संयुक्त सचिव के पदों पर विशेषज्ञों की भर्ती, संघ को सरकार में घुसाने की साजिश?

मजे की बात यह है कि इन पदों के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, मान्यता प्राप्त रिसर्च इंस्टिट्यूट्‌स, यूनिवर्सिटीज और

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कोचिला वन पर वन-माफिया की नज़र

पूर्वी चम्पारण जिले के लखौरा थानाक्षेत्र में स्थित बिहार का इकलौता ऐतिहासिक कोचिला वन इन दिनों अपने अस्तित्व को बचाने

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दिल्‍ली का बाबूः ईमानदारी की सजा

हरियाणा में भारतीय वन सेवा के अधिकारी संजीव चतुर्वेदी की समस्या बरकरार है. यह वही अधिकारी हैं, जिन्होंने राज्य के वन विभाग में हो रहे घोटालों का पर्दाफाश किया था. सरकार के रवैये से परेशान चतुर्वेदी ने केंद्र सरकार से यह आग्रह किया था कि उन्हें केंद्र में डेपुटेशन पर बुला लिया जाए, लेकिन उनका आग्रह नामंजूर कर दिया गया.

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वनों में प्रकाश की किरण

भारत में वनों पर निर्भर 250 मिलियन लोग दमनकारी साम्राज्यवादी वन संबंधी क़ानूनों के जारी रहने के कारण ऐतिहासिक दृष्टि से भारी अन्याय के शिकार होते रहे हैं और ये लोग देश में सबसे अधिक ग़रीब भी हैं. वन्य समुदायों के सशक्तीकरण के लिए पिछले 15 वर्षों में भारत में दो ऐतिहासिक क़ानून पारित किए गए हैं.

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बुंदेलखंडः फटती धरती, कांपते लोग

बुंदेलखंड में बेतरतीब ढंग से खनन और भूजल दोहन के चलते ख़तरे की घंटी बज चुकी है. हमीरपुर में सबसे अधिक 41 हज़ार 779 हेक्टेयर मीटर प्रतिवर्ष भूजल दोहन हो रहा है. महोबा, ललितपुर एवं चित्रकूट में खनन मा़फ़िया नियम-क़ायदों को तिलांजलि देकर पहाड़ के पहाड़ समतल भूमि में बदल रहे हैं.

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दिल्‍ली का बाबूः जयंती और जंगल में सुधार

वन एवं पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन को मंत्रालय संभाले अभी करीब दो महीने हुए हैं, लेकिन उन्होंने विभाग के भ्रष्ट बाबुओं के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी. उन्होंने इस बीच तीन वरिष्ठ वन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की. वन विभाग के महानिरीक्षक सी डी सिंह, जो वन सलाहकार समिति (एफएसी) में भी थे, का तबादला कर दिया गया.

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वनाधिकार कानून और महिलाएं

देश को आज़ादी मिलने के साठ साल बाद 2006 में वनाश्रित समुदाय के अधिकारों को मान्यता देने के लिए एक क़ानून पारित किया गया, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत निवासी (वनाधिकारों को मान्यता) क़ानून. यह क़ानून बेहद है. यह केवल वनाश्रित समुदाय के अधिकारों को ही मान्यता देने का नहीं, बल्कि देश के जंगलों एवं पर्यावरण को बचाने के लिए वनाश्रित समुदाय के योगदान को भी मान्यता देने का क़ानून है.

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पुलिस की तानाशाही और वन गुजरों की जीत

देश में वनाधिकार क़ानून लागू होने के बावजूद वन क्षेत्र में रहने वाले लोगों को उनके मूल स्थान से भगाने के प्रयास किए जाते रहते हैं, जिससेउन्हें का़फी परेशानी का सामना करना पड़ता है. पिछले दिनों ऐसा ही एक मामला सामने आया. राष्ट्रीय वन-जन श्रमजीवी मंच के वन गूजर नूर जमाल की गिरफ्तारी के विरोध में वन गूजरों और टांगिया गांव की महिलाओं ने बीते 29 जून को सहारनपुर की बेहट तहसील अंतर्गत आने वाले थाना बिहारीगढ़ का घेराव कर पुलिस को उसे बिना शर्त रिहा करने को मजबूर कर दिया.

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पास्‍को परियोजनाः राष्‍ट्रीय वन संपदा की खुली लूट

उड़ीसा के जगतसिंहपुर में 50 हज़ार करोड़ रुपये निवेश करने वाली दक्षिण कोरिया की कंपनी पोहंग स्टील (पास्को) के आगे केंद्र और राज्य सरकार ने अपने घुटने टेक दिए हैं. पल्ली सभा (ग्राम परिषद) के विरोध के बावजूद बीती 18 मई को पोलंग गांव में भूमि अधिग्रहण के लिए पुलिस भेज दी गई है. इससे नंदीग्राम और सिंगुर की तरह पोलंग में भी ख़ूनी संघर्ष का माहौल तैयार हो चुका है.

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कोस्का: खुद खोज ली जीवन की राह

देश भर के जंगली क्षेत्रों में स्व:शासन और वर्चस्व के सवाल पर वनवासियों और वन विभाग में छिड़ी जंग के बीच उड़ीसा में एक ऐसा गांव भी है, जिसने अपने हज़ारों हेक्टेयर जंगल को आबाद करके न स़िर्फ पर्यावरण और आजीविका को नई ज़िंदगी दी है, बल्कि वन विभाग और वन वैज्ञानिकों को चुनौती देकर सरकारों के सामने एक नज़ीर पेश की है.

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सूरमा देश का पहला वनग्राम बनाः अब बाघ और इंसान साथ रहेंगे

उत्तर प्रदेश के खीरी ज़िले का सूरमा वनग्राम देश का ऐसा पहला वनग्राम बन गया है, जिसके बाशिंदे थारू आदिवासियों ने पर्यावरण बचाने की जंग अभिजात्य वर्ग द्वारा स्थापित मानकों और अंग्रेज़ों द्वारा स्थापित वन विभाग से जीत ली है. बड़े शहरों में रहने वाले पर्यावरणविदों, वन्यजीव प्रेमियों, अभिजात्य वर्ग और वन विभाग का मानना है कि आदिवासियों के रहने से जंगलों का विनाश होता है, इसलिए उन्हें बेदख़ल कर दिया जाना चाहिए.

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सशर्त क्लियरेंस से नहीं थमेगा विनाश

यह बात कितनी महत्वपूर्ण है और इसकी फिक्र किसे है कि पिछले सत्र के दौरान भारतीय संसद ने एक अलग ही इतिहास रचा. पिछले सत्र के दौरान लोकसभा ने महज़ 7 घंटे ही काम किया. यह सब कुछ ऐसे समय के बाद हुआ, जब पर्यावरण और कृषि से जुड़े कुछ अत्यंत ही महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए थे.

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भारत की वन नीति में बदलाव आवश्यक

आज़ादी के बाद बनी भारतीय वन नीति की समीक्षा 1988 में की गई थी, लेकिन परिस्थितियों के अनुसार उसमें हेरफेर किए बिना यथावत उसे लागू कर दिया गया, जबकि 1975 में नेपाल द्वारा अपनाई गई वन नीति का भारतीय वनों पर प्राकृतिक एवं मानवजनित कारणों का विपरीत प्रभाव पड़ा है.

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औषधीय पौधों की तस्‍करी

प्राकृतिक वन संपदाओं से संपन्न पूर्वोत्तर के राज्यों में वन क़ानून की ढिलाई और प्रशासनिक व्यवस्था दुरुस्त न होने के कारण वन औषधि भंडारों का चीन सहित अन्य पड़ोसी देश दोहन कर रहे हैं. असम, अरुणाचल, मेघालय एवं मिजोरम सहित क्षेत्र के अन्य राज्यों में एक अंतरराष्ट्रीय गिरोह सक्रिय है, जो हर वर्ष 15 से 20 करोड़ रुपये मूल्य की औषधीय वनस्पतियों की तस्करी करता है.

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कार्बेट नेशनल पार्कः धनवानों की थाप पर नाच रहे हैं वनाधिकारी

विश्वप्रसिद्ध जिम कार्बेट नेशनल पार्क की सीमा पर बने होटल रिसार्ट में वन एवं वन्य क़ानून की तमाम पाबंदियों को तार-तार कर जंगल में मंगल मनाने वाले धनवानों का जमावड़ा लगा हुआ है. धनवानों के धन की थाप पर वनाधिकारी नाच रहे हैं, और यह सब कुछ इस नेशनल पार्क में क्र्रिसमस के दिन से न्यू ईयर तक होगा.

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गुलदारों की मौत का अंतहीन सिलसिला

देवभूमि उत्तराखंड सरकार की उपेक्षा एवं मानवीय दखल के कारण वन्य क्षेत्र गुलदारों के लिए कब्रगाह बनता जा रहा है. पिछले दिनों करंट लगने से दो गुलदारों की दर्दनाक मौत ने वन्यजीव प्रेमियों को एक बार फिर हिला कर रख दिया. राजधानी के वीरपुर सैन्य क्षेत्र में पेड़ के पास से गुजर रही विद्युत लाइन की चपेट में आने से एक गुलदार जोड़े ने दम तोड़ दिया.

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दिल्‍ली का बाबूः नया चेयरमैन नहीं मिला

राष्ट्रीय राजमार्गों पर आसानी से दिख जाने वाला गड्‌ढा राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की अंदरूनी हालत की असली तस्वीर पेश करता है. सरकार ने एनएचएआई के नए अध्यक्ष की तलाश में एक साल तक कोशिश की, लेकिन उपयुक्त उम्मीदवार न मिलता देख वह इसके मौजूदा अध्यक्ष ब्रजेश्वर सिंह को तीन महीने का सेवा विस्तार देने का फैसला लेने के लिए मजबूर हो गई.

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सरकारी अमला कर रहा है बाघों का शिकार

भारत में टाइगर स्टेट का दर्जा प्राप्त मध्य प्रदेश में बाघों की मौत का सिलसिला थम नहीं रहा हैं. खुले वनों में मौजूद बाघों का अवैध शिकार इस बुरी तरह हो रहा है कि अब कई वनक्षेत्र पूरी तरह से बाघ रहित हो चुके हैं, लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि सरकार द्वारा संरक्षित राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यप्राणी अभ्यारण्यों में भी बाघों की मौत आये दिन हो रही है.

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अपनी ही खनिज संपदा से बेखबर है सरकार

देश सरकार अपनी अमूल्य खनिज संपदा से इतनी बे़खबर है कि उसके पास जानकारी ही नहीं है कि राज्य के किस क्षेत्र में कहां और कितना खनिज भूगर्भ में मौजूद है, लेकिन राज्य का खनिज माफिया सरकार से ज़्यादा बा़खबर और जागरूक है. इसीलिए उसे मालूम है कि किस क्षेत्र से किस खनिज की कितनी चोरी आसानी से की जा सकती है.

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बांस न मिलने से रोटी को तरसे बसोड़

मध्य प्रदेश के वन विभाग की अदूरदर्शिता के कारण राज्य के लाखों बसोड़ या वंसकार (बांस का सामान बनाने वाले) बेरोज़गारी की पीड़ा झेल रहे हैं. राज्य सरकार बांस व्यापार को बढ़ावा देने और वन विभाग की राजस्व आय बढ़ाने के लिए बांस का निर्यात कर रही है और बांस का सामान बनाने वाले कारखानों को बड़ी मात्रा में बांस बेच रही है,

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दिल्‍ली का बाबूः सीसीआई ने कसी कमर

कंपटीशन कमीशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) के गठन को एक साल से ज़्यादा समय गुज़र चुका है, लेकिन किसी भी विचाराधीन मामले पर वह अब तक अपना फैसला नहीं दे पाया है. आलोचनाओं के बढ़ते शोर के बीच हालांकि ऐसा लगता है कि सीसीआई अब कमर कस रहा है.

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वनाधिकार मान्‍यता कानून का दुरूपयोग

वनाधिकार मान्यता क़ानून के अब तक के क्रियान्वयन के अनुभव बताते हैं कि अब भी आदिवासियों और वनों में रहने वाले कबिलाई लोगों को अन्याय से मुक्ति दिलाने की कोशिशें हो रही हैं. विगत डेढ़ सौ सालों में सरकार ने वन विभाग को जंगलों का मालिक बनाने की पुरज़ोर कोशिशें की, परंतु उनकी खिला़फत होती रही.

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कभी नहीं से देर भली

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि वन और पर्यावरण मंत्रालय के अंतर्गत वन एवं वन्य जीवों और पर्यावरण मामलों के लिए अलग-अलग विभाग होंगे. मौजूदा व्यवस्था में पर्यावरण मंत्रालय के अधीन वन्यजीवों के लिए एक अलग शाखा है, जिसके मुखिया पर्यावरण सचिव विजय शर्मा हैं.

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वन विभाग में जंगलराज

मध्य प्रदेश के शासन-प्रशासन में अराजकता और भ्रष्टाचार का बोलबाला है. ऐसे में यदि वन विभाग में जंगलराज चल रहा है तो यह आश्चर्य का विषय नहीं है, क्योंकि जंगलराज हमारी प्रशासनिक संस्कृति की विशेषता बन चुका है. मध्य प्रदेश कभी हरे-भरे वनों से आच्छादित सुरम्य प्राकृतिक दृश्यों से शोभायमान हुआ करता था, लेकिन अब तो हरियाली केवल सरकारी विज्ञापनों में ही दिखाई देती है.

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सार-संक्षेप

केंद्र एवं प्रदेश सरकार द्वारा शिक्षा में गुणात्मक सुधार और उसे रोचक बनाने के प्रयास में अरबों रुपए ख़र्च करने के बाद भी राज्य में सैटेलाईट के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा (एडूसेट) की योजना पूरी तरह नाकाम हो गई है. इस योजना को सर्वप्रथम पायलट प्रोजेक्ट के रूप में सीधी ज़िले में, तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने प्रारंभ किया था.

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फार्मूला- वन ट्रैक पर नया भारतीय नाम – करूण चंडोक

छब्बीस साल का करुण चंडोक फार्मूला-वन रेसिंग ट्रैक पर नया भारतीय नाम है. बहरीन ग्रैंड प्रिक्स में हिस्पेनिया रेसिंग टीम के लिए ट्रैक पर उतर कर उन्होंने भारत की उन उम्मीदों को एक बार फिर हवा दे दी है, जिसे आज से करीब पांच साल पहले नारायण कार्तिकेयन ने जन्म दिया था. हालांकि, बहरीन में अपने पहले फार्मूला-1 रेस में चंडोक कुछ खास नहीं कर पाए.

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जीवाश्‍मों की अवैध तस्‍करी

मध्य प्रदेश के धार ज़िले में यत्र-तत्र उपलब्ध साढ़े छह करोड़ वर्ष पुराने जुरासिक काल के जीवाश्मों की बड़े पैमाने पर तस्करी हो रही है. धार ज़िले में डायनासोर जीव के अंडे और कंकाल कई बार मिल चुके हैं. इस वजह से देश-विदेश के पुराजीव वैज्ञानिकों और जीवाश्म शोधकर्ताओं की इस क्षेत्र में रुचि बढ़ी है.

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राष्‍ट्रीय पक्षी मोर संकट में

प्रशासन के उपेक्षापूर्ण रवैये के चलते छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय पक्षी मोर पर संकट मंडराने लगा है. मोर को क़ैद करके उसे शोभा की वस्तु बना लेने का चलन इन दिनों राज्य में गति पकड़ रहा है. वन विभाग कामला इस ओर ध्यान देने के लिए तैयार नहीं है. परिणाम यह है कि मोर इन दिनों संकट में हैं.

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इस जलवायु में कोई बदलाव नहीं

वर्ष 2009 भारतीय वन क्षेत्र, तटीय इलाक़ों और कृषि योग्य भूमि के लिए बेहद अव्यवस्थित रहा. इस वर्ष लगभग हर महीने उद्योग और बुनियादी ढांचों के निर्माण की 100 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई. नतीजतन आवास, जीविका और उन पर अपने अधिकारों की लड़ाई का नज़ारा हर तरफ़ देखने को मिला.

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हाथी हिंसक क्यों हो रहे हैं?

यदि ख़बरों पर विश्वास किया जाए तो पिछले दो दशकों के दौरान हाथियों ने केवल छत्तीसगढ़ में 120 से ज़्यादा मनुष्यों की जान ली है. आंकड़ों की यह सच्चाई बताती है कि विकास के नाम पर जंगलों के कटने और वनस्पतियों के अभाव के कारण पर्यावरण को कितना नुक़सान हो रहा है. अपने ठिकानों पर क़ब्ज़ा होते देखकर जानवर शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन कर रहे हैं. इसी आपाधापी में वे हिंसक भी होते जा रहे हैं.

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