली बंध ही गई. लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान के अनुज पारस ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि जनता उन्हें सिर आंखों पर बिठाने के बजाए ज़मीन पर पटक देगी. दरअसल हार से बचने के लिए उन्होंने अपने चहेते रामचंद्रा सदा को जदयू का टिकट यह सोचकर दिलवाया था कि उन्हें मुसहर समाज के तीन-तीन प्रत्याशियों के खड़े रहने से जीतने में मदद मिलेगी. हुआ उल्टा. महादलित समाज के लोगों ने एकजुट होकर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया.

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निशाना चूक गया

विकास की लाख रट लगाने के बावजूद शुरू के दो चरणों के मतदान में विकास चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया. जाति के आधार पर होने वाले बिहार के चुनावों की दिशा बदलने के लिए नीतीश कुमार का इस तरफ किया गया कोई भी प्रयास रंग नहीं ला सका. यहां तक की मीडिया के नीतीशीकरण का भी प्रभाव वोटरों पर नहीं पड़ा और बिहार में जातीय ताने-बाने के बीच स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवारों की अपनी छवि के घेरे में वोट पड़े.

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सीमांचलः बागी पलट सकते हैं बाजी

कहा जाता है कि राजनीति अनिश्चितताओं का खेल है. कब कौन नेता पाला बदल ले या किसी से हाथ मिला ले, इसकी गारंटी कोई नहीं ले सकता. कभी सीमांचल की राजनीति में राजद के अगुवा एवं लालू के प्रबल सहयोगी रहे तस्लीमुद्दीन आज नीतीश के साथ हैं और अपने प्रभाव से पुत्र समेत कई समर्थकों को टिकट दिलाने में कामयाब रहे हैं.

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मगधः घात-प्रतिघात का दौर

महत्वाकांक्षी नेताओं की बढ़ती फौज और कार्यकर्ताओं की घटती संख्या हर राजनीतिक दल के लिए चिंता का विषय बन गई है. चुनाव आते ही हर नेता की नज़र स़िर्फ टिकट पर रहती है. अपने दल का टिकट न मिलने पर वे दल बदलने में पल भर की देर नहीं लगाते.

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खगडि़याः जनता जवाब मांगने के लिए तैयार

बाढ़, कटाव, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और सिंचाई जैसी समस्याओं से आजिज़ खगड़िया की जनता इस बार प्रत्याशियों की चिकनी चुपड़ी बातों में फंसने से परहेज कर रही है. निवर्तमान विधायकों से पाई-पाई का हिसाब मांगने को जनता बेताब है. अन्य पार्टी प्रत्याशियों से उनकी बातों पर विश्वास करने का ठोस प्रमाण मांग रही है.

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राहुल को घेरेंगे तेजस्‍वी और चिराग

बिहार विधानसभा के चुनाव में राहुल फैक्टर की बात तो पहले से हो रही थी, पर चुनावी शंखनाद के बाद इसके तेज होते असर ने नीतीश, लालू एवं पासवान जैसे दिग्गजों की नींद उड़ा दी है. राहुल गांधी युवाओं से बार-बार अपील कर रहे हैं कि चुनिए उन्हें, जिन्हें देश ने चुना है. राहुल की सभाओं में युवाओं की बढ़ती भागीदारी यह महसूस करा रही है कि सूबे के युवा वोटरों के मन में क्या चल रहा है.

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चुनावी तड़काः पियरलेस एजेंट से बने मुख्यमंत्री

राजनीति में कौन कहां कब पहुंच जाए, कहा नहीं जा सकता. इसका प्रत्यक्ष उदाहरण नीतीश कुमार हैं, जो पियरलेस की एजेंटी करते-करते मुख्यमंत्री बन गए. इस बात का खुलासा उनके पुराने मित्र एवं राजद नेता राम बिहारी सिंह ने किया. नीतीश का दामन छोड़ लालू का दामन थामने के बाद राम बिहारी ने कहा कि एक ज़माने में हम और नीतीश सत्तू पीकर सोते थे और साथ में पियरलेस की एजेंटी भी करते थे.

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चुनावी तड़काः लेने के देने न पड़ जाएं

राजद को अलविदा कह नीतीश का तीर थामने वाले दलसिंह सराय के विधायक रामलखन महतो की परेशानी कम होने का नाम नहीं ले रही है. उनकी सीट नए परिसीमन में समाप्त हो जाने से उन्हें बगल के नवगठित उजियारपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ना है. उजियारपुर से टिकट मिलने की गारंटी के बाद ही उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सभा में जदयू की सदस्यता ग्रहण की थी, लेकिन नए घर में उन्हें सुकून नहीं मिल रहा है.

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बिहार विधानसभा चुनावः सज गई सेना

बिहार में चुनावी महासंग्राम के लिए अपनी-अपनी सेनाओं को सजाने और उसे चमकाने का काम सभी दिग्गजों ने लगभग पूरा कर लिया है. चुनावी हथियारों से लैस करके सेना को मैदान-ए-जंग में कूदने की हरी झंडी चरणबद्ध तरीके से दिखाई जा रही है. जहां पेच फंस रहा है, उसे रतजगा करके सुलझाया जा रहा है, ताकि एक-एक पल का फायदा उठाया जा सके.

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चुनावी तड़काः एक पर एक फ्री का फंडा

पर्व के मौसम में बाज़ार का फंडा राजनीति में भी लागू हो रहा है. हो भी क्यों न, चुनाव भी तो एक पर्व है. निर्दलीय विधायक विजेंद्र चौधरी इसे अच्छी तरह समझ गए. राज्यसभा में रामविलास पासवान को वोट क्या दिया, उन्हें बाज़ार का नियम भी समझा दिया.

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हम भी हैं जोश में

चुनावी सरगर्मी तेज़ होते ही सभी दल जीत की आस लिए मैदान में कूद पड़े हैं. हर दल खुद को सबसे बेहतर बताने की कोशिश में जुटा है. दिलचस्प बात यह है कि चुनावी तैयारी में युवा बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं यानी युवाओं की भागीदारी काफी मजबूत है. सभी दलों ने इस बार युवाओं को अधिक महत्व दिया.

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चुनावी तड़काः निर्दलीय उम्मीदवारों का रिकॉर्ड बनेगा

इन दिनों ज़्यादातर नए नेता बग़ावती तेवर अपना रहे हैं. कारण पूछने पर कहते हैं कि बड़े नेता तो बात सुनने के लिए तैयार ही नहीं हैं. क्षेत्र से दल बल के साथ आए नेताजी पटना में डेरा जमाए टिकट के लिए बड़े नेताओं की चिरौरी में दिन गुज़ार रहे हैं.

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चुनावी तड़काः राबड़ी देवी अखाड़े में नहीं उतरेंगी

तय रणनीति के तहत अब यह सा़फ होने लगा है कि राबड़ी देवी इस बार चुनाव नहीं लड़ेंगी. हां, इतना ज़रूर है कि कुछ खास क्षेत्रों में वह रामविलास पासवान के साथ चुनाव प्रचार में जा सकती हैं. पिछली बार राबड़ी देवी राघोपुर में जदयू प्रत्याशी सतीश कुमार के साथ कड़े मुक़ाबले में फंस गई थी.

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पंजे पर मेहरबान भूमिहार छत्रप

हर प्रमुख दल में आग लगी है. किसी दल में आग दावानल के रूप में सामने नज़र आ रही है तो कहीं यह फिलहाल चिंगारी की शक्ल में ही है. जदयू, राजद और लोजपा में कद्दावर भूमिहार नेताओं के बग़ावती तेवर और विद्रोही सुर ने दलीय आकाओं के माथे पर बरसात के मौसम में भी पसीने की बूंदें छलका दी हैं.

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लालू और पासवान भी दौड़ में

चुनाव लड़ने और जीतने की रणनीति पर तो इन दिनों दिन-रात काम चल ही रहा है, पर चुनाव बाद की संभावित परिस्थितियों पर भी सभी दलों के महारथी माथा खपा रहे हैं. वजह, सभी दलों का यह प्रारंभिक आकलन है कि किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने वाला.

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बिहार विधानसभा चुनाव: सीट बंटवारे पर मगजमारी

पहले दौर में जनता का मिजाज़ भांपने के बाद सभी राजनीतिक दल इन दिनों सीट बंटवारे के लिए मगज़मारी में जुटे हैं. जदयू भाजपा के साथ तो राजद लोजपा के साथ शांतिपूर्वक एवं सम्मानजनक तरीक़े से सीटों के बंटवारे में लगा है.

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दंगल के लिए तैयार दिग्‍गज

बिहार के राजनीतिक क्षितिज पर चुनावी बादल मंडराने लगे हैं, तो राजनीति का गढ़ रहा सिकंदरा विधानसभा क्षेत्र इसमें पीछे कैसे रह सकता है. तमाम पार्टियों के नेता आसन्न चुनावी दंगल के लिए अपनी-अपनी कमर कसने लग गए हैं, लेकिन संकट की बात यह है कि लगभग सभी पार्टियां एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वियों से कम, आंतरिक खेमेबाज़ियों से ज़्यादा त्रस्त हैं.

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समाजवादियों के गढ़ में होगी कांटे की टक्कर

सरायरंजन विधानसभा क्षेत्र इन दिनों चुनावी बुखार में तपने लगा है. पुराने चेहरों के साथ कई नए चेहरों की फौज जनता की अदालत में गुहार लगाते घूम रही है. सरायरंजन विधानसभा क्षेत्र शुरू से ही समाजवादियों के गढ़ के रूप में जाना जाता है, जहां से समाजवादी नेता स्व. रामविलास मिश्र, रामाश्रय साहनी एवं रामचंद्र सिंह निशाद चुनाव जीतते रहे हैं.

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लोजपा-राजद गठबंधन की होगी अग्नि परीक्षा

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की कर्मभूमि और जदयू के मज़बूत गढ़ मोकामा में सेंध लगाने के लिए विपक्षी दलों ने कमर कसनी शुरू कर दी है. राजद-लोजपा गठबंधन के बाद कांग्रेस भी चुनावी अखाड़े में दाव पेंच में माहिर खिलाड़ी को उतारने की तैयारी कर रही है. बात यदि संभावित प्रत्याशियों की करें तो कुछ अप्रत्याशित दावेदार के नाम भी सामने आ रहे हैं.

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मतदाता दूसरी बार एकमा का इतिहास लिखेंगे

नवसृजित एकमा विधानसभा क्षेत्र में आगामी चुनाव को लेकर दावेदारों के बीच घमासान की स्थिति कायम है. समाजवादी राजनीति के मजबूत गढ़ के रूप में कभी सारण प्रमंडल में शुमार मांझी विधानसभा क्षेत्र का एकमा महत्वपूर्ण अंग माना जाता था. नए परिसीमन के बाद एकमा का अलग अस्तित्व कायम हुआ. एकमा का अलग अस्तित्व कायम हो जाने से प्रतिनिधित्व को लेकर दलीय प्रतिबद्धता का अभाव दिखता है.

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घमासान

बात खत्म नहीं हुई, बल्कि अभी तो शुरू हुई है. मेरे खिला़फ लिखना मना है शीर्षक से छपी खबर के बाद सूबे का सियासी पारा अचानक काफी चढ़ गया है. नेताओं को यह यकीन ही नहीं हुआ कि बिहार में कोई अ़खबार इस तरह की खबरें छापने का साहस कर सकता है, लेकिन सच के सामने आते ही कोई बेचैन है तो कोई गला फाड़-फाड़कर कह रहा है कि देखो, मैं कहता था न कि सरकारी दबाव ने सच पर पहरा लगा दिया है,

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टिकट के लिए माथापच्ची

बायसी विधानसभा क्षेत्र में चुनावी सुगबुगाहट तेज़ हो गई है. टिकट लेने के लिए अभी से ही माथापच्ची शुरू हो चुकी है. इस होड़ में जीते हुए उम्मीदवार से लेकर हारने वाले उम्मीदवार तक शामिल हैं. इस क्षेत्र के विधायक रुकनुद्दीन के साथ-साथ पिछले विधानसभा चुनाव में पराजय का मुंह देखने वालों एवं चुनाव लड़ने की मंशा पालने वालों की बेचैनी बढ़ गई है.

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