अब एक नए भारत की बात होनी चाहिए

चुनाव परिणाम बाहर आ चुके है. तकरीबन पूरा देश एक तरफ चला गया है. ख़ासकर, उत्तर भारत, ठीक  1971 और

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पाकिस्तान का भय दिखाकर वोट नहीं मिलने वाला

हमारे देश के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार (नरेंद्र मोदी) कश्मीर में जाकर कहते हैं कि पाकिस्तान भारत के लिए ख़तरा

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आख़िर इस देश को क्या चाहिए

राष्ट्रगीत में भला कौन वह/भारत-भाग्य-विधाता है/फटा सुथन्ना पहने जिसका/गुन हरचरना गाता है/मखमल टमटम बल्लम तुरही/पगड़ी छत्र चंवर के साथ/तोप छुड़ाकर,

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Lalu Yadav in Jail

Lalu Yadav in Jail

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अखिलेश सरकार का एक साल – कामयाबी पर भारी नाकामी

एक साल पहले जब सपा के युवा नेता अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बड़े सूबे की

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हक़ से मांगें पंचायत के ख़र्च का हिसाब

गांधी जी का सपना था कि देश का विकास पंचायत राज संस्था के ज़रिए हो. पंचायती राज को इतना मज़बूत

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हमें तीसरे विकल्प की ज़रूरत है

बहुत समय के बाद प्रधानमंत्री ने एक राजनीतिक बयान दिया है. हालांकि, इस तरह के बयान के लिए संसद एक

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किसानों की मूल समस्याओं की उपेक्षा

पिछले दिनों वर्ष 2013-14 का बजट वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने पेश किया. मीडिया से लेकर अर्थशास्त्रियों की पैनी नज़र

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राजनीतिक दलों का रवैया गुस्सा दिलाता है

महाभारत शायद आज की सबसे बड़ी वास्तविकता है. इस महाभारत की तैयारी अलग-अलग स्थलों पर अलग तरह से होती है और लड़ाई भी अलग से लड़ी जाती है, लेकिन 2013 और 2014 का महाभारत कैसे लड़ा जाएगा, इसका अंदाज़ा कुछ-कुछ लगाया जा सकता है, क्योंकि सत्ता में जो बैठे हुए लोग हैं या जो सत्ता के आसपास के लोग हैं, वे धीरे-धीरे इस बात के संकेत दे रहे हैं कि वे किन हथियारों से लड़ना चाहते हैं.

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फर्रु़खाबाद को अब धोखा बर्दाश्त नहीं

अरविंद केजरीवाल फर्रु़खाबाद गए भी और दिल्ली लौट भी आए. सलमान खुर्शीद को सद्बुद्धि आ गई और उन्होंने अपनी उस धमकी को क्रियान्वित नहीं किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि केजरीवाल फर्रु़खाबाद पहुंच तो जाएंगे, लेकिन वापस कैसे लौटेंगे. इसका मतलब या तो अरविंद केजरीवाल के ऊपर पत्थर चलते या फिर गोलियां चलतीं, दोनों ही काम नहीं हुए.

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सीमेंट कारखानों के लिए भूमि अधिग्रहण : किसान आखिरी दम तक संघर्ष करें

देश में जब भी भूमि अधिग्रहण की बात होती है, तो सरकार का इशारा आम आदमी और किसान की तऱफ होता है. आज़ादी के बाद से दस करोड़ लोग भूमि अधिग्रहण की वजह से विस्थापित हुए हैं. अपनी माटी से अलग होने वालों में कोई पूंजीपति वर्ग नहीं होता. विकास की क़ीमत हमेशा आम आदमी को ही चुकानी पड़ी है. जिनके पास धन है, वे दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में अपने मनमाफिक मकान ख़रीद सकते हैं, लेकिन वह आम आदमी, जिसके पास अपनी जीविका और रहने के लिए ज़मीन का एक छोटा सा टुकड़ा है, उसे बेचकर आख़िर वह कहां जाएगा? ऐसे कई ज्वलंत सवालों पर पेश है चौथी दुनिया की यह ख़ास रिपोर्ट…

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सरकार जवाब दे यह देश किसका है

हाल में देश में हुए बदलावों ने एक आधारभूत सवाल पूछने के लिए मजबूर कर दिया है. सवाल है कि आखिर यह देश किसका है? सरकार द्वारा देश के लिए बनाई गई आर्थिक नीतियां और राजनीतिक वातावरण समाज के किस वर्ग के लोगों के फायदे के लिए होनी चाहिए? लाजिमी जवाब होगा कि सरकार को हर वर्ग का ख्याल रखना चाहिए. आज भी देश के साठ प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं. मुख्य रूप से सरकारी और निजी क्षेत्र में काम कर रहा संगठित मज़दूर वर्ग भी महत्वपूर्ण है.

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जनता को चिढ़ाइए मत, जनता से डरिए

शायद सरकारें कभी नहीं समझेंगी कि उनके अनसुनेपन का या उनकी असंवेदनशीलता का लोगों पर क्या असर पड़ता है. फिर चाहे वह सरकार दिल्ली की हो या चाहे वह सरकार मध्य प्रदेश की हो या फिर वह सरकार तमिलनाडु की हो. कश्मीर में हम कश्मीर की राज्य सरकार की बात इसलिए नहीं कर सकते, क्योंकि कश्मीर की राज्य सरकार का कहना है कि वह जो कहती है केंद्र सरकार के कहने पर कहती है, और जो करती है वह केंद्र सरकार के करने पर करती है.

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नया भूमि अधिग्रहण विधेयक किसानों के खिलाफ साजिश

भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्स्थापना एवं पुनर्वास विधेयक संसद के मॉनसून सत्र में भी पेश नहीं हो सका. यह विधेयक कब पेश होगा और देश के करोड़ों किसानों की परेशानियां कब खत्म होंगी, यह कोई नहीं बता सकता. मौजूदा समय में देश के अंदर जबरन भूमि अधिग्रहण के विरोध में छोटे-बड़े सैकड़ों आंदोलन चल रहे हैं. अब नंदीग्राम, सिंगुर, भट्टा पारसौल, नगड़ी, जैतापुर और कुडनकुलम जैसे हालात कई राज्यों में पैदा हो गए हैं.

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गुजरात जीतने को कांग्रेस बेकरार

इस साल के अंत में गुजरात में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिसके लिए राज्य की हर राजनीतिक पार्टी कमर कस चुकी है. एक ओर जहां सत्तारूढ़ भाजपा से अलग होकर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल ने गुजरात परिवर्तन पार्टी नामक अपनी अलग पार्टी बनाकर वर्तमान मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की परेशानियां बढ़ा दी हैं, वहीं कांग्रेस पार्टी भी गुजरात का गढ़ जीतने के लिए कोई कोताही नहीं बरत रही है.

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सुशासन का सच या फरेब

बिहार के चौक-चौराहों पर लगे सरकारी होर्डिंग में जिस तरह सुशासन का प्रचार किया जाता है, वह एनडीए सरकार की शाइनिंग इंडिया की याद दिलाता है. बिहार से निकलने वाले अ़खबार जिस तरह सुशासन की खबरों से पटे रहते हैं, उसे देखकर आज अगर गोएबल्स (हिटलर के एक मंत्री, जो प्रचार का काम संभालते थे) भी ज़िंदा होते तो एकबारगी शरमा जाते. ऐसा लिखने के पीछे तर्क है.

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मिशन 2020

भारत ने लंदन ओलंपिक में 2 रजत और 4 कांस्य पदक जीतकर आज तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया. अच्छे प्रदर्शन के बावजूद सबके सामने एक बड़ा प्रश्न है कि सवा अरब की आबादी वाला देश महज़ 6 ओलंपिक पदक ही जीत पाया. लेकिन क्या आबादी मेडल जीतने का सही पैमाना हो सकती है. क्या यह संभव है कि हर देश अपनी आबादी के हिसाब से ओलंपिक पदकों पर क़ब्ज़ा कर सके.

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संशोधित भूमि अधिग्रहण बिलः ग्रामीण विकास या ग्रामीण विनाश

ओडिसा के जगतसिंहपुर से लेकर हरियाणा के फतेहाबाद में ग्रामीण भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं. दूसरी ओर झारखंड के कांके-नग़डी में आईआईएम के निर्माण के लिए हो रहे भूमि अधिग्रहण का लोग विरोध कर रहे हैं. इस पर सरकार का कहना है कि देश को विकास पथ पर बनाए रखने के लिए भूमि अधिग्रहण आवश्यक है.

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विद्वान प्रधानमंत्री विफल प्रधानमंत्री

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ईमानदार हैं, सौम्य हैं, सभ्य हैं, मृदुभाषी एवं अल्पभाषी हैं, विद्वान हैं. उनके व्यक्तित्व की जितनी भी बड़ाई की जाए, कम है, लेकिन क्या उनकी ये विशेषताएं किसी प्रधानमंत्री के लिए पर्याप्त हैं? अगर पर्याप्त भी हैं तो उनकी ये विशेषताएं सरकार की कार्यशैली में दिखाई देनी चाहिए. अ़फसोस इस बात का है कि मनमोहन सिंह के उक्त गुण सरकार के कामकाज में दिखाई नहीं देते.

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जनसंवाद यात्रा : औधोगीकरण बनाम कृषि भूमि का मुद्दा उठाया

जनसंवाद यात्रा का प़डाव सूरत ज़िले का मांडवी था, जहां नगर पंचायत मांडवी की ओर से छात्र-छात्राओं और शिक्षकों की एक संयुक्त बैठक का आयोजन शिक्षक भवन में किया गया था. मांडवी ज़िले का यह क्षेत्र अपनी उर्वरा भूमि के लिए प्रसिद्ध है. विगत 20 वर्षों से सभी सरकारों द्वारा लगातार यह आश्वासन दिया जाता रहा है कि नर्मदा नदी में बांध बनने के पश्चात खेतों को पर्याप्त सिंचाई सुविधा और लोगों के लिए पेयजल उपलब्ध होगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

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जनता को अखिलेश से बहुत उम्मीदें हैं

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के दो फैसलों पर उनकी आलोचना हो रही है. पहला फैसला उत्तर प्रदेश में शाम सात बजे केबाद बाज़ारों और मॉल को बिजली न देना और दूसरा फैसला, जिसमें उन्होंने विधायकों को विकास निधि से कार खरीदने की अनुमति दी थी. मुख्यमंत्री के ये दोनों फैसले आलोचना का विषय ज़रूर बनते, लेकिन मुख्यमंत्री ने दोनों ही फैसलों को लागू होने के 24 घंटे के अंदर वापस ले लिया.

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फैसले न लेने की कीमत

मनमोहन सिंह की बुनियादी समस्या यह है कि वह खुद फैसले नहीं लेना चाहते, लेकिन प्रधानमंत्री हैं तो फैसले तो लेने ही थे. जब उनके पास फाइलें जाने लगीं तो उन्होंने सोचा कि वह क्यों फैसले लें, इसलिए उन्होंने मंत्रियों का समूह बनाना शुरू किया, जिसे जीओएम (मंत्री समूह) कहा गया. सरकार ने जितने जीओएम बनाए, उनमें दो तिहाई से ज़्यादा के अध्यक्ष उन्होंने प्रणब मुखर्जी को बनाया.

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ओमिता पॉल महान सलाहकार

प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं. ऐसे में उनके चार दशक पुराने राजनीतिक करियर की समीक्षा की जा रही है. देश की वर्तमान खराब आर्थिक हालत और उसमें प्रणब बाबू की भूमिका पर भी खूब चर्चा हो रही है, लेकिन इस सबके बीच एक और अहम मसला है, जिस पर ज़्यादा बात नहीं हो रही है. खासकर ऐसे समय में, जबकि बिगड़ी आर्थिक स्थिति को न सुधार पाने के लिए प्रणब मुखर्जी को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा हो. यह सवाल सीधे-सीधे वित्त मंत्री के सलाहकार से जुड़ा हुआ है.

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आम चुनाव 2014 की तैयारी

अमेरिका में राष्ट्रपति के लिए चुनाव अभियान उसी दिन से शुरू हो जाता है, जिस दिन नया राष्ट्रपति शपथ लेता है. भारत में राष्ट्रपति और लोकसभा के चुनाव के बीच दो साल का अंतराल है और अभी से प्रधानमंत्री पद के लिए अभियान शुरू हो गया है. राष्ट्रपति पद के किसी एक उम्मीदवार को समर्थन देने के मुद्दे पर एनडीए का राज़ी होना मुश्किल है. भाजपा 2014 के आम चुनाव की तैयारी में जुट गई है.

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प्रेम नारायण सचिव बनेंगे

1978 बैच के आईएएस अधिकारी प्रेम नारायण को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय में सचिव बनाया जाएगा. वह नीला गंगाधरण की जगह लेंगे. इस समय प्रेम नारायण योजना आयोग में मुख्य सलाहकार हैं.

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उत्तराखंडः पिंडरगंगा घाटी, ऐसा विकास किसे चाहिए

पिंडरगंगा घाटी, ज़िला चमोली, उत्तराखंड में प्रस्तावित देवसारी जल विद्युत परियोजना के विरोध में वहां की जनता का आंदोलन जारी है. गंगा की सहायक नदी पिंडरगंगा पर बांध बनाकर उसे खतरे में डालने की कोशिशों का विरोध जारी है. इस परियोजना की पर्यावरणीय जन सुनवाई में भी प्रभावित लोगों को बोलने का मौक़ा नहीं मिला. आंदोलनकारी इस परियोजना में प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका पर भी सवाल उठा रहे हैं.

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इस बदहाली के लिए ज़िम्मेदार कौन है

आप जब इन लाइनों को पढ़ रहे होंगे तो मैं नहीं कह सकता कि रुपये की अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में या डॉलर के मुक़ाबले क़ीमत क्या होगी. रुपया लगातार गिरता जा रहा है. अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों ने न केवल बैंकों की, बल्कि सभी वित्तीय संस्थाओं की रेटिंग घटा दी है. कुछ एजेंसियों ने तो हमारे देश की ही रेटिंग घटा दी है.

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पंसारी पंचायत : जिसने लोगों की ज़िंदगी बदल दी

गांव के विकास में पंचायत की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, लेकिन अक्सर यह देखा जाता है कि पंचायतें अपनी भूमिका का निर्वहन सही तरीक़े से नहीं करती हैं, जिसके कारण लोगों के मन में यह धारणा घर कर गई है कि पंचायत के स्तर पर कुछ नहीं किया जा सकता है.

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उत्तर प्रदेश : नई औधोगिक नीति से बनेगी नई तस्वीर

हाल के कुछ वर्षों में राज्य में औद्योगिक विकास की गति पूरी तरह अवरुद्ध हो गई है. मायावती के शासनकाल में न तो कोई नया उद्योग लगा और न चालू उद्योगों को पनपने का कोई मौका दिया गया. अखिलेश सरकार के सामने औद्योगिक विकास एक बड़ी चुनौती है. इसके लिए वह चिंतित भी हैं. उनकी यह चिंता विधानसभा सत्र के दौरान सा़फ-सा़फ दिखाई पड़ रही थी.

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रसायनों का ज़्यादा इस्तेमाल नुक़सानदेह है

जब भी देश के विकास की बात होती है, तो उसमें हरित क्रांति का ज़िक्र ज़रूर होता है. यह ज़िक्र लाज़मी भी है, क्योंकि हरित क्रांति के बाद ही देश सही मायने में आत्मनिर्भर हुआ. देश में कृषि की पैदावार बढ़ी, लेकिन हरित क्रांति का एक स्याह पहलू और भी है, जो अब धीरे-धीरे हमारे सामने आ रहा है.

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