साल 2013 का साहित्यिक लेखा-जोखा

साल 2013 तमाम साहित्यिकगतिविधियों से भरा हुआ रहा. बिल्कुल प्रारम्भ में ही जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल के दौरान आशीष नन्दी महज़

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कुछ तो है, जिसकी पर्दादारी है

हिंदी में साहित्यिक किताबों की बिक्री के आंकड़ों को लेकर अच्छा-खासा विवाद होता रहा है. लेखकों को लगता है कि प्रकाशक उन्हें उनकी कृतियों की बिक्री के सही आंकड़े नहीं देते हैं. दूसरी तऱफ प्रकाशकों का कहना है कि हिंदी में साहित्यिक कृतियों के पाठक लगातार कम होते जा रहे हैं. बहुधा हिंदी के लेखक प्रकाशकों पर रॉयल्टी में गड़बड़ी के आरोप भी जड़ते रहे हैं, लेकिन प्रकाशकों पर लगने वाले इस तरह के आरोप कभी सही साबित नहीं हुए.

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